विचार: आवश्यक है आर्थिक कर्तव्य पूरे करना, बजट में गिनाए गए तीन कर्तव्य
कर्तव्य संस्कृत भाषा का शब्द है। केवल ‘ड्यूटी’ कह देने से इसका अर्थ हल्का पड़ जाता है। इसकी व्युत्पत्ति कृ और तव्य से मिलकर हुई है। कृ धातु का अर्थ है करना, कर्म में उतरना और तव्य अनिवार्यता को दर्शाता है। इस प्रकार कर्तव्य कोई नैतिक भावना या इच्छापूर्ण संकल्प नहीं, बल्कि परिस्थितियों, सीमाओं और अपरिहार्य समझौतों के बीच किया गया एक बौद्धिक दावा है कि क्या किया जाना अनिवार्य है।
HighLights
विकास को बनाए रखना, प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाना प्रमुख कर्तव्य।
मानव पूंजी, कौशल विकास से क्षमता निर्माण पर जोर।
व्यापक पहुंच, सहभागिता सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण लक्ष्य।
आदित्य सिन्हा। कर्तव्य संस्कृत भाषा का शब्द है। केवल ‘ड्यूटी’ कह देने से इसका अर्थ हल्का पड़ जाता है। इसकी व्युत्पत्ति कृ और तव्य से मिलकर हुई है। कृ धातु का अर्थ है करना, कर्म में उतरना और तव्य अनिवार्यता को दर्शाता है। इस प्रकार कर्तव्य कोई नैतिक भावना या इच्छापूर्ण संकल्प नहीं, बल्कि परिस्थितियों, सीमाओं और अपरिहार्य समझौतों के बीच किया गया एक बौद्धिक दावा है कि क्या किया जाना अनिवार्य है। आज जब वैश्विक व्यवस्था अस्थिर है, अमेरिका में ट्रंप-युग की टैरिफ राजनीति व्यापार को हथियार बना रही है और भारत जटिल एवं असहयोगी पड़ोसियों से घिरा है, तब कर्तव्य का यह अर्थ और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
ऐसे भू-राजनीतिक तनावों में नीति की वैधता घोषणाओं से नहीं, बल्कि इस स्पष्टता से आती है कि राज्य किन अनिवार्य कार्यों को चुनता है और उन्हें करने का साहस दिखाता है। इस दृष्टि से केंद्रीय बजट 2026-27 महत्वपूर्ण है। इसमें तीन ‘कर्तव्यों’ जैसे कि विकास को बनाए रखने, क्षमताओं और आकांक्षाओं का निर्माण करने तथा पहुंच और सहभागिता सुनिश्चित करने पर ध्यान केंद्रित किया गया है। यह बजट को योजनाओं के संकलन से राज्य की कार्रवाई के सिद्धांत की ओर ले जाने का एक सुनियोजित प्रयास दर्शाता है। एक ऐसा सिद्धांत, जो पूछता है कि यदि 2047 तक विकसित भारत की महत्वाकांक्षा को विश्वसनीय बनाए रखना है, तो सरकार को आज क्या करना चाहिए?
पहला ‘कर्तव्य’ विकास को तेज करना और उसे बनाए रखना इसी यथार्थवाद को प्रतिबिंबित करता है। यहां विकास को किसी ऐसे वैरिएबल के रूप में नहीं देखा गया है जिसे केवल प्रोत्साहन देकर बढ़ाया जाए, बल्कि उसे प्रतिस्पर्धात्मकता, लचीलापन और घरेलू क्षमताओं के परिणाम के रूप में परिभाषित किया गया है। जैव-फार्मा, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रानिक्स कंपोनेंट्स, रेयर अर्थ, रसायन, पूंजीगत वस्तुएं, वस्त्र और खेल उपकरणों तक फैली औद्योगिक रणनीति उस टैरिफ युक्त वैश्विक व्यवस्था के प्रति प्रतिक्रिया का संकेत देती है, जहां उत्पादन पारिस्थितिकी तंत्र का स्वामित्व निर्णायक बन चुका है। इसके लिए पांच वर्षों में बायोफार्मा शक्ति के लिए ₹10,000 करोड़ रुपये एवं इलेक्ट्रानिक्स कंपोनेंट्स सहायता का विस्तार करने के लिए ₹40,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं।
चार राज्यों में रेयर अर्थ कारिडोर बनाने और ₹10,000 करोड़ रुपये का कंटेनर विनिर्माण कार्यक्रम शुरू करने की बात कही गई है। साझा बुनियादी ढांचे और जोखिम आवंटन पर जोर देना भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना कि फर्म-विशिष्ट प्रोत्साहनों पर। हाई-टेक टूल रूम, केमिकल पार्क, मेगा टेक्सटाइल पार्क और 200 पुराने औद्योगिक क्लस्टरों के पुनर्जीवन का उद्देश्य पूरे अर्थतंत्र में स्थिर लागतों को कम करना है। इन्फ्रास्ट्रक्चर रिस्क गारंटी फंड एक और कड़ी वास्तविकता को स्वीकार करता है। ऊंची ब्याज दरों और जोखिम से बचने वाले वैश्विक माहौल में निजी पूंजी तब तक नहीं आएगी, जब तक प्रारंभिक चरण के जोखिम का सार्वजनिक आकलन नहीं किया जाता।
दूसरा ‘कर्तव्य’ आकांक्षाओं और क्षमताओं का निर्माण इस अनुशासन को मानव पूंजी तक विस्तार देता है। यहां कौशल को कल्याणकारी सहायता के रूप में नहीं, बल्कि उत्पादक क्षमता के रूप में परिभाषित किया गया है। शिक्षा-से-रोजगार और उद्यमिता पर स्थायी समिति के समर्थन के साथ सेवा क्षेत्र पर केंद्रित दृष्टिकोण 2047 तक वैश्विक सेवाओं के निर्यात में 10 प्रतिशत हिस्सेदारी हासिल करना एक स्पष्ट महत्वाकांक्षा को दर्शाता है। यहां जोर वादों पर नहीं, बल्कि ठोस नीतियों पर है। पांच वर्षों में एक लाख सहायक स्वास्थ्य पेशेवर एवं अगले वर्ष में 1.5 लाख देखभाल करने वाले लोगों को तैयार करना तथा एवीजीसी, डिजाइन, पर्यटन और खेल जैसे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर संस्थागत निवेश बढ़ाना इसी का हिस्सा है।
तीसरा ‘कर्तव्य’ पहुंच और सहभागिता इस ढांचे को राजनीतिक रूप से आधार प्रदान करता है। भू-राजनीतिक अस्थिरता के दौर में वह विकास जो व्यापक समावेशन से वंचित हो, अंततः कमजोर सिद्ध होता है। इसीलिए सहभागिता को उत्पादक क्षमता तक पहुंच के रूप में परिभाषित किया गया है। उच्च-मूल्य कृषि और एआइ-सक्षम परामर्श प्रणालियां, महिला-नेतृत्व वाले उद्यम, कौशल से जुड़ी दिव्यांगता नीति, मानसिक स्वास्थ्य क्षमताओं का विस्तार तथा ‘पूर्वोदय’ राज्यों और पूर्वोत्तर क्षेत्र का लक्षित विकास इसी के अंग हैं।
ये तीन कर्तव्य एक कठोर वैश्विक अर्थव्यवस्था के प्रति एक सुसंगत प्रतिक्रिया का निर्माण करते हैं। भारत अन्य देशों द्वारा लगाए गए टैरिफ या भू-राजनीतिक झटकों को सीधे नियंत्रित नहीं कर सकता, लेकिन वह अपनी संस्थागत तैयारी, उत्पादकता के आधार और सामाजिक एकजुटता को अवश्य आकार दे सकता है। बजट की राजकोषीय नीति इस विश्वसनीयता को और मजबूत करती है। जैसे कि बिना सख्ती के मजबूती, बिना ज्यादा खर्च के निवेश और बिना किसी रुकावट के सुधार पर जोर देती है। ‘कर्तव्य’ का अर्थ है ऐसा कर्म, जो राजनीतिक चक्रों और तात्कालिक प्रशंसा से परे जाकर लगातार निभाया जाए। टैरिफ राजनीति और भू-राजनीतिक अस्थिरता से भरी दुनिया में 2047 की ओर बढ़ते भारत के लिए यही वह सबसे संभावित यथार्थवादी ज्ञान-दृष्टि है, जिसे सरकार अपना सकती है।
(लेखक लोक-नीति विश्लेषक हैं)













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