यह अच्छा है कि विभिन्न कारणों से सरकारी स्कूलों की दशा की ओर ध्यान आकृष्ट हुआ है। कहीं सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले छात्र ही उनकी समस्याएं उजागर कर रहे हैं तो कहीं काकरोच जनता पार्टी के कार्यकर्ता उनकी हालत बयान कर रहे हैं। हालांकि वे ऐसा संकीर्ण राजनीतिक इरादों से करते दिख रहे हैं, लेकिन उनकी स्थिति पर चर्चा छिड़ना इसलिए उचित है, क्योंकि उनमें पठन-पाठन की उपयुक्त व्यवस्था करने की सख्त जरूरत है।

एक समय अधिकांश बच्चे सरकारी स्कूलों पर ही निर्भर थे। तब उनकी स्थिति अपेक्षाकृत संतोषजनक थी, लेकिन जैसे-जैसे निजी विद्यालय खुलते गए, वे उपेक्षित होते गए। हालांकि सरकारें उन पर धन खर्च कर रही हैं, लेकिन इस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है कि उसका समुचित इस्तेमाल हो रहा है या नहीं? जब समय के साथ सरकारी विद्यालयों की दशा सुधरनी चाहिए थी, तब ऐसे सरकारी विद्यालयों और विशेष रूप से प्राइमरी विद्यालयों की गिनती करना कठिन है, जिनके पास उपयुक्त भवन ही नहीं हैं।

न जाने कितने सरकारी विद्यालय जर्जर इमारतों में चल रहे हैं। कुछ तो ऐसे हैं, जिनके पास भवन के नाम पर कुछ है ही नहीं। इसके अतिरिक्त तमाम ऐसे सरकारी स्कूल भी हैं, जिनमें सामान्य बुनियादी सुविधाओं का भी टोटा है।

समस्या केवल इतनी ही नहीं है कि सरकारी विद्यालयों के पास ढंग के भवन, पीने के पानी की सुविधा और शौचालय सरीखी बुनियादी सुविधाएं नहीं है। समस्या यह भी है कि वे शिक्षकों के अभाव से भी जूझ रहे हैं। इस तथ्य की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि बहुत से सरकारी विद्यालयों में केवल एक ही शिक्षक है। आखिर संसाधनों से विहीन स्कूलों में पढ़ने वाले छात्र सही तरीके से शिक्षित कैसे हो पाएंगे?

चूंकि सरकारी स्कूलों की दुर्दशा दूर होने का नाम नहीं ले रही है, इसलिए लोग अपने बच्चों को वहां पढ़ाने से कतराते हैं और आर्थिक कठिनाइयों का सामना करने के बावजूद उन्हें निजी विद्यालयों में भेजने के लिए विवश होते हैं। आमतौर पर वही अभिभावक सरकारी विद्यालयों में अपने बच्चों को भेजते हैं, जिनके पास इसके अलावा और कोई उपाय नहीं होता। वैसे तो इसके पहले भी सरकारी विद्यालयों की दुर्दशा सामने आती रही है, लेकिन चिंता की बात यह है कि वह दूर होने का नाम नहीं ले रही है।

राज्य सरकारों को इसके लिए सक्रिय होना होगा कि सरकारी स्कूलों की दशा सुधरे और उनमें पठन-पाठन का स्तर ऐसा हो कि लोगों को मजबूरी में निजी विद्यालयों की ओर रुख न करना पड़े। इस मामले में केंद्र सरकार को भी यह देखना चाहिए कि राज्य सरकारें उदाहरण पेश करें। यदि भारत को वास्तव में विकसित देश बनाना है तो इसका एक उपाय शिक्षा की बुनियाद ठीक करना है।