विचार: आखिर कब निकाले जाएंगे घुसपैठिए? केवल चुनाव के समय ही चर्चा करना ठीक नहीं
जब नागरिकता कानून में संशोधन किया गया था, तब यह कहा गया था कि उसे लागू करने के बाद राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर अर्थात एनआरसी का काम शुरू किया जाएगा, लेकिन फिलहाल ऐसे किसी अभियान की कोई चर्चा नहीं। हर किसी को पूछना चाहिए आखिर क्यों?
HighLights
घुसपैठियों का मुद्दा केवल चुनावी चर्चा तक सीमित
राज्य सरकारों के असहयोग से पहचान मुश्किल
राष्ट्रीय सुरक्षा और जनसांख्यिकी के लिए बड़ा खतरा
राजीव सचान। जब बिहार विधानसभा के चुनाव हो रहे थे, तब बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा उभरा था। उसके पहले झारखंड विधानसभा चुनाव के दौरान भी घुसपैठियों को बड़ा खतरा बताया गया था। चूंकि असम और पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव करीब आ रहे हैं, इसलिए एक बार फिर घुसपैठियों की चर्चा हो रही है। पिछले दिनों बंगाल गए केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि राज्य में भाजपा की सरकार बन जाए तो घुसपैठियों को चुन-चुन कर निकाला जाएगा। इसके पहले उन्होंने असम में कहा था कि यदि इस राज्य में तीसरी बार भाजपा सरकार बन जाए तो घुसपैठियों को निकालने में देर नहीं होगी। इसका अर्थ है कि असम में पिछले लगभग दस वर्षों में बांग्लादेशी घुसपैठियों को निकालने का काम नहीं किया जा सका। हर किसी को पूछना चाहिए आखिर क्यों? यह ठीक नहीं कि केवल चुनाव के समय घुसपैठियों की चर्चा की जाए और फिर कुछ न किया जाए। इससे तो घुसपैठिए और उन्हें घुसाने वाले सतर्क ही होते होंगे।
बांग्लादेशी घुसपैठियों से सर्वाधिक प्रभावित राज्यों में असम है। बांग्लादेशी असम के अलावा मेघालय और त्रिपुरा के रास्ते से भी घुससैठ करते हैं। फिल्म अभिनेता सैफ अली खान पर हमला करने वाला घुसपैठिया मेघालय के रास्ते ही मुंबई आया था। बांग्लादेशी घुसपैठिए सीमावर्ती राज्यों में घुसकर इसलिए दूसरे राज्यों में जाने में सफल रहते हैं, क्योंकि वे कोई न कोई फर्जी पहचान पत्र हासिल कर लेते हैं। इसके बाद उनका काम आसान हो जाता है। पूर्वोत्तर और बंगाल में घुसपैठ करने वाले बांग्लादेशी गुजरात, कर्नाटक और दिल्ली तक में बस गए हैं। यदा-कदा कुछ राज्य सरकारें उनकी पहचान करने का अभियान चलाती हैं, लेकिन अभी तक कोई अभियान प्रभावी नहीं सिद्ध हो सका है।
आपरेशन सिंदूर के दौरान गुजरात में हजारों बांग्लादेशियों को पकड़ा गया था। यह स्वाभाविक ही है कि इस अभियान के समय तमाम बांग्लादेशी अन्य राज्यों में खिसक गए होंगे। जो कहानी बांग्लादेशी घुसपैठियों की है, वही रोहिंग्याओं की भी है। रोहिंग्या भी पूर्वोत्तर और बंगाल के रास्ते घुसपैठ करने के बाद जिस तरह दिल्ली, हैदराबाद और जम्मू तक में अपने ठिकाने बनाने में सफल हैं, उससे यह साफ है कि उन्हें भारत में लाने और बसाने का काम सुनियोजित तरीके से हो रहा है। इस काम में लिप्त लोग घुसपैठियों को फर्जी प्रमाणपत्र उपलब्ध कराने का भी काम करते हैं। ऐसा काम करने वाले बंगाल में खूब सक्रिय हैं।
निःसंदेह घुसपैठ रोकना केंद्र सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन यह भी सही है कि यदि राज्य सरकारें इस काम में केंद्र का सहयोग नहीं करतीं तो घुसपैठियों की पहचान आसान नहीं। बंगाल सरकार का यह कहना तो ठीक है कि यदि घुसपैठ हो रही है तो उसके लिए केंद्र सरकार जिम्मेदार है, लेकिन केंद्र के इस सवाल का जवाब भी मिलना चाहिए कि राज्य प्रशासन की ओर से घुसपैठियों को लेकर कभी कोई शिकायत क्यों नही की जाती? तथ्य यह है कि बंगाल के किसी भी थाने से कोई ऐसी शिकायत नहीं मिलती कि बांग्लादेश से किसी ने अवैध तरीके से प्रवेश किया है।
शिकायत इसलिए भी नहीं मिलती, क्योंकि स्थानीय नेता घुसपैठियों को अपने वोट बैंक के रूप में देखते हैं। एक समय ममता बनर्जी घुसपैठ के खिलाफ आवाज उठाती थीं, लेकिन बंगाल की मुख्यमंत्री बनने के बाद से वे घुसपैठियों को चिह्नित करने की किसी भी पहल का विरोध करती हैं। मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण अर्थात एसआइआर के विरोध की एक बड़ी वजह यही आशंका है कि कहीं इससे घुसपैठियों की पहचान न हो जाए। बंगाल में एसआइआर की प्रक्रिया शुरू होते ही सैकड़ों बांग्लादेशी अपने देश लौटने लगे थे।
कुछ समय बाद उनके लौटने का सिलसिला थम गया। कोई भी समझ सकता है कि यह इसीलिए थमा, क्योंकि उन्हें यह भरोसा हो गया होगा कि इस कवायद से उनकी पहचान नहीं होने वाली। हैरानी नहीं कि उनके संरक्षक नेताओं ने ही उन्हें यह भरोसा दिलाया हो कि उन्हें घबराने की जरूरत नहीं। जो भी हो, इससे इन्कार नहीं कि भारत में बड़ी संख्या में बांग्लादेशी घुसपैठिए हैं। असम और बंगाल में तो उनकी इतनी संख्या हो गई है कि उन्होंने न केवल आबादी के संतुलन को बुरी तरह बिगाड़ दिया है, बल्कि वे कई क्षेत्रों में चुनाव परिणाम प्रभावित करने की स्थिति में आ गए हैं, क्योंकि वे छल-कपट से मतदाता बन गए हैं।
घुसपैठिए केवल देश के संसाधनों पर बोझ ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा भी हैं। अब यह खतरा और अधिक गंभीर हो सकता है, क्योंकि बांग्लादेश के साथ संबंध अब पहले जैसे नहीं रहे और इसका भरोसा नहीं कि वहां की नई सरकार की भारत से संबंध सुधारने में दिलचस्पी होगी। इन दिनों पाकिस्तान बांग्लादेश को अपना हितैषी दिखाने के लिए न केवल हरसंभव जतन कर रहा है, बल्कि उसे भारत के खिलाफ उकसा भी रहा है। इन स्थितियों में अवैध बांग्लादेशियों और रोहिंग्याओं की पहचान कर उन्हें निकालने के लिए केंद्र सरकार की ओर से कोई राष्ट्रव्यापी अभियान चलाया ही जाना चाहिए। जब नागरिकता कानून में संशोधन किया गया था, तब यह कहा गया था कि उसे लागू करने के बाद राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर अर्थात एनआरसी का काम शुरू किया जाएगा, लेकिन फिलहाल ऐसे किसी अभियान की कोई चर्चा नहीं। हर किसी को पूछना चाहिए आखिर क्यों?
(लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडिटर हैं)













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