विचार: बड़े और ठोस सुधारों का इंतजार, कायम रहना चाहिए रिफॉर्म का सिलसिला
आर्थिक सर्वेक्षण ने भारत की तीव्र आर्थिक वृद्धि को रेखांकित किया, लेकिन 'विकसित भारत' के लक्ष्य हेतु व्यापक सुधारों की आवश्यकता पर बल दिया। निजी क्षेत्र को 7% से अधिक विकास दर बनाए रखने के लिए मुख्य इंजन बताया गया, जिसे विनिर्माण और अनुसंधान में निवेश करना होगा। राज्य सरकारों की सक्रियता, नौकरशाही में सुधार, शहरी ढांचे का विकास और कृषि उत्पादकता बढ़ाना भी महत्वपूर्ण बताया गया है।
HighLights
आर्थिक सर्वेक्षण ने भारत की तेज वृद्धि को रेखांकित किया।
विकसित भारत हेतु व्यापक और सतत सुधारों की आवश्यकता।
निजी क्षेत्र, राज्य सरकारें, नौकरशाही में सुधार महत्वपूर्ण।
संजय गुप्त। संसद में पेश आर्थिक सर्वेक्षण ने यह रेखांकित किया कि तमाम चुनौतियों के बाद भी भारत सबसे तेज गति से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बना रहेगा, लेकिन यदि विकसित भारत के लक्ष्य को सचमुच पाना है तो इन चुनौतियों से पार पाना होगा और चुनौतियों से पार तभी पाया जा सकता है, जब आमूलचूल सुधार किए जाएंगे और उन पर तेजी से अमल भी किया जाएगा।
यह ठीक है कि प्रधानमंत्री ने कहा कि बजट से रिफॉर्म एक्सप्रेस को गति मिलेगी, लेकिन देखना यह है कि सभी आवश्यक सुधार हो पाते हैं या नहीं? क्या यह उम्मीद की जाए कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण बजट में व्यापक सुधारों की घोषणा करेंगी। वास्तव में केवल बजट में ही कुछ बड़े और बुनियादी सुधारों की घोषणा नहीं की जानी चाहिए, बल्कि सुधारों का सिलसिला कायम रहना चाहिए।
इसके साथ ही यह भी समझना होगा कि आर्थिक विकास को केवल सरकारी प्रयासों से गति नहीं दी जा सकती। आर्थिक सर्वेक्षण साफ तौर पर यह कह रहा है कि विकास को अपेक्षित गति देने के लिए निजी क्षेत्र को अपनी सक्रियता दिखानी होगी। विश्व भर में आर्थिक मोर्चे पर जैसी उथल-पुथल हो रही है और अनिश्चितता का जैसा वातावरण है, उसमें सरकार और निजी क्षेत्र को कंधे से कंधा मिलाकर चलना होगा। अभी ऐसी स्थिति नहीं है। निजी क्षेत्र उन चुनौतियों का सामना करने के लिए कमर कसते हुए नहीं दिख रहा है, जो अर्थव्यवस्था के समक्ष आ खड़ी हुई हैं।
जब आर्थिक समीक्षा यह स्पष्ट करती है कि निजी क्षेत्र अब केवल एक भागीदार नहीं है, बल्कि 7 प्रतिशत से अधिक की विकास दर को बनाए रखने के लिए मुख्य इंजन है, तब उसे इसी भूमिका में आना होगा और देश को मैन्युफैक्चरिंग का गढ़ बनाने के साथ शोध एवं विकास में निवेश करना होगा। उसे तकनीक संचालित अर्थव्यवस्था की ओर भी बढ़ना होगा और उत्पादकता के मामले में भी सुधार करना होगा। इससे ही हमारे उत्पाद विश्व स्तरीय बनेंगे और उनकी विश्व में मांग बढ़ेगी। आज ऐसा नहीं है और इसी कारण आर्थिक समीक्षा में यह कहा गया है कि कई आयात अवांछनीय हैं।
यह भी स्पष्ट है कि अभी देश में उच्चतम गुणवत्ता वाली वस्तुओं का उत्पादन नहीं हो पा रहा है। इस पर गौर किया जाए कि आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि दोयम दर्जे की गुणवत्ता की वस्तुएं बनाने वालों को संरक्षण देने का कोई मतलब नहीं है। यदि वे प्रतिस्पर्धी नहीं बनते तो उन्हें संरक्षण देना समस्या को बढ़ाना ही है। आज जब स्वदेशी की बातें हो रही हैं, तब उस सामग्री के आयात का कोई औचित्य नहीं, जिसे देश में निर्मित किया जा सकता है।
देश की आर्थिक सूरत बदलने के लिए जरूरी है कि राज्य सरकारें भी आर्थिक माहौल को बदलने के लिए वैसी ही तत्परता दिखाएं, जैसी केंद्र सरकार दिखा रही है। उद्योग-धंधों का सही से विकास तभी हो सकता है, जब राज्य सरकारें अनुकूल माहौल निर्माण करने के लिए एक-दूसरे से होड़ करती दिखेंगी। अभी तीन-चार राज्य ही इसमें शामिल दिखते हैं। कई तो ऐसा दिखाते हैं, जैसे देश का आर्थिक विकास करना और विकसित भारत का लक्ष्य हासिल करना केवल केंद्र सरकार का काम है।
यह भी ठीक नहीं कि राज्य सरकारें आर्थिक मामलों में राजनीति करती दिखें। कुछ राज्य सरकारें जिस तरह राजकोषीय अनुशासन बनाए रखने को लेकर लापरवाह दिखती हैं, वह शुभ संकेत नहीं।
जैसे केंद्र सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उसकी नौकरशाही आर्थिक विकास की बाधाओं को दूर करने का काम प्राथमिकता के आधार पर करे, वैसे ही राज्य सरकारों को भी अपनी नौकरशाही के रुख-रवैये को बदलना होगा। आज नौकरशाही अड़ंगे लगाने और उद्योग-व्यापार जगत को हतोत्साहित करने के लिए ही अधिक जानी जाती है। उसके ऐसे ही रवैये के कारण कारोबारी सुगमता केवल कागजों पर ही बेहतर नजर आती है।
सच यह है कि नए उद्योग-धंधे लगाना अभी भी जटिल और समय खपाऊ बना हुआ है। नौकरशाही के प्रतिकूल रवैये के कारण अपने देश में विकास के कई काम इस तरह होते हैं कि उनसे संसाधनों की बर्बादी होती रहती है। यह भी एक तथ्य है कि नौकरशाही का भ्रष्टाचार एक बड़ी समस्या बना हुआ है। औसत नौकरशाहों का रवैया खुद को माई-बाप मानने वाला है। जवाबदेही के अभाव के चलते स्थितियां सुधरने का नाम नहीं ले रही हैं।
आर्थिक समीक्षा में उद्यमी राज्य की जिस अवधारणा का उल्लेख किया गया है, उसकी पूर्ति तब होगी, जब शासन-प्रशासन के लोग पारंपरिक तरीके से काम करने के बजाय तेजी से निर्णय लेंगे, जरूरत पड़ने पर उनमें सुधार करेंगे और नवाचार को बढ़ावा देंगे। अनिश्चितता के दौर में ऐसा करना और भी आवश्यक हो गया है, लेकिन दुर्भाग्य से इस प्रवृत्ति का अभाव ही दिखता है। नौकरशाही में जोखिम लेने की क्षमता विकसित करने के लिए यह जरूरी है कि जहां उसे बेवजह की कानूनी प्रक्रियाओं से बचाने के उपाय किए जाएं, वहीं भ्रष्टाचार को सहन न किया जाए।
एक लंबे समय से यह कहा जा रहा है कि शहर आर्थिक विकास के इंजन हैं, लेकिन अपने देश में शहरी ढांचे में कोई उल्लेखनीय सुधार आने के बजाय वह चरमराता हुआ ही दिखता है। यह समझने में देर नहीं की जानी चाहिए कि केवल फुटपाथ ठीक करने या दो-चार फ्लाईओवर बना देने से शहरों का ढांचा सुधरने वाला नहीं है। अभी शहरी विकास के नाम पर ऐसे ही काम हो रहे हैं और इसी कारण आर्थिक समीक्षा में शहरों के असंतुलित विकास पर चिंता व्यक्त की गई है। शहरों का विकास इस तरह किया जाना चाहिए, जिससे आधारभूत ढांचे का विकास होने के साथ ही शहरी जीवन सुविधाजनक हो। ऐसे माहौल में ही शहरों में उद्योग-धंधे सही तरह विकसित होंगे।
आर्थिक समीक्षा जिन अन्य अनेक चुनौतियों को इंगित कर रही है, उनमें प्रमुख है कृषि की उत्पादकता न बढ़ना। कृषि क्षेत्र में जिन व्यापक संरचनात्मक सुधारों की जरूरत है, उनकी पूर्ति प्राथमिकता के आधार पर होनी चाहिए। यह पूर्ति केंद्र और राज्यों, दोनों को मिलकर करनी होगी। इससे ही विकास दर को 7 प्रतिशत से अधिक रखा जा सकता है। यदि देश को विकसित बनाना है तो विकास दर को 8 प्रतिशत के करीब ले जाना होगा। चूंकि सुधार एक सतत प्रक्रिया हैं, इसलिए वे बजट का मोहताज नहीं रहने चाहिए। बड़े और ठोस सुधार करने में देरी का कोई औचित्य नहीं।













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