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    ईरान की 'मोजेक डिफेंस' रणनीति: टॉप लीडर की मौत के बाद भी क्यों नहीं रुकेगा तेहरान? 7 हिस्सों में बंटी ताकत

    Updated: Thu, 12 Mar 2026 11:01 PM (IST)

    ईरान की 'मोजेक डिफेंस' रणनीति उसे शीर्ष नेताओं के नुकसान के बावजूद युद्ध जारी रखने में मदद करती है। यह सैन्य व्यवस्था सात हिस्सों में बंटी है, जिससे क ...और पढ़ें

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    टॉप लीडर की मौत के बाद भी क्यों नहीं रुकेगा ईरान मोजेक डिफेंस से बनाई खास रणनीति (फाइल फोटो)

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    डिजिटस डेस्क, नई दिल्ली। ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच पिछले 12 दिनों से युद्ध जारी है। जंग के पहले ही दिन सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की मौत हो गई थी और अब तक करीब 50 शीर्ष अधिकारी भी हमलों में मारे जा चुके हैं। इसके बावजूद ईरान का दावा है कि वह लंबे समय तक युद्ध लड़ सकता है।

    रिपोर्ट के मुताबिक इसके पीछे ईरान की एक खास सैन्य रणनीति है, जिसमें सेना की पूरी कमान एक जगह नहीं बल्कि कई हिस्सों में बांट दी गई है। ईरान ने इसके लिए 'डिसेंट्रलाइज्ड मोजेक डिफेंस' नाम की रणनीति बनाई है, जिसमें सैन्य ढांचा छोटे-छोटे हिस्सों में काम करता है ताकि बड़े हमलों के बाद भी सिस्टम चलता रहे।

    क्या है 'मोजेक डिफेंस' रणनीति?

    मोजेक का मतलब छोटे-छोटे टुकड़ों से बना चित्र होता है। इसी विचार पर ईरान ने अपनी सैन्य व्यवस्था तैयार की है। इस रणनीति में सेना की कमान और क्षमताओं को एक केंद्रीय कमांड में रखने के बजाय सात अलग-अलग हिस्सों में बांटा गया है।

    इसका फायदा यह है कि अगर दुश्मन टॉप लीडरशिप, कमांड सेंटर या मुख्य मुख्यालय पर हमला कर दे, तब भी बाकी हिस्से स्वतंत्र रूप से काम करते रहेंगे और जंग जारी रह सकती है।

    नेटवर्क की तरह काम करता है सिस्टम

    यह रणनीति मुख्य रूप से इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर्प्स यानी आईआरजीसी से जुड़ी हुई है। इसे पूर्व कमांडर मोहम्मद अली जाफरी के समय (2007-2019) विकसित किया गया था।

    इस ढांचे में आईआरजीसी, बसीज मिलिशिया, नियमित सेना, मिसाइल यूनिट, नौसेना और स्थानीय कमांड एक नेटवर्क की तरह काम करते हैं। अगर संचार व्यवस्था टूट भी जाए, तो स्थानीय यूनिट्स को स्वतंत्र रूप से कार्रवाई करने की अनुमति होती है।

    सेना को सात हिस्सों में बांटा

    • ईरान ने अपनी सैन्य व्यवस्था को सात अलग-अलग हिस्सों में बांट रखा है, जिनकी अलग-अलग भूमिका तय की गई है।
    • नियमित सेना यानी आर्टेश का काम शुरुआती हमलों को सहना और दुश्मन की आगे बढ़ने की गति को धीमा करना होता है।
    • एयर डिफेंस यूनिट्स का काम दुश्मन की हवाई ताकत को रोकना और अपने सिस्टम को छिपाकर बचाना होता है।

    आईआरजीसी और बसिज की भूमिका

    आईआरजीसी का मुख्य काम दूसरे चरण में शुरू होता है। इसमें घात लगाकर हमला करना, सप्लाई लाइनों को बाधित करना और शहरों या पहाड़ी इलाकों में गुरिल्ला युद्ध करना शामिल है।

    बसिज मिलिशिया को 31 प्रांतों में बांटा गया है और स्थानीय कमांडरों को ज्यादा स्वायत्तता दी गई है। नौसेना फारस की खाड़ी और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में दुश्मन के जहाजों को निशाना बनाने की रणनीति अपनाती है।

    मिसाइल और सहयोगी नेटवर्क

    ईरान की मिसाइल फोर्स दुश्मन के सैन्य ठिकानों और बुनियादी ढांचे पर गहरे हमले करने के लिए इस्तेमाल होती है। इसके अलावा ईरान के सहयोगी समूह जैसे हिज्बुल्लाह और हौती आंदोलन क्षेत्र में अलग-अलग मोर्चे खोल सकते हैं, जिससे दुश्मन का ध्यान बंटा रहता है। इस तरह जंग को ईरान की सीमाओं से बाहर भी फैलाया जा सकता है।

    ईरान ने यह रणनीति अमेरिका के पिछले युद्धों को देखकर बनाई। 2001 में अमेरिका ने अफगानिस्तान और 2003 में इराक पर हमला किया था। इराक में सद्दाम हुसैन की सरकार बहुत केंद्रीकृत थी और कमांड सिस्टम टूटते ही पूरी व्यवस्था जल्दी ढह गई। ईरान ने इससे सीख ली और अपनी सैन्य व्यवस्था को छोटे-छोटे हिस्सों में बांट दिया ताकि किसी एक जगह पर हमला होने से पूरी व्यवस्था खत्म न हो।

    लंबे युद्ध की रणनीति

    ईरान मानता है कि अमेरिका और इज़राइल की सैन्य ताकत, तकनीक और हवाई शक्ति ज्यादा मजबूत है। इसलिए वह सीधे टकराव के बजाय जंग को लंबा खींचने की रणनीति अपनाता है।

    ईरान सस्ते हथियारों जैसे शहीद ड्रोन का इस्तेमाल करता है, जिन्हें रोकने के लिए दुश्मन को महंगी मिसाइलें इस्तेमाल करनी पड़ती हैं। इससे समय के साथ दुश्मन का खर्च बढ़ता जाता है। यह रणनीति चीन के नेता Mao Zedong की 'प्रोलॉन्ग्ड वॉर' यानी लंबे युद्ध की अवधारणा से भी मिलती है।

    हर पद के लिए चार उत्तराधिकारी

    ईरान ने कई सैन्य और प्रशासनिक पदों के लिए पहले से ही कई संभावित उत्तराधिकारी तय कर रखे हैं। कई मामलों में चार-चार उत्तराधिकारी तय करने की व्यवस्था है, ताकि किसी नेता की मौत या संपर्क टूटने पर भी व्यवस्था चलती रहे। इस व्यवस्था में पहला उत्तराधिकारी न रहे तो दूसरा, तीसरा या चौथा तुरंत जिम्मेदारी संभाल सकता है।

    अमेरिका और इजरायल की सैन्य रणनीति अक्सर तेज और सटीक हमलों से दुश्मन के नेतृत्व और कमांड सिस्टम को खत्म करने पर आधारित होती है। ईरान की 'मोजेक डिफेंस' इसी रणनीति का जवाब मानी जाती है। इसका मकसद यह है कि बड़े हमलों के बाद भी सैन्य और राजनीतिक ढांचा पूरी तरह खत्म न हो।

    ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने हाल ही में कहा था कि बमबारी से ईरान की जंग लड़ने की क्षमता पर कोई असर नहीं पड़ा है और ईरान खुद तय करेगा कि युद्ध कब और कैसे खत्म होगा।

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