रात का अंधेरा, समंदर, पुराने जहाज से चलता है तेल का 'गैर कानूनी' व्यापार; क्या है शैडो फ्लीट?
यह लेख 'शैडो फ्लीट' नामक अवैध तेल व्यापार नेटवर्क का खुलासा करता है, जिसका उपयोग ईरान और रूस जैसे प्रतिबंधग्रस्त देश करते हैं। ...और पढ़ें
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2026 में कुल तेल निर्यात का 56 प्रतिशत किया है शैडो फ्लीट के जरिए (फोटो सोर्स- रॉयटर्स)
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। रात का अंधेरा, समंदर, पुराने जहाज, नकली पहचान और अंतरराष्ट्रीय राजनीति। तेल के गैर कानूनी व्यापार के कथानक के ये प्रमुख पात्र हैं। यह व्यापार होता है शैडो फ्लीट के जरिये।
इस व्यापार में कुछ भी कानूनी नहीं है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय कानूनों और प्रतिबंधों को धता बताने के लिए ही व्यापार का यह तरीका अपनाया गया है। यहां जोखिम है तो मुनाफा भी बहुत है और ईरान जैसे देश की अर्थव्यवस्था ही शैडो फ्लीट से होने वाले तेल के व्यापार पर चल रही है।
इसकी शुरुआत होती है पश्चिमी देशों के प्रतिबंध से। जब यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद रूस पर और परमाणु कार्यक्रम के मसले को पर ईरान पर अमेरिका और पश्चिमी देशों ने तेल बेचने पर प्रतिबंध लगाया तो इन देशों का मुख्य व्यापार रुकने लगा।
द न्यू एनर्जी वर्ल्ड पत्रिका के अनुसार, तेल का निर्यात रूस और ईरान की अर्थव्यवस्था की जान है। ऐसे में इन देशों ने शैडो फ्लीट का सहारा लिया। शैडो फ्लीट यानी ऐसे तेल टैंकर जहाज जो अपनी पहचान छिपा कर नियमों से बाहर जाकर काम करते हैं।
पुराने जहाज, नई चाल रूस और ईरान ने शैडो फ्लीट के जरिये तेल का निर्यात करने के लिए पुराने और सस्ते तेल टैंकर खरीदे। इन टैंकरों की ओनर कंपनियों की पहचान छिपा दी गई। कई बार जहाज का नाम और झंडा बदल दिया गया। कई बार ये जहाज बीच समुद्र में अपना नाम बदल लेते हैं।
अंधेरे में सफर और ट्रैकिंग बंद आम तौर पर शैडो फ्लीट रात के अंधेरे में सफर करते हैं। अब असली खेल शुरू होता है। जहाज अपना जीपीएस (एआइएस सिस्टम) बंद कर देते हैं ताकि कोई इनको ट्रैक न कर सके। इसे डार्क वोएज कहा जाता है। समुद्र के बीच में तेल ट्रांफरशैडो फ्लीट के जरिये तेल सीधे बंदरगाह नहीं जाता है।
इसके बजाए समुद्र के बीच में तेल एक जहाज से निकाल कर दूसरे जहाज में ट्रांसफर किया जाता है। इसे शिप टू शिप ट्रांसफर कहते हैं। इससे यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि तेल किस देश से आ रहा है। यह तकनीक ईरान और रूस दोनों इस्तेमाल करते हैं।
बदल जाता है तेल का स्त्रोत
अटलांटिक काउंसिल के अनुसार, जब यह तेल चीन पहुंचता है तो इसे मलेशिया या पश्चिम एशिया का तेल बताया जाता है। चीन में अक्सर छोटी रिफाइनरियां इस तेल को खरीदती हैं, क्योंकि उनको अमेरिका और दूसरे देशों के प्रतिबंधों का डर नहीं होता है।
युआन में होता है भुगतान
अब सवाल उठता है कि इन देशों के तेल व्यापार पर प्रतिबंधों की वजह से भुगतान कैसे होता है। यहां पर प्रतिबंध से बचने के लिए डालर के बजाए युआन में भुगतान होता है। इसके लिए छोटे बैंकों और शेल कंपनियों का इस्तेमाल किया जाता है। यह इतना जटिल नेटवर्क होता है कि इसे ट्रैक करना मुश्किल होता है। यह पूरा सिस्टम ओपाक नेटवर्क कहलाता है।
चीन इसलिए खरीदता है शैडो फ्लीट का तेल
इस खेल का सबसे अहम खिलाड़ी चीन है क्योंकि वही इस तरह के तेल का सबसे बड़ा ग्राहक है। उसे सस्ता तेल मिलता है। उसके लिए पश्चिम देशों के प्रतिबंधों का पालन करना जरूरी नहीं है। उसकी स्वतंत्र रिफाइनरियां इस तेल को खरीद लेती हैं और इससे पेट्रोलियम उत्पाद बना कर दूसरे देशों को निर्यात भी करती हैं। ईरान का ज्यादातर तेल चीन ही खरीदता है।
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