ईरान युद्ध में चीन की 'साइलेंट डिप्लोमेसी': बिना मध्यस्थ बने कैसे निभा रहा बड़ी भूमिका? Inside Story
पश्चिम एशिया में ईरान युद्ध के बीच चीन परोक्ष कूटनीति का केंद्र बन गया है, खुद को एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। ...और पढ़ें

अमेरिकी कड़े रुख के बीच चीन का बड़ा दांव(फाइल फोटो)

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी ईरान युद्ध के बीच चीन की परोक्ष कूटनीति वैश्विक ध्यान का केंद्र बन गई है। औपचारिक मध्यस्थ न होते हुए भी बीजिंग ने वाशिंगटन और तेहरान सहित विभिन्न पक्षों के बीच तनाव कम करने में अहम भूमिका निभाई है, जिससे वह खुद को एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, हाल के वर्षों में चीन ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में सक्रियता बढ़ाई है। पारंपरिक रूप से दूर रहने वाला बीजिंग अब दक्षिण-पूर्व एशिया से लेकर यूरोप तक विभिन्न संघर्षों में मध्यस्थता के प्रयासों के जरिए एक प्रभावशाली खिलाड़ी बनकर उभरा है।
चीन का तेहरान के साथ आर्थिक और राजनीतिक संबंध मजबूत
ईरान युद्ध में चीन की स्थिति खास मानी जा रही है, क्योंकि तेहरान के साथ उसके मजबूत आर्थिक और राजनीतिक संबंध हैं। वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, खासकर एशिया, पर इस संघर्ष के प्रभाव के बीच चीन का प्रभाव और बढ़ जाता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी माना है कि चीन ने ईरान को नाजुक युद्धविराम वार्ता के लिए तैयार करने में भूमिका निभाई।
राजनयिकों के मुताबिक, प्रतिबंधों के बावजूद ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार होने के नाते चीन ने पाकिस्तान में हुई आमने-सामने की वार्ता के लिए ईरान को बातचीत की मेज पर लाने में प्रभाव डाला। युद्ध शुरू होने के बाद चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने इजरायल, सऊदी अरब, बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात सहित कई देशों के समकक्षों से लगातार संपर्क बनाए रखा।
राष्ट्रपति शी चिनफिंग का नया मुखर अंदाज
अप्रैल मध्य तक उन्होंने इस मुद्दे पर लगभग 30 बार बातचीत की। इसके साथ ही उन्होंने पाकिस्तान के साथ समन्वय करते हुए शत्रुता समाप्त करने और होर्मुज स्ट्रेट को खोलने के लिए पांच सूत्री प्रस्ताव भी रखा। राष्ट्रपति शी चिनफिंग भी हाल के दिनों में अपेक्षाकृत मुखर रहे हैं।
उन्होंने “जंगल के कानून'' की वापसी के खिलाफ चेतावनी देते हुए अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभुता और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के सिद्धांतों पर जोर दिया तथा होर्मुज खोलने का आह्वान किया।विशेषज्ञों का मानना है कि चीन की कूटनीति एक तय पैटर्न पर चलती है, जिसमें संयुक्त राष्ट्र चार्टर, राष्ट्रीय संप्रभुता और संवाद पर जोर दिया जाता है।
विश्लेषकों के अनुसार, चीन ईरान को युद्ध के बाद आर्थिक प्रोत्साहन और पुनर्निर्माण निवेश का भरोसा देने की स्थिति में है, जिससे वह समझौते और प्रतिबंधों के पालन के लिए प्रेरित कर सकता है।
साथ ही, 2023 में सऊदी अरब और ईरान के बीच बातचीत बहाल कराने में चीन की भूमिका को उसकी बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि माना जाता है। हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि बीजिंग अक्सर ऐसे अवसरों पर सक्रिय होता है, जब समझौते की परिस्थितियां पहले से अनुकूल होती हैं और जोखिम अपेक्षाकृत कम होता है।
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