विचार: विश्व को अस्थिर करता अमेरिका, वेनेजुएला और ईरान के बाद अब ग्रीनलैंड पर ट्रंप की नजर
ट्रंप वेनेजुएला और ईरान के बाद अब ग्रीनलैंड पर कब्जा करने के इरादे जता रहे हैं, जिससे वैश्विक चिंता बढ़ गई है। ग्रीनलैंड के तेल, गैस और सामरिक महत्व पर उनकी नजर है। ईरान में भी वे अस्थिरता बढ़ा रहे हैं, जिससे उसके सहयोगी देशों पर असर पड़ रहा है। यह लेख अमेरिका की ऐसी नीतियों को विश्व में बढ़ती अस्थिरता का कारण बताता है, जहां संयुक्त राष्ट्र भी असहाय दिख रहा है।
HighLights
ट्रंप ग्रीनलैंड पर कब्जे के इरादे जता रहे हैं।
ईरान में अस्थिरता बढ़ाने की अमेरिकी कोशिशें जारी।
अमेरिकी नीतियों से विश्व में अस्थिरता बढ़ने की चिंता।
संजय गुप्त। अंतरराष्ट्रीय नियम-कानून को धता बताकर वेनेजुएला पर अमेरिका के हमले और वहां के राष्ट्रपति के अपहरण की चर्चा अभी समाप्त भी नहीं हुई थी कि डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड पर कब्जा करने का एलान कर दिया। हालांकि ग्रीनलैंड को हासिल करने की बातें उन्होंने पहले भी की थीं, लेकिन तब अंतरराष्ट्रीय समुदाय और विशेष रूप से यूरोप ने उनकी बातों को हल्के में लिया था, लेकिन अब उनकी चिंता बढ़ रही है, क्योंकि ट्रंप डेनमार्क के इस स्वायत्तशासी क्षेत्र पर हर हाल में कब्जे के इरादे जता रहे हैं।
इस कारण सैन्य संगठन नाटो में शामिल कुछ यूरोपीय देश अपने सैनिकों को ग्रीनलैंड भेज रहे हैं। ग्रीनलैंड के साथ डेनमार्क के नेताओं ने स्पष्ट कर दिया है कि वे ट्रंप के इरादों को पूरा नहीं होने देंगे, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति किसी की नहीं सुन रहे हैं। वे नाटो का अंत होने की डेनमार्क की चेतावनी का उपहास उड़ाकर कह रहे हैं कि यदि आज से पांच सौ साल पहले डेनमार्क की कोई नौका ग्रीनलैंड पहुंची तो इसका यह अर्थ नहीं कि वह उसका हो गया।
ग्रीनलैंड का क्षेत्रफल भारत के क्षेत्रफल का लगभग 70 प्रतिशत है। यह विश्व का सबसे बड़ा द्वीप है। यहां तेल, गैस और दुर्लभ खनिज के भंडार हैं। यहां की बर्फ पिघलने के कारण इन संसाधनों के दोहन की संभावनाएं बढ़ रही हैं। जाहिर है कि इन पर ट्रंप की भी निगाह है। इसके अलावा इस द्वीप का सामरिक महत्व भी है। चूंकि ग्रीनलैंड के साथ उसके आसपास की भी बर्फ पिघल रही है, इसलिए समुद्री रास्तों से वहां तक रूस और चीन की पहुंच आसान हो रही है। इसी कारण ट्रंप कह रहे हैं कि ग्रीनलैंड पर रूस और चीन की निगाह है।
हालांकि अतीत में भी अमेरिका के राष्ट्रपतियों ने ग्रीनलैंड को अपना हिस्सा बनाने की बातें की थीं, पर वे कभी इस दिशा आगे नहीं बढ़े। हां, एक समझौते के तहत 1951 में अमेरिका ने ग्रीनलैंड में अपना सैन्य अड्डा कायम कर लिया। यह अभी भी है। ट्रंप का तर्क है कि रूस और चीन का ग्रीनलैंड पर वर्चस्व कायम हो, इसके पहले अमेरिका को उसे अपना हिस्सा बना लेना चाहिए। रूस का कहना है कि ट्रंप अकारण यह कह रहे हैं कि वह ग्रीनलैंड पर कब्जा करना चाहता है। जो भी हो, आज यह नहीं कहा जा सकता कि रूस या फिर चीन अमेरिका को ग्रीनलैंड पर कब्जा करने से रोक सकेंगे।
इसका कारण यह है कि यूरोपीय देश रूस की मदद लेने को तो बिल्कुल भी तैयार नहीं होंगे, क्योंकि वह पहले से ही उनकी सुरक्षा के लिए खतरा बना हुआ है। यूक्रेन के खिलाफ रूस के युद्ध ने यूरोपीय देशों को सशंकित कर रखा है। ऐसे में यदि ट्रंप ग्रीनलैंड पर सच में कब्जा करने की दिशा में आगे बढ़ें तो हैरानी नहीं। डेनमार्क और यूरोपीय देशों के विरोध के बावजूद एक चिंताजनक तथ्य यह है कि अमेरिका में कई सांसद ट्रंप के इस विचार से सहमत हैं कि ग्रीनलैंड को वैसे ही अमेरिका का हिस्सा बनाना चाहिए, जैसे अलास्का को बनाया गया था। कहना कठिन है कि आगे क्या स्थितियां बनेंगी, लेकिन इसमें संदेह नहीं कि ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप के रवैये से यूरोप के साथ-साथ शेष विश्व भी चिंतित है।
ट्रंप केवल ग्रीनलैंड में ही कब्जा करने के लिए उतावले नहीं दिख रहे हैं। वे ईरान में भी सैन्य हस्तक्षेप करने के संकेत दे रहे हैं। हालांकि पिछले दिनों उन्होंने यह कहा कि फिलहाल ईरान में दखल देने की जरूरत नहीं, लेकिन उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह किसी से छिपा नहीं की ईरान की कट्टरपंथी इस्लामी सत्ता उन्हें स्वीकार नहीं। वास्तव में अमेरिका को वह कोई भी देश रास नहीं आता, जो उसके इशारे पर न चले।
अमेरिका ने इस आधार पर ईरान पर तमाम प्रतिबंध लगा रखे हैं कि वह परमाणु हथियार बनाने की कोशिश कर रहा है। इन प्रतिबंधों के कारण ही ईरान आर्थिक संकट से घिरा और उसके चलते वहां लोग सड़कों पर उतर आए। ईरानी सत्ता अपने लोगों की बात सुनने के बजाय उनकी आवाज सख्ती से दबा रही है। इसके चलते वहां सैकड़ों लोग मारे गए हैं। ट्रंप ईरान की उथल-पुथल का लाभ उठाने की कोशिश में दिखते हैं। वे कह रहे हैं कि ईरान के लोग अपना विरोध जारी रखें।
ईरान के प्रति ट्रंप के आक्रामक रवैये पर रूस और चीन तो आपत्ति जता रहे हैं, लेकिन यूरोपीय देश ढुलमुल रवैया अपनाए हुए हैं। ट्रंप की ईरान के तेल भंडारों पर भी निगाह है और वे यह नहीं चाहते कि वह अपना तेल व्यापार डॉलर के अलावा अन्य मुद्राओं में करे और इस तरह डॉलर के प्रभुत्व को चुनौती दे। इसके चलते आशंका यही है कि ट्रंप मौका देखकर ईरान में लोकतंत्र बहाली की आड़ में वहां तख्तापलट की कोशिश कर सकते हैं। इसमें ईरान के आखिरी शाह के बेटे रजा पहलवी मददगार हो सकते हैं, जो निर्वासित होकर अमेरिका में रह रहे हैं।
उनका कहना है कि वे ईरान लौटेंगे। यदि ट्रंप ने ईरान में हस्तक्षेप किया तो यह देश वैसी ही अस्थिरता से घिर सकता है, जैसे इराक घिर गया था। ध्यान रहे इराक को भी अमेरिका ने मूलतः उसके तेल भंडारों के कारण ही निशाना बनाया था।
ट्रंप ईरान के साथ उसके सहयोगियों का भी संकट बढ़ा ही रहे हैं। उन्होंने कहा है कि जो भी देश उससे व्यापार करेंगे, उस पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाया जाएगा। ईरान से व्यापार करने वाले प्रमुख देशों में चीन, रूस, संयुक्त अरब अमीरात और भारत हैं। साफ है कि ट्रंप के रवैये से भारत की समस्या भी बढ़ने वाली है। चूंकि ईरान में सामाजिक असंतोष के कारण अस्थिरता व्याप्त है, इसलिए ट्रंप प्रत्यक्ष न सही, परोक्ष हस्तक्षेप कर सकते हैं-ठीक वैसे ही जैसे बांग्लादेश में शेख हसीना के खिलाफ जो आंदोलन चला, उसके पीछे पश्चिमी ताकतों का हाथ था।
ईरान के मामले में तो यह खुलकर सामने आ रहा है कि अमेरिका वहां अशांति बढ़ा रहा है। पता नहीं ट्रंप के मन में क्या हैं, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि अमेरिका ने जिस भी देश में छल-बल से सत्ता परिवर्तन कराया, वे अस्थिरता से ग्रस्त हुए। ट्रंप की मनमानी इसलिए बढ़ती जा रही है, क्योंकि विश्व के प्रमुख देश अमेरिका को सीधी चुनौती दे सकने में सक्षम नहीं और संयुक्त राष्ट्र बिल्कुल असहाय है। ऐसे में आने वाले समय में ट्रंप के चलते विश्व में अस्थिरता फैले तो आश्चर्य नहीं।












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