पाकिस्तान में क्यों नहीं हो रहा कॉकरोच जैसा प्रदर्शन? क्या सत्ता के बैरिकेड को तोड़ पाएगी जेन-जी
पाकिस्तान में पीओके विरोध प्रदर्शनों और आर्थिक संकट के बावजूद, बड़ी संख्या में जेन-जी युवा देशव्यापी आंदोलन नहीं कर पा रहे हैं। ...और पढ़ें

HighLights
पीओके में विरोध प्रदर्शनों में 40 से अधिक प्रदर्शनकारियों की मौत।
पाकिस्तान की 60% जेन-जी आबादी एकजुट आंदोलन में विफल।
सेना का हाइब्रिड शासन युवाओं को विरोध से रोकता है।
डिजिटल डेस्क, इस्लामाबाद। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के हालात किसी से छिपे नहीं हैं। रोजी-रोटी और स्थानीय चुनाव की शिकायतों को लेकर आम लोग सड़कों पर उतर आए हैं। इस हफ्ते ही वहां कम से कम 40 प्रदर्शनकारियों की मौत हो चुकी है।
जले पर नमक छिड़कते हुए, पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने इन प्रदर्शनकारियों को भारत की तरह दुश्मन करार दिया और उनसे किसी भी बातचीत से साफ इनकार कर दिया।
भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह बयान पीओके के मासूम लोगों के प्रति पाकिस्तान की नफरत और क्रूरता को उजागर करता है।
हैरानी की बात यह है कि इतनी मौतों और राज्य प्रायोजित हिंसा के बावजूद वैश्विक मीडिया और मानवाधिकार संगठनों में कोई खास आक्रोश देखने को नहीं मिल रहा है, मानों पाकिस्तान में यह सब बहुत आम बात हो।
व्यवस्था के पतन की चेतावनी
पाकिस्तान के आंतरिक मंत्री मोहसिन नकवी ने हाल ही में अनजाने में एक बड़ा सच कुबूल कर लिया। उन्होंने कहा कि हम जिस व्यवस्था में जी रहे हैं, वह पूरी तरह चरमरा गई है। उन्होंने जेन जी का जिक्र करते हुए एक चौंकाने वाली चेतावनी दी कि अगर ये कॉकरोच एकजुट हो गए, तो वे सब कुछ उलट-पुलट सकते हैं।
पाकिस्तान की 60% आबादी 30 वर्ष से कम है, जिसमें लगभग 6.5 से 7 करोड़ लोग जेन जी का हिस्सा हैं। इसके बावजूद वहां कोई देशव्यापी युवा आंदोलन क्यों नहीं खड़ा हो पा रहा है?
सेना का हाइब्रिड शासन की कठपुतली सरकारें
इसका जवाब पाकिस्तान के हाइब्रिड शासन में छिपा है। पिछले दो सालों में पाकिस्तानी सेना ने खुद को सर्वोच्च शक्ति के रूप में और मजबूत कर लिया है। आज वहां पीएमएल-एन और पीपीपी गठबंधन की एक आज्ञाकारी नागरिक सरकार है, जो असल में सैन्य शासन की प्रशासनिक विंग की तरह काम करती है। सेना की सबसे बड़ी चतुराई सरकारों को मोहरे की तरह इस्तेमाल करना है।
जब एक सरकार अलोकप्रिय हो जाती है, तो वे दूसरी ले आते हैं। इस तरह जनता का सारा गुस्सा सिर्फ नागरिक राजनेताओं पर निकलता है। देश का असली पावर सेंटर यानी सेना आधिकारिक तौर पर अराजनीतिक बनी रहती है। यही कारण है कि युवाओं के पास विरोध के लिए कोई एक स्पष्ट और सीधा लक्ष्य ही नहीं है।
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पाकिस्तान पर आतंकवाद का साया
पाकिस्तान में विरोध की कमी नहीं है, लेकिन यह भूगोल और विचारधाराओं में बुरी तरह बंटा हुआ है। बलूचिस्तान में अलगाववादी आंदोलन चल रहा है, वहीं टीटीपी देश में शरिया कानून थोपना चाहता है। जबकि लाहौर या कराची का एक आम छात्र सिर्फ बेरोजगारी और महंगाई से लड़ रहा है।
राज्य को किसी एक बड़े आंदोलन को नहीं हराना है, बल्कि बस यह सुनिश्चित करना है कि ये अलग-अलग समूह कभी एक बैनर तले न आ सकें। इसके अलावा, आतंकवाद के साये ने सेना को अपनी ताकत और दमनकारी नीतियों को जायज ठहराने का एक बड़ा बहाना दे दिया है।
इमरान खान का हश्र
पाकिस्तान के युवाओं ने देखा है कि जब कोई लोकप्रिय नेता सीधे सेना से टकराता है, तो उसका क्या हश्र होता है। इसका उदाहरण इमरान खान जेल में हैं और शासन उनके पूरे राजनीतिक वजूद को खत्म करने में लगा है।
जब इतने बड़े और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचाने जाने वाले नेता का यह हाल हो सकता है, तो एक आम युवा क्या कर लेगा? बलूच और पश्तून कार्यकर्ताओं के जबरन अपहरण और हत्याओं ने समाज में एक गहरा खौफ पैदा कर दिया है।
यही कारण है कि पाकिस्तान में जेन जी क्रांति की उम्मीद बहुत कम है। इस व्यवस्था ने दशकों से यह सुनिश्चित किया है कि युवा डरे हुए, निराश और बंटे रहें। जहां बाकी दुनिया में युवा अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं, वहीं पाकिस्तान का युवा सिर्फ किसी तरह जिंदा रहने की जद्दोजहद में लगा हुआ है।