Rules Based World Order: जर्मन चांसलर मर्ज के बयान के बाद क्यों रही इसकी चर्चा और क्या है मतलब?
जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस में कहा कि नियमों पर आधारित विश्व व्यवस्था समाप्त हो गई है, जिसकी जगह महाशक्तियों की प्रति ...और पढ़ें

बदल रहा वर्ल्ड ऑर्डर।

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने शुक्रवार को म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस 2026 में कहा कि नियमों पर आधारित वर्ल्ड ऑर्डर (Rules Based World Order)खत्म हो गया है और उसकी जगह महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता ने ले ली है। उन्होंने अपने भाषण में कहा कि "नियमों और अधिकारों" पर आधारित वह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अब खत्म हो चुकी है। इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा था कि मैंने बोला था कि वर्ल्ड ऑर्डर बदलेगा और यह अब भारत के पक्ष में ट्विस्ट हो रहा है।
वर्ल्ड वॉर II के बाद वैश्विक रिश्तों को ताकत के बजाय नियमों से चलाने के लिए बनाया गया ग्लोबल सिस्टम, बदलते पावर डायनामिक्स के बीच बढ़ती बहस का सामना कर रहा है। कुछ लोग शांति और खुशहाली के लिए जरूरी हालात बनाए रखने के लिए इसे मजबूत करना जरूरी मानते हैं तो कुछ लोगों का तर्क है कि ये कुछ चुनिंदा देशों के लिए अपने दबदबे या शोषण को आगे बढ़ाने का एक टूल है।
ये तर्क देने वाले दोनों पक्षों के बीच एक बात एक जैसी है कि कोई भी यह तय नहीं करता कि रूल्स-बेस्ड वर्ल्ड ऑर्डर असल में क्या है या यह क्यों जरूरी है? रूल्स-बेस्ड वर्ल्ड ऑर्डर (RBO) शब्द का इस्तेमाल अक्सर डिप्लोमैटिक और जियोपॉलिटिकल चर्चाओं में किया जाता है, खासकर इंटरनेशनल झगड़ों और ग्लोबल संकटों के दौरान। तो आइए समझते हैं आखिर ये रूल्स-बेस्ड वर्ल्ड ऑर्डर क्या है?
नियम-आधारित विश्व व्यवस्था का अर्थ
इस व्यवस्था की जड़ें 1945 के बाद के काल में हैं, जब संयुक्त राज्य अमेरिका और उसके सहयोगियों ने एक ऐसा तंत्र बनाने का निर्णय लिया जो विश्व युद्ध जैसी विनाशकारी घटनाओं को दोहराने से रोके।
इसने कूटनीति और अंतर्राष्ट्रीय कानून को विवादों के समाधान का प्राथमिक साधन बनाया, न कि सैन्य शक्ति को। समय के साथ इस ढांचे में व्यापार, वित्त, सुरक्षा और विकास से जुड़े विस्तृत वैश्विक समझौते शामिल हो गए।
इसमें संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे संस्थाओं के साथ-साथ गैर-बाध्यकारी राजनीतिक प्रतिबद्धताएं भी शामिल हैं जो वैश्विक मानदंडों को आकार देती हैं। इसका मूल सिद्धांत है कि देशों को सहमति से बनाए गए नियमों, मानदंडों और संस्थानों का पालन करना चाहिए, न कि अपनी शक्ति के आधार पर कार्य करना।
इसकी मुख्य बातें
लोकतांत्रिक मूल्य एवं मानवाधिकार: स्वतंत्रता, समानता और मानव गरिमा का सम्मान।
खुले बाजार एवं आर्थिक सहयोग: व्यापार और निवेश में स्वतंत्रता, जो आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा दे।
बहुपक्षीयता (Multilateralism): सभी राष्ट्रों के बीच संप्रभुता समानता (Sovereign Equality) का सिद्धांत, छोटे-बड़े सभी देश समान नियमों के अधीन हों।
वैश्विक चुनौतियों पर सहयोग: जलवायु परिवर्तन, आर्थिक अस्थिरता और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर सामूहिक कार्रवाई।
इस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय विवादों को नियमित तंत्र (जैसे संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष) के माध्यम से हल करना है। इससे अनिश्चितता कम होती है और संघर्ष के जोखिम में कमी आती है। साथ ही, यह वैश्विक समस्याओं पर एकजुटता को बढ़ावा देता है।
समर्थकों का दृष्टिकोण
इस व्यवस्था के समर्थक कहते हैं कि यह पश्चिम के नेतृत्व में बनी है, लेकिन उसने विश्व युद्ध के बाद बड़े पैमाने पर युद्धों को रोका है और दशकों तक आर्थिक विकास एवं सहयोग को सुगम बनाया है। वे इसके निम्न लाभों पर जोर देते हैं:
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आलोचनाओं का बढ़ता प्रभाव
हाल के वर्षों में इस व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न उठे हैं। प्रमुख आलोचक, विशेषकर रूस, चीन और कुछ विकासशील देश इसके तीन मुख्य पहलुओं की आलोचना करते हैं:
पश्चिमी पूर्वाग्रह (Western Bias)

बहुध्रुवीय विश्व में प्रासंगिकता
आज वैश्विक शक्ति संतुलन बदल रहा है। उभरती शक्तियां (चीन, भारत, ब्राजील आदि) और क्षेत्रीय शक्तियां अपने हितों की रक्षा के लिए नए ढांचे बनाना चाहती हैं।
प्रतिनिधित्व की कमी
वर्तमान संस्थानों में विकासशील देशों का कम प्रतिनिधित्व है। उदाहरण के लिए, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में केवल पांच स्थायी सदस्य हैं, जबकि आज की दुनिया में अधिक विविधता है।
नए विकल्प
चीन ने "बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव" जैसे परियोजनाओं के माध्यम से अपना प्रभाव बढ़ाया है, जो नियम-आधारित व्यवस्था के विकल्प के रूप में देखी जाती हैं। इस व्यवस्था का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि क्या यह आधुनिक चुनौतियों के अनुरूप बदल सकती है।
बदलते शक्ति के केंद्र
नियम-आधारित विश्व व्यवस्था ने विश्व युद्ध के बाद से बड़े पैमाने पर संघर्षों को रोका है और वैश्विक समृद्धि को बढ़ावा दिया है। लेकिन आज यह नए युग की आवश्यकताओं के सामने है। शक्ति के केंद्र बदल रहे हैं, विकासशील देश अधिक आवाज उठा रहे हैं।
क्या होगा भविष्य?
इसका भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या यह अपने ढांचे को अधिक न्यायसंगत, समावेशी और लचीला बना सकती है। यदि यह सभी देशों के हितों को समेट लेती है, तो यह 21वीं सदी की जटिलताओं को भी संभाल सकती है। राजनीतिशास्त्री मानते हैं कि वैश्विक शांति एवं समृद्धि के लिए इस व्यवस्था का सुधार और जीवंत रूप ही एकमात्र रास्ता है।
विश्व राजनीति में शक्ति के समीकरण बदलते ही इस व्यवस्था का परीक्षण हो रहा है। आने वाले वर्षों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह व्यवस्था अपने मूल सिद्धांतों को बनाए रखते हुए नई वास्तविकताओं के अनुकूल हो सकती है, या फिर इसके स्थान पर एक नई वैश्विक व्यवस्था की आवश्यकता महसूस होगी।
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