अमेरिका में अधिक शिक्षित और बेहतर सैलरी वाले हुए H-1B वीजा वर्कर्स, टेक सेक्टर में बढ़ा दबदबा; USCIS रिपोर्ट में खुलासा
अमेरिकी H-1B वीजा कार्यक्रम में भारतीय पेशेवरों का दबदबा लगातार मजबूत बना हुआ है, वित्त वर्ष 2025 में 70% लाभार्थी भारत में जन्मे हैं। ...और पढ़ें
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ज्यादा पढ़े-लिखे और बेहतर सैलरी वाले हुए H-1B वर्कर्स
HighLights
H-1B वीजा में 70% लाभार्थी भारतीय मूल के।
मास्टर्स डिग्री धारकों की मांग और वेतन में वृद्धि।
कंप्यूटर और आईटी क्षेत्र H-1B का मुख्य आधार।
डिजिटल डेस्क, वॉशिंगटन। अमेरिकी नागरिकता और आप्रवासन सेवा द्वारा जारी वित्त वर्ष 2025 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका के प्रतिष्ठित H-1B वीजा कार्यक्रम में भारतीय पेशेवरों का दबदबा लगातार मजबूत बना हुआ है। इस वित्त वर्ष में मंजूर किए गए कुल H-1B आवेदनों में से लगभग 70 प्रतिशत लाभार्थी ऐसे थे, जिनका जन्म भारत में हुआ था।
इस सूची में करीब 12 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ चीन दूसरे स्थान पर रहा। यह रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि तमाम राजनीतिक बहसों के बावजूद अमेरिकी तकनीकी क्षेत्र आज भी भारतीय प्रतिभाओं पर पूरी तरह निर्भर है।
मास्टर्स डिग्री धारक बने पहली पसंद
इस रिपोर्ट का सबसे अहम पहलू H-1B लाभार्थियों का शैक्षणिक स्तर है, जिससे पता चलता है कि अमेरिका में अब उच्च योग्य पेशेवरों की मांग तेजी से बढ़ी है। वित्त वर्ष 2025 में 58 प्रतिशत H-1B लाभार्थियों के पास मास्टर्स डिग्री या उससे उच्च शिक्षा थी, जो पिछले वित्त वर्ष (2024) के 46 प्रतिशत के मुकाबले एक बड़ा उछाल है।
इसके विपरीत, बैचलर्स डिग्री धारकों की हिस्सेदारी घटकर 31 प्रतिशत रह गई है, जबकि डॉक्टरेट धारकों की हिस्सेदारी करीब 4 प्रतिशत रही।
आप्रवासन विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्लाउड कंप्यूटिंग, सेमीकंडक्टर डिज़ाइन और एडवांस्ड इंजीनियरिंग जैसी अत्याधुनिक तकनीकों में विशेषज्ञता की बढ़ती मांग को दर्शाता है।
इसके अलावा, अमेरिका से बाहर के उम्मीदवारों पर 1 लाख डॉलर का प्रायोजन शुल्क लगने के बाद से कंपनियाँ अमेरिकी विश्वविद्यालयों से पास आउट होने वाले उच्च डिग्री धारकों को प्राथमिकता दे रही हैं।
कमाई के मामले में प्रोफेशनल डिग्री वाले सबसे आगे
सैलरी के मामले में अलग-अलग शैक्षणिक योग्यता वाले पेशेवरों के बीच बड़ा अंतर देखा गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, प्रोफेशनल डिग्री धारकों को सबसे अधिक $205,000 का मीडियन वेतन मिला।
वहीं, बैचलर्स डिग्री धारकों का मीडियन वेतन $132,000 रहा, जबकि डॉक्टरेट धारकों का मीडियन वेतन सबसे कम $105,000 दर्ज किया गया।

टेक सेक्टर ही बना हुआ है H-1B का असली इंजन
कंप्यूटर और आईटी से जुड़े क्षेत्र आज भी H-1B वीजा के सबसे बड़े खरीदार हैं। वित्त वर्ष 2025 में मंजूर किए गए कुल 4,06,348 H-1B आवेदनों में से लगभग 2,52,088 (62 प्रतिशत) कंप्यूटर से संबंधित व्यवसायों के लिए थे।
यह भारी संख्या साफ करती है कि भले ही वीजा नियमों में बदलाव की बातें चल रही हों, लेकिन टेक कंपनियां इस कार्यक्रम का सबसे ज्यादा लाभ उठा रही हैं और इसके बिना उनका काम चलना मुश्किल है।
पुराने कर्मचारियों को रिटेन कर रही हैं कंपनियां
डेटा से यह भी साफ होता है कि मंजूर किए गए आवेदनों में एक बड़ा हिस्सा उन पेशेवरों का है जो पहले से अमेरिका में काम कर रहे हैं और कंपनियां उनके वीजा को आगे बढ़ा रही हैं। यह ट्रेंड दिखाता है कि कंपनियां कुशल विदेशी कामगारों को लंबे समय तक अपने साथ रखना चाहती हैं।
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भारत जैसे देशों के लिए एम्प्लॉयमेंट-बेस्ड ग्रीन कार्ड प्रोसेसिंग में होने वाली भारी देरी भी इसका एक मुख्य कारण है, जिसकी वजह से लोग सालों तक H-1B पर ही बने रहते हैं।

वीजा नियमों पर राजनीतिक बहस जारी रहने के आसार
यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब अमेरिका में कुशल प्रवासियों को लेकर राजनीतिक बहस फिर से तेज हो गई है। जहां एक तरफ कॉर्पोरेट जगत का तर्क है कि H-1B कर्मचारी कुशल कामगारों की कमी को पूरा करते हैं, वहीं आलोचकों का मानना है कि इससे स्थानीय अमेरिकी नागरिकों के वेतन और रोजगार पर असर पड़ता है। नियमों को कड़ा करने और उच्च वेतन वाले पदों को प्राथमिकता देने के नए प्रस्तावों से साफ है कि इस कार्यक्रम की जांच आगे भी जारी रहेगी।
हालांकि, यह डेटा गवाही देता है कि अमेरिकी कंपनियां इस वीजा का इस्तेमाल सस्ते लेबर के लिए नहीं, बल्कि उच्च-कुशल पदों के लिए कर रही हैं। भारत के लिए यह रिपोर्ट एक बार फिर साबित करती है कि अमेरिका की इनोवेशन इकॉनमी के केंद्र में भारतीय इंजीनियर्स और तकनीकी कार्यबल हमेशा की तरह बेहद मजबूत स्थिति में मौजूद हैं।