चीन की डिजिटल साजिश: अब विदेशी नागरिकों की हर गतिविधि पर भी अपनी पैनी नजर रख रहा ड्रैगन
चीन अपनी सीमाओं के भीतर रहने वाले विदेशी नागरिकों की हर गतिविधि पर गुप्त रूप से पैनी नजर रख रहा है। सामने आए एक नए डिजिटल सर्विलांस डेटाबेस से यह बात ...और पढ़ें

चीन की चालबाजी (एआई से बनाई गई तस्वीर)
HighLights
अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा चीन।
विदेश में रह रहे लोगों पर भी रख रहा नजर।
डिजिटल डेस्त, बीजिंग। चीन की चालबाजी कोई नई बात नहीं है। इसी क्रम में हाल ही में सामने आई एक चौंकाने वाली रिपोर्ट से पता चला है कि चीन सिर्फ अपने ही देश के 1.4 अरब नागरिकों पर नहीं, बल्कि वहां रहने वाले विदेशी नागरिकों पर भी डिजिटल माध्यमों से बेहद बारीकी से नजर रख रहा है। यह बात तब उजागर हुई जब मार्क होफर नाम के एक पूर्व विदेशी पत्रकार और साइबर सुरक्षा शोधकर्ता ने इंटरनेट पर एक गोपनीय डेटाबेस ढूंढ निकाला।
अब समझिए क्या है पूरा मामला?
इसकी शुरुआत तब हुई जब होफर ने इस गुप्त वेबसाइट को खोला, तो उन्हें वहां उनकी अपनी तस्वीर, उनका पासपोर्ट नंबर और एक पुराना मोबाइल नंबर दिखाई दिया जो उन्होंने कभी चीन में इस्तेमाल किया था।
फिल्म 'माइनॉरिटी रिपोर्ट' जैसा नजारा
होफर के अनुसार, यह वेबसाइट किसी साइंस-फिक्शन फिल्म की तरह लग रही थी, जिसमें चीन के झांगजियाकोऊ शहर में रहने वाले विदेशियों की हर गतिविधि पर नजर रखने के लिए स्क्रीन तैयार की गई थीं। बता दें कि यह वही शहर है जहां 2022 के विंटर ओलंपिक खेलों का आयोजन हुआ था।
डेटाबेस में क्या-क्या जानकारी मिली?
इस प्लेटफॉर्म पर करीब 12000 एंट्री थीं, जिसमें 700 से अधिक विदेशी नागरिक शामिल थे। इसमें कुछ लोगों का डाटा मौजूद था। जैसे कि वांटेड अपराधी, हांगकांग और ताइवान के लोग इसके अलावा 300 से अधिक विदेशी पत्रकार, इनमें से कई ऐसे थे जो कभी उस शहर में गए भी नहीं थे।
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ऐसे में यह समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है कि यह सिस्टम सिर्फ कैमरों तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें लोगों की बेहद निजी जानकारियां जैसे कि वे कहां घूमने जाते थे, कब डॉक्टर के पास गए, गैस का बिल कितना भरा, और यहां तक कि उन्होंने कौन सी उड़ान या ट्रेन पकड़ी और उनकी सीट का नंबर क्या था, सब कुछ दर्ज था।
डेटा कहां से जुटाया गया?
मिली जानकारी के अनुसार यह प्लेटफॉर्म कैमरे, फोन के सिग्नल, अस्पताल के रिकॉर्ड, बिजली-पानी के बिल और चेहरे की पहचान करने वाले सॉफ्टवेयर जैसी कई चीजों से डेटा जोड़कर तैयार किया गया था। इसमें थाईवू स्की रिजॉर्ट आने वाले हर देशी-विदेशी पर्यटक की तस्वीरें, नाम और पासपोर्ट विवरण भी शामिल थे।
इस डेटाबेस में उत्तरी यूनिवर्सिटी के पाकिस्तानी और भारतीय छात्र भी शामिल थे। उनके धर्म, वैवाहिक स्थिति, पढ़ाई और कैंपस में एंट्री के समय की सटीक जानकारी कैमरे के जरिए दर्ज की गई थी।
लोगों को कैसे अलग-अलग श्रेणियों में बांटा गया था?
इस सर्विलांस सिस्टम ने विदेशियों को अलग-अलग ग्रुप्स में बांटा था। ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, न्यूजीलैंड, ब्रिटेन और अमेरिका के नागरिकों को 'फाइव आइज' एलायंस ग्रुप में रखा गया था। 'की कंट्रीज' की सूची में मिस्र, ईरान, इजराइल, मोरक्को, पाकिस्तान और सूडान के नागरिक शामिल थे।
इसके साथ ही हांगकांग, ताइवान, विदेशी छात्र, विदेशी जीवनसाथी और 'की पर्सन्स', जिनमें कार्यकर्ता या सुरक्षा के लिए जोखिम माने जाने वाले लोग शामिल थे उनके लिए अलग फोल्डर बनाए गए थे।
वेबसाइट तक पहुंच कैसे हुई?
दूसरी ओर हैरानी की बात यह है कि इस वेबसाइट पर कोई भी आम आदमी पहुंच सकता था। लॉगिन करने के लिए यूजरनेम और पासवर्ड पहले से ही दर्ज थे। इसका मतलब है कि सैकड़ों लोगों की निजी जानकारियों वाला यह डेटाबेस बिना किसी खास सुरक्षा के ऑनलाइन उपलब्ध था। हालांकि, इसमें कई जगह अधूरे फॉर्म और डमी टेक्स्ट भी थे, जिससे पता चलता है कि यह सिस्टम अभी पूरी तरह तैयार नहीं हुआ था और इस पर काम चल रहा था।
अब समझिए कैसे हुआ खुलासा?
इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि होफर ने जनवरी में जब इस डेटाबेस को देखा, तो उन्होंने एक दिन में जितना हो सके उतना डेटा डाउनलोड कर लिया। मई आते-आते यह पूरी वेबसाइट इंटरनेट से हमेशा के लिए गायब हो गई।
गौरतलब है कि 'न्यू यॉर्क टाइम्स' की जांच में सामने आया कि बीजिंग की 'ऑरिजिन डायनेमिक' नाम की एक रोबोटिक्स और सर्विलांस कंपनी का इससे संबंध था। यह कंपनी पुलिस विभागों को उपकरण बेचती है। साल 2023 में इसी कंपनी ने चीन में गैर-चीनी नागरिकों के लिए ऐसा ही एक सूचना इंटरफेस तैयार करने के लिए पेटेंट भी दाखिल किया था। इस कंपनी का एक हिस्सा जियांगसू प्रांत के यानचेंग शहर के स्थानीय सरकारी अधिकारियों के स्वामित्व में है।