केंद्र सरकार के लिए यह चिंता का विषय बनना चाहिए कि चीनी के बढ़ते दामों के बीच प्याज के दामों में भी अप्रत्याशित तरीके से वृद्धि हो रही है। पिछले कई वर्षों में बरसात के मौसम में प्याज की आपूर्ति में कमी और उसके चलते उसके मूल्यों में वृद्धि देखने को मिली है, लेकिन यह ठीक नहीं कि रह-रहकर ऐसा हो। खाद्य एवं आपूर्ति विभाग को आवश्यक खाद्य सामग्री की आपूर्ति में कमी का आकलन समय रहते करना चाहिए।

इसके अतिरिक्त, उसे ऐसे उपाय भी करने चाहिए, जिनसे बार-बार एक जैसे कारणों से प्याज अथवा अन्य सब्जियों की किल्लत न पैदा होने पाए। इसमें आसानी तब होगी, जब केंद्र सरकार राज्यों के संपर्क में रहेगी और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति की सतत निगरानी करेगी। सब्जियों अथवा अनाज के उत्पादन में कमी होने जा रही है, यह पहले से ही स्पष्ट हो जाता है। उचित यही है कि जैसे ही किसी फसल के उत्पादन में कमी के आसार नजर आएं, केंद्र सरकार को आवश्यक उपाय कर लेने चाहिए।

सरकारों को इसका आभास होना चाहिए कि जब एक बार किसी आवश्यक वस्तु की आपूर्ति में कमी हो जाती है और उसके मूल्य बढ़ने लगते हैं तो फिर उन पर लगाम लगाना आसान नहीं होता, क्योंकि मुनाफाखोर एवं जमाखोर सक्रिय हो जाते हैं। देखना है कि सरकार प्याज के बफर स्टाक को सीधे थोक बाजार में उपलब्ध कराने के जो उपाय करने जा रही है, वे कितने प्रभावी सिद्ध हो पाते हैं? सरकारों को इससे अनभिज्ञ नहीं होना चाहिए कि प्याज जैसी आवश्यक वस्तु के मूल्यों में वृद्धि प्रतिकूल राजनीतिक माहौल बनाने का कारण बनती है और कभी-कभी तो वह चुनावों को भी प्रभावित करती है।

समस्या केवल यह नहीं है कि पहले चीनी के दाम बढ़े और अब प्याज के मूल्य बढ़ गए। समस्या यह है कि आने वाले दिनों में कुछ सब्जियों और खाद्य तेल के मूल्य भी बढ़ने की आशंका है। यदि ऐसा होता है तो महंगाई बढ़ेगी और उससे आम आदमी प्रभावित होगा। यह सही समय है कि सरकार उस तंत्र को दुरुस्त करे, जिस पर आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति की निगरानी रखने का दायित्व होता है।

यह ठीक है कि कभी-कभार कुछ आवश्यक वस्तुओं की कमी इसलिए हो जाती है, क्योंकि उसकी आपूर्ति आयात पर निर्भर करती है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में उस वस्तु के मूल्य बढ़ जाने से उसे महंगे दामों पर आयात करना पड़ता है। इस सबके बावजूद यह तो देखा ही जाना चाहिए कि आखिर कृषि प्रधान देश होते हुए भी भारत को दालों और खाद्य तेलों का आयात क्यों करना पड़ता है? यह ठीक नहीं कि दलहन और तिलहन का उत्पादन बढ़ाने के जो प्रयास किए गए, वे रंग लाते नहीं दिख रहे हैं। आज जब आत्मनिर्भरता की बातें हो रही है तो दलहन-तिलहन के उत्पादन को बढ़ाने पर ध्यान दिया जाना अत्यंत आवश्यक है।