संजय गुप्त। अमेरिका में सत्ता परिवर्तन के बाद तेजी से बदले वैश्विक वातावरण में अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत से चिढ़कर जिस तरह सबसे अधिक 50 प्रतिशत टैरिफ लगाया, उसका सामना करने के लिए मोदी सरकार ने कमर कस ली है। उनकी जापान और चीन यात्रा को इसी सिलसिले में देखा जा रहा है। भारतीय प्रधानमंत्री की जापान और चीन यात्रा बेहद महत्वपूर्ण है। इस पर पूरी दुनिया की निगाह है।

अमेरिकी राष्ट्रपति ने चीन पर भी मनमाना टैरिफ लगाया था, लेकिन जब उसने प्रतिकार किया तो वे उसे कम करने और उससे वार्ता करने को बाध्य हुए। वे इसलिए भी बाध्य हुए, क्योंकि अमेरिका को अपनी अर्थव्यवस्था चलाने के लिए चीन की सख्त जरूरत है। अमेरिका ने टैरिफ के मामले में जापान से भी समझौता किया, पर वह खटाई में पड़ गया। जापान उन शर्तों को पूरा करने पर सहमत नहीं, जो ट्रंप ने उस पर लगाई थीं।

एक शर्त के अनुसार जापान को अमेरिका में 550 अरब डालर का निवेश करना था। जापान इस निवेश को लेकर असमंजस में है। इन्हीं स्थितियों में जापान ने भारत में निवेश करने की एक बड़ी पहल की है। जापानी कंपनियों ने अगले 10 वर्षों में छह लाख करोड़ रुपये निवेश करने पर सहमति जताई है। यह सहमति भारतीय अर्थव्यवस्था को बल प्रदान करने वाली है। वैसे तो भारत और जापान के रिश्ते पहले से ही प्रगाढ़ रहे हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि मौजूदा हालात में वे और अधिक मजबूत होने वाले हैं।

प्रधानमंत्री की जापान यात्रा से अधिक दिलचस्पी लोगों को उनकी चीन यात्रा को लेकर है। प्रधानमंत्री मोदी चीन में शंघाई सहयोग संगठन में हिस्सा लेने के लिए जापान के बाद वहां पहुंचे हैं। यह उनकी सात वर्षों बाद होने वाली चीन यात्रा है। भारत और चीन के संबंध 2020 में लद्दाख की गलवन घाटी में दोनों देशों के सैनिकों के बीच खूनी झड़प के बाद से बिगड़ गए थे। हाल में वे कुछ सुधरे हैं।

देखना यह है कि भारतीय प्रधानमंत्री और चीनी राष्ट्रपति की मुलाकात के बाद इन संबंधों में कितना सुधार आता है? चीन भी अमेरिका के रवैये के कारण भारत से संबंध सुधारने का इच्छुक है। वह भारत से आर्थिक मोर्चे पर कुछ ऐसे समझौते चाहता है, जिससे अमेरिकी चुनौती का सामना किया जा सके। निश्चित रूप से भारत को भी इस समय चीन की जरूरत है। इसका एक कारण तो अमेरिकी राष्ट्रपति का भारत विरोधी रवैया है और दूसरा, हमारे आर्थिक विकास में चीन का सहयोग महत्वपूर्ण होना है।

भारत और चीन के रिश्ते आजादी के बाद से ही उलझे रहे हैं। इन संबंधों में उतार-चढ़ाव आता रहा है। चीन ने भारत के हिंदी-चीनी भाई-भाई नारे की आड़ में भारतीय हितों पर कई बार आघात किया है। 1962 के युद्ध के बाद वह हमारे एक भूभाग को दबाए बैठा है और अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा करता रहता है। पहले डोकलाम और फिर गलवन घाटी की घटना के बाद भारत में चीन के प्रति संदेह बढ़ा है। भारत चीन को एक विस्तारवादी देश मानता है। इस मान्यता के पीछे कुछ ठोस कारण हैं।

वास्तव में उसकी विस्तारवादी नीति भारत के संदेह का एक बड़ा कारण है। इसके बाद भी इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के आर्थिक-व्यापारिक रिश्ते बहुत आगे बढ़े हैं। भारत का शायद ही कोई सेक्टर हो, जो चीनी सामग्री आयात न करता हो। इसी कारण भारत का आयात बिल बढ़ता जा रहा है। भारत और चीन के बीच व्यापार का पलड़ा चीन के पक्ष में झुका हुआ है। भारत तमाम प्रयासों के बाद भी चीन के साथ अपने व्यापार घाटे को कम नहीं कर पा रहा है। चीन भी इस दिशा में कुछ करने के लिए तैयार नहीं दिखता। उसका यह रवैया भी उसके प्रति संदेह को बढ़ाता है।

जब-जब चीन के साथ रिश्ते खराब होते हैं, तब-तब देश में स्वदेशी की आवाज उठती है और कुछ लोगों एवं संगठनों की ओर से चीनी वस्तुओं के बहिष्कार की बातें भी की जाती हैं, लेकिन सच यही है कि स्वदेशी और आत्मनिर्भरता की पहल ने कोई खास असर नहीं दिखाया है। कोविड महामारी के समय और फिर गलवन घाटी की घटना के बाद स्वदेशी और आत्मनिर्भरता की बातें तो खूब की गईं, लेकिन बात बनी नहीं।

अभी जब अमेरिका के साथ रिश्ते खराब हुए, तब प्रधानमंत्री मोदी और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत, दोनों ने स्वदेशी की पक्षधरता की, लेकिन हमारे छोटे-बड़े उद्योगपति आनन-फानन स्वदेशी की राह पर चलने में सक्षम नहीं दिख रहे हैं। यह वह हकीकत है, जिसकी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। एक हकीकत यह भी है भारत में आवश्यक भारी मशीनों, रसायनों, उच्च तकनीक आदि की कमी है। इन सबकी आपूर्ति चीन से होती है।

चीनी वस्तुओं पर भारत की निर्भरता और चीन के दुनिया का कारखाना बनने के पीछे कारण यह है कि वह विश्व के लिए आवश्यक तमाम सामग्री का बड़े पैमाने पर उत्पादन करता है। उसने गुणवत्ता के मामले में भी सुधार किया है और उसकी वस्तुएं सस्ती भी पड़ती हैं। उसने उच्च तकनीक भी हासिल कर ली है। यह वह एक और कारण है, जिसके चलते भारत के तमाम उद्योग चीन पर अपनी निर्भरता खत्म नहीं कर पा रहे हैं। भारत को अपने तेज आर्थिक विकास और आधारभूत ढांचे को बेहतर बनाने के लिए जिस तकनीक, सामग्री और आर्थिक सहयोग की आवश्यकता है, वह चीन उपलब्ध कराने में समर्थ है, लेकिन भारत उससे अधिकाधिक सहयोग तभी ले सकता है, जब दोनों देशों के रिश्ते बेहतर हों। इसके लिए भारत को भी सक्रिय होना होगा और चीन को भी।

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के बेतुके रवैये ने भारत को एक अवसर प्रदान किया है। भारतीय प्रधानमंत्री की चीन यात्रा को इसी अवसर को भुनाने के संदर्भ में देखा जा रहा है। जापान में भारतीय प्रधानमंत्री ने कहा कि दोनों देशों की साझेदारी वैश्विक शांति और स्थिरता के लिए भी महत्वपूर्ण है। यदि चीन इस साझेदारी के महत्व को समझ सके तो भारत के साथ-साथ उसे भी लाभ होगा। चीन के इरादों की थाह लेते हुए भारत की पहली प्राथमिकता अपने आर्थिक विकास को तेज गति देने की होनी चाहिए। इसलिए होनी चाहिए, क्योंकि भारत को आर्थिक विकास के मोर्चे पर अभी बहुत कुछ करना है।

[लेखक दैनिक जागरण के प्रधान संपादक हैं]