होर्मुज संकट से हवाई सफर प्रभावित, चीन से सिंगापुर समेत कई रूट पर फ्लाइट कैंसिल
मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और ईंधन की कीमतों के कारण चीन से दक्षिण-पूर्व एशिया की कई उड़ानें रद्द हो गई हैं। इससे यात्रियों को भारी परेशानी और आर्थिक न ...और पढ़ें
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ईंधन संकट का असर दक्षिण-पूर्व एशिया जाने वाली कई उड़ानें रद (फाइल फोटो)
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और ईंधन की कीमतों में तेजी का असर अब हवाई यात्रा पर भी दिखने लगा है। चीन से दक्षिण-पूर्व एशिया जाने वाली कई उड़ानें अचानक रद हो रही हैं, जिससे छुट्टियों की तैयारी कर रहे यात्रियों को बड़ी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
चीन के कई यात्रियों ने सोशल मीडिया पर अपनी परेशानी साझा की है। 29 साल के वांग कियांग की क़िंगदाओ से वियतनाम जाने वाली फ्लाइट बिना किसी वजह बताए रद्द कर दी गई। हालांकि बाद में उन्हें शंघाई के रास्ते नई फ्लाइट मिल गई, जिससे उनका सफर जारी रह सका।
लेकिन सभी यात्रियों को इतनी राहत नहीं मिली। एक अन्य यात्री की चोंगकिंग से हो ची मिन्ह सिटी जाने वाली फ्लाइट और वापसी दोनों रद्द कर दी गईं। उसने बताया कि उसने दो महीने पहले टिकट और होटल बुक किया था, जिससे उसे आर्थिक नुकसान भी हुआ। ईंधन की बढ़ती कीमतों के कारण नई फ्लाइट्स के किराए भी काफी बढ़ गए हैं। पहले जहां टिकट करीब 2200 युआन का था, वहीं अब कीमत 5000 युआन से ज्यादा पहुंच गई है।
कौन-कौन से रूट हुए प्रभावित
होर्मुज जलडमरूमध्य में संकट के कारण एशिया में ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हुई है, जिसका सीधा असर उड़ानों पर पड़ा है। चीन से थाईलैंड, मलेशिया और वियतनाम जैसे देशों के लिए कई फ्लाइट्स रद्द की गई हैं। शीआन-फुकेत, शियामेन-वियनतियाने जैसे रूट्स पर उड़ानें बंद हुई हैं।
इसके अलावा चेंगदू से कुआलालंपुर के बीच उड़ानें अप्रैल से जून तक रद कर दी गई हैं। सिंगापुर के लिए भी कुछ उड़ानें प्रभावित हुई हैं। शंघाई से चांगी एयरपोर्ट और चेंगदू से सिंगापुर के बीच कई फ्लाइट्स अस्थायी रूप से रद्द की गई हैं, हालांकि कुछ बड़ी एयरलाइंस की सेवाएं अभी जारी हैं।
लो-कॉस्ट एयरलाइंस पर ज्यादा असर
विशेषज्ञों के मुताबिक, सबसे ज्यादा असर कम लागत वाली एयरलाइंस पर पड़ा है। इन कंपनियों के पास ईंधन की कीमत बढ़ने से बचाव के लिए कोई खास व्यवस्था नहीं होती, इसलिए लागत बढ़ते ही इन्हें उड़ानें कम करनी पड़ती हैं।
उदाहरण के तौर पर, कुछ एयरलाइंस में ईंधन का खर्च पहले कुल लागत का 30 प्रतिशत था, जो अब बढ़कर करीब 50 प्रतिशत तक पहुंच गया है। ऐसे में कई फ्लाइट्स चलाना घाटे का सौदा बन जाता है। बड़ी एयरलाइंस कुछ हद तक पहले से तय कीमत पर ईंधन खरीदकर इस झटके से बच जाती हैं, लेकिन लो-कॉस्ट कंपनियों के पास यह विकल्प नहीं होता।
आगे क्या रहेगा असर
विशेषज्ञों का कहना है कि हालात अभी अनिश्चित हैं और यह काफी हद तक मध्य पूर्व के हालात पर निर्भर करेगा। अगर स्थिति जल्दी नहीं सुधरी, तो आने वाले महीनों में और ज्यादा उड़ानें रद्द हो सकती हैं। इस बीच, कुछ एयरलाइंस यूरोप के लिए उड़ानों की संख्या बढ़ा रही हैं। माना जा रहा है कि यात्री अब दक्षिण-पूर्व एशिया की बजाय यूरोप की ओर ज्यादा रुख कर सकते हैं।
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