संजय गुप्त। संसद के मानसून सत्र में जो विधेयक कानून बने, उनमें एक राष्ट्र गीत वंदे मातरम् के संपूर्ण गायन को स्वीकृति देने और उसे राष्ट्रगान के समान कानूनी संरक्षण एवं दर्जा प्रदान करने का भी था। जब इस विधेयक पर चर्चा हुई तो कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने सदन का बहिष्कार किया।

वंदे मातरम् के दो के स्थान पर सभी छह पदों के गायन को स्वीकृति देने का फैसला इस कालजयी गीत के 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में किया गया। तब भी विवाद उभरा था और ये आरोप उछले थे कि कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के दबाव में आकर इस गीत के दो ही पद गाने का जो फैसला किया, उस पर तुष्टीकरण की राजनीति के तहत आजादी के बाद भी अमल किया गया।

वंदे मातरम् को लेकर हाल में विवाद फिर से तब उभरा, जब 15 अगस्त को कांग्रेस मुख्यालय में वंदे मातरम् के संपूर्ण गायन को लेकर सोनिया गांधी आपत्ति दर्ज कराती दिखाई दीं। भाजपा ने इसे राष्ट्र गीत का अपमान बताया। बीते दिनों कांग्रेस कार्यसमिति ने फैसला किया कि वह वंदे मातरम् के सभी पदों के स्थान पर दो ही पद गाएगी। इसे भाजपा ने देशद्रोह बताकर कांग्रेस को घेरा।

बंकिम चंद्र चटर्जी की ओर से लिखे गए वंदे मातरम् ने आजादी की अलख जगाने का काम किया था। यह एक समय में इतना लोकप्रिय था कि उसे देश भर में सहर्ष अपनाया गया। स्वतंत्रता सेनानियों के लिए यह प्रेरणास्रोत बना। उसे समाज के सभी वर्गों ने स्वीकार किया। आजादी की लड़ाई के समय इसे बहुत उत्साह और उमंग के साथ राष्ट्रवाद और भारतीयता की पहचान के रूप में गाया जाता था। इसी कारण कांग्रेस ने 1876 से अपने अधिवेशनों में इसे गाना शुरू किया।

बाद में मुस्लिम लीग ने वंदे मातरम् को लेकर दुराग्रह दिखाना शुरू किया। उसने यह कहना आरंभ किया कि इस गीत में भारत को दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती जैसा बताया गया है और इसलिए उसके लोग इसे नहीं गा सकते। कांग्रेस के भी कुछ मुस्लिम नेताओं ने इस गीत पर अपनी आपत्ति जतानी शुरू की। इस पर कांग्रेस नेताओं ने रवींद्रनाथ टैगोर से संपर्क किया। उन्होंने इस गीत के दो ही पद गाने को कहा। 1937 से कांग्रेस के अधिवेशनों में ऐसा ही किया जाने लगा।

इसके बाद भी मुस्लिम लीग का दुराग्रह कम नहीं हुआ और इसके नतीजे में देश का विभाजन हुआ। कायदे से विभाजन के बाद वंदे मातरम् के सभी पदों को गाने की परंपरा अपना ली जानी चाहिए थी। ध्यान रहे कि संविधान सभा में इसे राष्ट्रगान घोषित करने की मांग हुई थी। ऐसा नहीं हुआ, लेकिन उसकी महत्ता को देखते हुए उसे राष्ट्र गीत का दर्जा मिला।

वंदे मातरम् के पूर्ण गायन को स्वीकृति और उसे राष्ट्रगान जैसा कानूनी दर्जा देने के बाद कांग्रेस का यह कहना विचित्र है कि वह इसके केवल दो ही पद गाएगी, क्योंकि इसी 15 अगस्त को कांग्रेस मुख्यालय के साथ हिमाचल, तेलंगाना और कर्नाटक के स्वतंत्रता दिवस समारोहों में वंदे मातरम् का पूर्ण गायन हुआ। अब जब वह वंदे मातरम् के दो ही पद गाने पर अड़ गई है तो इससे यही पता चलता है कि सोनिया गांधी ने 15 अगस्त को कांग्रेस मुख्यालय पर उसके पूर्ण गायन पर आपत्ति जताई थी। वंदे मातरम् के दो ही पद गाने की जिद करना इससे संबंधित कानून को खुली चुनौती देना है।

वंदे मातरम् पर कांग्रेस ने अपने रुख से भाजपा के हाथ एक मुद्दा थमा दिया है। वह इस मसले पर कांग्रेस को घेरने का काम करेगी। इससे उसे राजनीतिक लाभ हो सकता है, क्योंकि कांग्रेस एक बार फिर तुष्टीकरण की राजनीति करती दिख रही है। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि केरल में मुस्लिम लीग के समर्थन से सरकार चला रही कांग्रेस की सरकार ने 15 अगस्त के समारोह में वंदे मातरम् का गायन नहीं कराया। यदि कांग्रेस वंदे मातरम् के संपूर्ण गायन से इन्कार करती रही तो भाजपा इसे एक राजनीतिक मुद्दा बनाने से पीछे हटने वाली नहीं। वंदे मातरम् राष्ट्रवाद और विशेष रूप से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रतीक और परिचायक है।

भाजपा ऐसे प्रतीकों के प्रति सदैव मुखर रही है। तथ्य यह भी है कि पिछले कुछ समय से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को बल मिला है। इसी के साथ पहचान की राजनीति ने भी असर दिखाना शुरू किया है। राजनीतिक दल अपने-अपने हिसाब से इस राजनीति को हवा भी देते हैं। इसी कारण ऐसे मुद्दे तूल पकड़ते हैं, जो जात-पांत या भाषा और मजहब से जुड़े होते हैं। कांग्रेस के लिए राष्ट्रवाद के प्रतीकों पर भाजपा को चुनौती देना आसान नहीं, क्योंकि वह पिछले कुछ समय से राष्ट्रवाद के स्थान पर अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण की राजनीति पर ज्यादा जोर दे रही है। इससे उसे नुकसान हो सकता है, क्योंकि भाजपा को कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति के जवाब में हिंदुओं का ध्रुवीकरण करने में आसानी होगी।

आज जब पहचान की राजनीति के साथ राष्ट्रवाद को महत्ता मिल रही है, तब वंदे मातरम् को लेकर अपनाए गए रवैये को लेकर कांग्रेस को यह ध्यान रखना चाहिए कि बेरोजगारी, महंगाई या फिर पेपर लीक सरीखे मुद्दों की तुलना में राष्ट्रवाद और पहचान की राजनीति से जुड़े मुद्दे अधिक प्रभावी रहते हैं। लोग बुनियादी समस्याओं से जुड़ी समस्याओं के बारे में शायद यह सोचने लगे हैं कि ये समस्याएं तो चलती ही रहेंगी।

इन मुद्दों के स्थान पर वे भावनात्मक मुद्दों पर अधिक मुखर और सक्रिय रहते हैं। कांग्रेस को यह नहीं भूलना चाहिए कि बीता एक दशक यही बताता है कि राष्ट्रवाद के मसलों पर भाजपा की मुखर राजनीति उसे राजनीतिक सफलता दिलाने में सहायक बनी है। कांग्रेस की समस्या यह है कि वह रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े ज्वलंत मसलों को उठाती तो जोर-शोर से है, लेकिन वह उन पर कायम नहीं रह पाती और न ही कोई सशक्त नैरेटिव खड़ा कर पाती है।

फिलहाल छात्रों के मसले पर कांग्रेस सौ शहरों में छात्रों की गूंज अभियान चला रही है। यह सीजेपी के आंदोलन का परिणाम है। छात्रों और युवाओं के मुद्दे राजनीति में एक अहम हिस्सा रखते हैं, लेकिन वे राष्ट्रवाद से जुड़े मुद्दों से अधिक प्रभावी सिद्ध हो पाते हैं या नहीं, इसका पता आगामी विधानसभा चुनावों में चलेगा।