ऑपरेशन सिंदूर पर पाकिस्तान बेनकाब, अमेरिका ने खोली आसिम मुनीर के सीजफायर के दावे की पोल
अमेरिकी दस्तावेजों से खुलासा हुआ है कि भारत के ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने वाशिंगटन में अमेरिकी अधिकारियों से बड़े पैमाने पर संपर्क साधा था। ...और पढ़ें

अमेरिका ने खोली पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर की पोल(फाइल फोटो)

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। अमेरिका के फॉरेन एजेंट्स रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत हाल ही में सार्वजनिक किए गए दस्तावेजों से एक बड़ा खुलासा हुआ है। इन दस्तावेजों के अनुसार, पिछले साल मई 2025 में भारत के ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने वाशिंगटन में अमेरिकी राजनेताओं, रक्षा अधिकारियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े हितधारकों के साथ बड़े पैमाने पर संपर्क साधा था।
पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर ने हाल ही में यह दावा किया था कि भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के बाद युद्धविराम के लिए अमेरिका से मध्यस्थता की गुहार लगाई थी। हालांकि, सामने आए ये नए राजनयिक दस्तावेज पाकिस्तानी सेना प्रमुख के दावों के बिल्कुल विपरीत कहानी बयां कर रहे हैं।
वाशिंगटन में पाकिस्तान की कूटनीतिक भागदौड़
एएनआई के अनुसार, 6 मई से 9 मई 2025 के बीच, जब भारत का ऑपरेशन सिंदूर अपने चरम पर था, तब पाकिस्तान ने वाशिंगटन में लगभग 60 बार संपर्क स्थापित किया। इन संपर्कों में अमेरिकी सांसद, कांग्रेस के कर्मचारी, ट्रेजरी विभाग के अधिकारी, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और रक्षा क्षेत्र से जुड़े लोग शामिल थे।
दस्तावेजों से पता चलता है कि 7 और 8 मई को पाकिस्तानी राजदूत के साथ बैठकों के अनुरोध मुख्य रूप से क्षेत्रीय तनाव के संदर्भ में किए गए थे। वहीं, 9 मई को गतिविधियां और तेज हो गईं, जिसमें पाकिस्तानी रक्षा अताशे ब्रिगेडियर इरफान अली की ओर से कई बैठकें आयोजित करने के प्रयास किए गए।
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पाकिस्तान ने जिन लोगों से संपर्क किया, उनमें अमेरिकी सैन्य दिग्गज ब्रायन मास्ट के साथ-साथ हाउस माइनॉरिटी लीडर हकीम जेफरीज, सीनेट मेजॉरिटी लीडर जॉन थ्यून और हाउस मेजॉरिटी लीडर स्टीव स्केलिस के कार्यालयों से जुड़े कर्मचारी और सलाहकार शामिल थे।
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असीम मुनीर के दावों की सच्चाई
रावलपिंडी में 'मरका-ए-हक' की पहली वर्षगांठ के अवसर पर जनरल असीम मुनीर ने दावा किया था कि भारत ने अमेरिकी नेतृत्व के माध्यम से मध्यस्थता की इच्छा जताई थी। मुनीर का कहना था कि पाकिस्तान ने व्यापक क्षेत्रीय शांति के हित में इसे स्वीकार किया। हालांकि, जमीनी हकीकत और राजनयिक दस्तावेज कुछ और ही संकेत देते हैं।
भारत ने हमेशा यह रुख बनाए रखा है कि यह युद्धविराम दोनों देशों के सैन्य अभियान महानिदेशकों (DGMO) के बीच हॉटलाइन पर हुई बातचीत का परिणाम था, जिसकी शुरुआत पाकिस्तानी पक्ष ने की थी।
भारत सरकार ने यह भी स्पष्ट किया था कि इस प्रक्रिया में किसी तीसरे पक्ष की कोई भूमिका नहीं थी। इसके अलावा, FARA के रिकॉर्ड स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि युद्धविराम से पहले वाशिंगटन में सक्रिय रूप से पैरवी करने और मदद मांगने वाला पक्ष वास्तव में पाकिस्तान ही था।

क्या था ऑपरेशन सिंदूर?
भारत ने 7 मई 2025 को पहलगाम आतंकी हमले के जवाब में 'ऑपरेशन सिंदूर' शुरू किया था। उस बर्बर आतंकी हमले में 25 भारतीयों और एक नेपाली नागरिक सहित कुल 26 आम नागरिक मारे गए थे। भारत के रक्षा मंत्रालय के अनुसार, तीनों सेनाओं के इस संयुक्त अभियान के तहत पाकिस्तान और पीओके (PoJK) में 9 प्रमुख आतंकी ठिकानों पर 'प्रिसिजन स्ट्राइक' (सटीक हमले) की गई थी।
इस खुफिया-आधारित मिशन का एकमात्र लक्ष्य आतंकी ढांचे को ध्वस्त करना था और यह सुनिश्चित किया गया था कि किसी भी पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान को निशाना न बनाया जाए। इस अभियान के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में स्पष्ट रूप से कहा था कि भारत पर किसी भी आतंकी हमले को युद्ध की कार्रवाई माना जाएगा।
उन्होंने जोर देकर कहा था कि भारत अब अपनी शर्तों और अपने तरीके से जवाब देगा, जो कि अब देश का न्यू नॉर्मल बन गया है। भारत सरकार का यह भी कहना है कि ऑपरेशन सिंदूर अभी भी जारी है और केवल इसका 88 घंटे का सक्रिय सैन्य चरण ही समाप्त हुआ है।
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भारत और पाकिस्तान की रणनीतियों में अंतर
संघर्ष के दौरान वाशिंगटन में भारत और पाकिस्तान के दृष्टिकोण में एक बड़ा अंतर देखने को मिला। दस्तावेजों से स्पष्ट होता है कि पहलगाम हमले के बाद भारत का कूटनीतिक प्रयास मुख्य रूप से आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक निंदा हासिल करने और इस अमानवीय कृत्य के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने पर केंद्रित था।
इसके विपरीत, एएनआई द्वारा जांचे गए दस्तावेजों में ऑपरेशन सिंदूर शुरू होने और युद्धविराम के बीच भारत की ओर से वाशिंगटन में वैसी कोई राजनयिक या रक्षा संबंधी पैरवी नहीं देखी गई जैसी पाकिस्तान ने की थी।
पाकिस्तान ने अपनी रक्षा और राजनीतिक मशीनरी को वाशिंगटन में पूरी तरह से सक्रिय कर दिया था, ताकि अमेरिकी राजनीतिक नेताओं और रक्षा अधिकारियों के साथ निरंतर जुड़ाव बनाकर स्थिति को अपने पक्ष में मोड़ा जा सके।
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