गेम चेंजर से बोझ तक... आखिर क्यों फेल हुआ चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा प्रोजेक्ट?
चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के लिए गेम चेंजर नहीं बन पाया है, बल्कि यह अधूरे बुनियादी ढांचे और बढ़ते कर्ज का प्रत ...और पढ़ें

चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा क्यों हुआ फेल (फाइल फोटो)
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। जिस चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) को करीब एक दशक तक पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के लिए गेम चेंजर बताया गया था, वह अब अपनी उम्मीदों पर खरा उतरता नहीं दिख रहा है। यूरोपियन टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, यह परियोजना अब अधूरे बुनियादी ढांचे, बढ़ते कर्ज, ठप पड़े औद्योगिक क्षेत्रों और दोनों देशों की बढ़ती निराशा का प्रतीक बन गई है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि आज जिस 'सीपीईसी 2.0' की बात की जा रही है, वह परियोजना के पुनर्जीवन से ज्यादा उसकी राजनीतिक छवि बचाने की कोशिश नजर आती है। यह परियोजना अपने रणनीतिक और आर्थिक लक्ष्यों को पूरा करने में विफल रही है।
करीब 62 अरब डॉलर की इस परियोजना में सड़कें, बिजली संयंत्र, रेलवे नेटवर्क, बंदरगाह विकास और विशेष आर्थिक क्षेत्र शामिल थे। चीन की बेल्ट एंड रोड पहल के प्रमुख हिस्से के रूप में इसे पाकिस्तान में औद्योगिक विकास, क्षेत्रीय संपर्क, ऊर्जा सुरक्षा और ग्वादर को बड़े व्यापारिक केंद्र के रूप में विकसित करने के लिए शुरू किया गया था।
शुरुआत से ही मॉडल पर उठे सवाल
रिपोर्ट के मुताबिक, परियोजना की मूल संरचना में ही खामियां थीं। इसमें दीर्घकालिक आर्थिक मजबूती की बजाय बड़े और दिखाई देने वाले बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को प्राथमिकता दी गई।
पाकिस्तान ने बड़े पैमाने पर चीनी वित्तपोषण और निर्माण क्षमता तो हासिल कर ली, लेकिन ऐसा औद्योगिक तंत्र विकसित नहीं कर सका जो लंबे समय तक आर्थिक लाभ दे सके। रिपोर्ट में कहा गया है कि केवल सड़कें और बंदरगाह विकास नहीं ला सकते, जब तक उनके साथ उद्योग, निर्यात और मजबूत प्रशासनिक व्यवस्था न हो।
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कई चीनी समर्थित कोयला और बिजली परियोजनाओं में ऐसे समझौते किए गए, जिनमें चीनी कंपनियों को डॉलर में ऊंचा मुनाफा सुनिश्चित किया गया। पाकिस्तान की मुद्रा कमजोर होने और आर्थिक संकट गहराने के साथ ये समझौते और महंगे साबित होने लगे।
कर्ज और भुगतान संकट ने बढ़ाई परेशानी
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 तक पाकिस्तान के ऊर्जा क्षेत्र में बढ़ते बकाया भुगतान का संकट इतना बढ़ गया कि केवल चीनी स्वतंत्र बिजली उत्पादकों को ही 7 अरब डॉलर से अधिक का भुगतान बाकी रह गया।
रिपोर्ट का कहना है कि सीपीईसी पाकिस्तान के ऊर्जा क्षेत्र की संरचनात्मक समस्याओं को हल करने के बजाय उस पर एक नया वित्तीय बोझ बन गया। पाकिस्तान के भुगतान संतुलन संकट, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के साथ बार-बार बातचीत और विदेशी मुद्रा की कमी ने इस मॉडल की कमजोरियों को उजागर कर दिया।
चीनी ऋण और निवेश से बुनियादी ढांचा तो बना, लेकिन उससे इतना निर्यात नहीं बढ़ सका कि कर्ज चुकाने की क्षमता विकसित हो सके। रिपोर्ट के अनुसार, निर्माण कार्य और वास्तविक आर्थिक उत्पादकता के बीच यही अंतर सीपीईसी की सबसे बड़ी समस्या बन गया।
ग्वादर और सुरक्षा संकट भी बने चुनौती
रिपोर्ट में ग्वादर बंदरगाह का विशेष उल्लेख किया गया है। शुरुआत में इसे दुबई और सिंगापुर की तरह वैश्विक व्यापार केंद्र बनाने की योजना थी, लेकिन यह लक्ष्य अब तक पूरा नहीं हो सका। दूसरी ओर, सीपीईसी से जुड़ी सुरक्षा स्थिति भी लगातार खराब हुई है। खासकर बलूचिस्तान में चीनी इंजीनियर और कर्मचारी कई बार उग्रवादी हमलों का निशाना बने हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, बलूचिस्तान के कई विद्रोही समूह इस परियोजना को स्थानीय लोगों की भागीदारी के बिना बाहरी संसाधनों के दोहन का माध्यम मानते हैं। इसी वजह से सुरक्षा चुनौतियां बढ़ी हैं और परियोजना के भविष्य को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं।
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