विचार: इस्लामीकरण की राह पर ब्रिटेन
मजहबी मुद्दों पर गजब की एकजुटता वाला मुस्लिम समुदाय ब्रिटेन में भी भारत की तरह ही एकतरफा वोट करता है और उनकी आबादी भी सबसे तेजी से बढ़ रही है
HighLights
नेतन्याहू ने ब्रिटेन को 'इस्लामी गणतंत्र' कहा।
ब्रिटेन में मुस्लिम आबादी तेजी से बढ़ रही है।
ग्रूमिंग गैंग और सामाजिक एकीकरण चिंता का विषय।
शिवकांत शर्मा। इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने बीते दिनों ब्रिटेन को 'इस्लामी गणतंत्र' की संज्ञा दे डाली। दो साल पहले अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने चुनाव प्रचार के दौरान मजाक में कहा था कि ब्रिटेन पहला परमाणु शक्ति संपन्न इस्लामी गणतंत्र बनने वाला है। उस पर ब्रिटेन की पूर्व गृहमंत्री सुवेला ब्रावरमैन ने कहा था, 'वेंस साहब की बातें कोरा मजाक नहीं थीं!
कल्पना करें कि कल को ब्रिटेन की बागडोर इस्लामी कट्टरपंथ के हाथों में चली जाए, न्याय व्यवस्था की जगह शरीया लागू हो जाए और हमारे परमाणु हथियार किसी ऐसे शासन के हाथ लग जाएं जो ईरान जैसा हो?' नेतन्याहू के ब्रिटेन को इस्लामी बताने का कारण तो स्पष्ट है। ब्रिटिश सरकार ने इजरायल के लिए हथियारों में कटौती की है। व्यापार समझौता वार्ताएं स्थगित कर दी हैं।
फलस्तीन को मान्यता दे दी है और नए प्रधानमंत्री एंडी बर्नहैम ने सत्ता संभालते ही गाजा में संहार को रोकने का पर्याप्त दबाव न डालने के लिए माफी मांगी है। इसलिए नेतन्याहू को लग रहा है कि ब्रिटिश विदेश नीति पर इस्लामिक दबाव हावी है, जिसे लेकर वे नाराज हैं।
ब्रिटेन के बढ़ते इस्लामीकरण की चिंताओं को लेकर चर्चा भी कम नहीं है। ब्रिटेन की मुस्लिम आबादी लगभग 41 लाख है, जो कुल आबादी का केवल छह प्रतिशत ही है, लेकिन इसकी वृद्धि दर बहुत तेज है। हर साल बढ़ने वाली आबादी का एक तिहाई से अधिक मुस्लिम होते हैं। इसीलिए पिछले 25 वर्षों के दौरान उनकी आबादी बढ़कर ढाई गुना हो गई है और 2050 तक उसके एक करोड़ पार कर जाने और जनसंख्या का 17 प्रतिशत हो जाने का अनुमान है।
इसी तरह फ्रांस की मुस्लिम आबादी 18 प्रतिशत और जर्मनी की 20 प्रतिशत हो जाने का अनुमान है। स्वीडन में तो 2050 तक मुस्लिम आबादी 30 प्रतिशत पहुंचने का अनुमान है। मुस्लिम आबादी में धार्मिक कट्टरता भी बढ़ रही है, जिसके कारण वह स्थानीय समाज के साथ घुलमिल नहीं पा रही है। यही कारण है कि ब्रिटेन का हर छह में से एक व्यक्ति मुस्लिम आबादी बढ़ने से चिंतित है और यह चिंता आप्रवासन विरोध में बदल रही है।
ब्रिटेन और यूरोप का मुस्लिम समुदाय भी आम तौर पर शहरों में बसता है। ब्रिटेन के लगभग एक तिहाई मुस्लिम लंदन में रहते हैं। उसके बाद ब्रैडफर्ड, बर्मिंघम, मैनचेस्टर और लेस्टर का नंबर आता है। लंदन समेत उसकी दो जिला परिषदों, टावर हैमलेट और न्यूहैम के निर्वाचित महापौर भी मुस्लिम हैं। बर्मिंघम और आक्सफोर्ड समेत 12 अन्य शहरों के मानद महापौर भी मुस्लिम हैं।
मुस्लिम मतदाताओं का प्रतिशत बर्मिंघम समेत सात संसदीय क्षेत्रों में 40 पार कर चुका है। 15 संसदीय क्षेत्र ऐसे हैं, जहां यह 20 से 40 प्रतिशत है। 10 से 20 प्रतिशत वाले संसदीय क्षेत्रों की संख्या तो 80 पार कर चुकी है। ब्रिटेन के मुस्लिम मतदाता भी अपने मुद्दों पर भारत की तरह एकजुट होकर वोट देते हैं। इसलिए कोई पार्टी उनकी मांगों को अनदेखा कर सत्ता में नहीं आ सकती।
वैसे तो मुस्लिम मतदाताओं का रुझान शुरू से ही लेबर पार्टी की तरफ रहा है, लेकिन गाजा संहार पर लेबर पार्टी के ढुलमुल रवैये से नाराज मुस्लिमों ने पिछले आम चुनाव में लेबर पार्टी के कई उम्मीदवारों को या तो हरा दिया था या उनका जीतना दूभर कर दिया था। पांच दिग्गज नेताओं का तो राजनीतिक जीवन ही समाप्त हो गया था। पार्टी के करीब 575 पार्षदों को हार का मुंह देखना पड़ा था।
गाजा नीति पर पीएम बर्नहैम की माफी का बड़ा कारण यही था। फलस्तीन, कश्मीर, इराक और सीरिया जैसे वैश्विक राजनीतिक मुद्दों और इस्लामी शिक्षा, वेशभूषा और शरीया जैसे मजहबी मुद्दों पर मुस्लिम समुदाय में गजब की एकजुटता दिखती है। मुस्लिम समुदाय की यह एकजुटता अब कूटनीति के साथ-साथ ब्रिटिश न्याय व्यवस्था में भी आड़े आने लगी है।
इसकी सबसे खौफनाक मिसाल उत्तरी इंग्लैंड के रादरहैम और राचडेल जैसे शहरों में पनपे पाकिस्तानी मूल के दुष्कर्मी गिरोह रहे, जिनके दुष्कर्मों पर दशकों तक कोई कार्रवाई नहीं हो पाई। ग्रूमिंग गैंग के नाम से कुख्यात ये गिरोह दर्जनों शहरों में 1400 से अधिक अंग्रेज बच्चियों को फुसला कर दशकों तक यौन शोषण करते रहे, लेकिन पुलिस नस्लवाद और इस्लामोफोबिया का ठप्पा लगने और स्थानीय नेता इस्लामी वोट बैंक नाराज होने के भय से चुप्पी साधे रहे।
भंडा फूटने पर भी दोषियों को कड़ी सजा दिलवाना तो दूर, सरकार दर्जनों दुष्कर्म के दोषी और ग्रूमिंग गैंग सरगना शबीर अहमद को भी न जेल में रख पाई और न ही निर्वासित कर पाई। इराक और सीरिया में यजीदी ईसाइयों के नरसंहार और नाइजीरिया में हो रही ईसाइयों की हत्याओं के बावजूद कभी किसी मुस्लिम को पुलिस सुरक्षा की ज़रूरत नहीं पड़ी, लेकिन गाजा संहार के बाद से यहूदी स्कूलों को कड़ी पुलिस सुरक्षा देनी पड़ रही है।
दूसरे समुदायों से वैमनस्य रखने और ग्रूमिंग गैंग जैसे अपराधों के कारण मुस्लिम समुदाय के प्रति संदेह और असंतोष की भावना बढ़ रही है, लेकिन वह उन्हें रोकने के लिए आत्ममंथन के बजाय इस्लामोफोबिया के आरोप लगा रहा है। यूनिवर्सिटियों में जहां ऐसी समस्याओं पर विचार हो सकता है, वहां अब इस्लामियों और वामपंथियों का दबदबा है। हाल में कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के शिक्षा-समाजशास्त्र विभाग में प्रोफेसर बनीं डा. फराह अहमद की नियुक्ति इस धारणा को पुष्ट करती है। वे ब्रिटेन के प्रतिबंधित जिहादी संगठन हिज्ब उत्तहरीर की प्रवक्ता रह चुकी हैं, जो पश्चिमी शिक्षा को इस्लामी मूल्यों के लिए खतरा और ब्रिटिश समाज में घुलने-मिलने का विरोध करता है।
संप्रति, शिक्षण संस्थानों के मंचों पर फलस्तीन, कश्मीर, अमेरिकी साम्राज्यवाद और वैश्वीकरण जैसे विषयों पर तो बहस हो सकती है, लेकिन ग्रूमिंग गैंग, इस्लामी आतंकवाद और मुस्लिम समाज की समस्याओं पर नहीं। अक्सर ऐसे वक्ताओं के कार्यक्रम रद कर दिए जाते हैं, जिनके विचार इस्लामियों और वामपंथियों को रास नहीं आते। यही कारण है कि तमाम नेताओं को लगता है कि ब्रिटेन का सामाजिक और वैचारिक दोनों स्तरों पर इस्लामीकरण हो रहा है।
(लेखक बीबीसी हिंदी के पूर्व संपादक हैं)

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