Trending

    loading ads...
    विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

    क्या ईरान के खिलाफ नरम पड़ रहे हैं राष्ट्रपति ट्रंप? अमेरिका की अस्थिर विदेश नीति पर उठे बड़े सवाल

    Updated: Wed, 01 Apr 2026 02:00 AM (IST)

    पिछले एक महीने से ईरान के खिलाफ जारी ''सैन्य अभियानों'' के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विरोधाभासी बयानों ने न केवल अमेरिकी जनता को, बल्कि ...और पढ़ें

    News Article Hero Image

    ईरान युद्ध पर ट्रंप के बदलते सुर से दुविधा में अमेरिका (फोटो- रॉयटर)

    पीटीआई, वाशिंगटन। पिछले एक महीने से ईरान के खिलाफ जारी ''सैन्य अभियानों'' के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विरोधाभासी बयानों ने न केवल अमेरिकी जनता को, बल्कि पूरी दुनिया को हैरत में डाल दिया है।

    कभी नाटो सहयोगियों से मदद की गुहार लगाना और अगले ही पल यह कहना कि अमेरिका को किसी की जरूरत नहीं है - ट्रंप के इन 'फ्लिप-फ्लॉप' (लगातार बदलते बयानों) ने युद्ध की गंभीरता पर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।

    आलम यह है कि इंटरनेट मीडिया पर उन्हें ''टाको'' (ट्रंप ऑलवेज चकेन्स आउट अर्थात् डर के मारे किसी काम को करने से पीछे हट जाते हैं या हिम्मत हार जाते हैं) कहकर चिढ़ाया जा रहा है।

    सहयोग की अपील और फिर अहंकार का प्रदर्शन इस महीने की शुरुआत में ट्रंप ने खाड़ी देशों के तेल पर निर्भर यूरोपीय देशों और चीन से होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा में मदद मांगी थी।

    उन्होंने कहा था, '''अगर हमें उनके जहाजों या किसी उपकरण की जरूरत है, तो उन्हें हमारी मदद के लिए कूद पड़ना चाहिए।''' लेकिन, अपनी बात खत्म करने से पहले ही वे अपने चिर-परिचित अंदाज में आ गए और कहा, '''मेरा मानना है कि हमें किसी की जरूरत नहीं है, हम दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेना हैं।'''

    जब सहयोगियों ने इस पर ठंडी प्रतिक्रिया दी, तो ट्रंप ने इंटरनेट मीडिया पर तंज कसते हुए लिखा कि जिन देशों को जेट ईंधन नहीं मिल रहा, वे अमेरिका से तेल खरीदें और 'हिम्मत जुटाकर' खुद होर्मुज जलडमरूमध्य पर कब्जा कर लें।

    रणनीतिक अस्पष्टता या महज एक 'रियलिटी शो'? युद्ध के मैदान में भी ट्रंप की अनिश्चितता साफ दिख रही है। पिछले हफ्ते उन्होंने 48 घंटे के भीतर ईरान के बिजली संयंत्रों को 'मिटा देने' की धमकी दी थी, लेकिन अगले ही दिन उन्होंने हमले को पहले पांच दिन और फिर 10 दिन के लिए टाल दिया। उन्होंने तर्क दिया कि वे ईरान के एक ऐसे नेता से बातचीत कर रहे हैं जिसका वहां नियंत्रण है।

    विदेश मामलों के विश्लेषक फरीद जकारिया ने वाशिंगटन पोस्ट में एक लेख में कहा कि दुनिया के लिए अब अमेरिकी विश्वसनीयता जैसी कोई चीज नहीं रह गई है। बस एक अजीब रियलिटी टेलीविजन शो है जिसमें मुख्य अभिनेता संकटों के बीच अपना रास्ता बदलता है, लड़खड़ाता है और इस उम्मीद में आगे बढ़ने की कोशिश करता है कि उसका आज का बयान कल के बयान से उपजे संकट का समाधान कर देगा।

    घरेलू मोर्चे पर बढ़ता असंतोष और विरोध प्यू रिसर्च के ताजा आंकड़ों के अनुसार, 61 प्रतिशत अमेरिकी युद्ध को संभालने के ट्रंप के तरीके से नाखुश हैं। रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी असंतोष के स्वर उठ रहे हैं।

    सांसद नैन्सी मेस ने स्पष्ट कर दिया है कि वे ईरान की धरती पर अमेरिकी सैनिकों को उतारने के किसी भी फैसले का समर्थन नहीं करेंगी।

    इतिहासकार एडवर्ड लेंगल का मानना है कि ट्रंप अब तक के ''सबसे सक्रिय युद्धकालीन राष्ट्रपति'' बनने की कोशिश में कमांडरों की रणनीतिक योजनाओं में हस्तक्षेप कर रहे हैं, जो एक बड़ी खामी साबित हो रही है। फिलहाल, व्हाइट हाउस से निकलने वाले इन विरोधाभासी संकेतों ने अमेरिका की युद्ध नीति को एक पहेली बना दिया है।