उमेश चतुर्वेदी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राजनीति को ऐसे-ऐसे शब्द दिए हैं, जो उनके समर्थकों को जितना पसंद आते हैं, उससे कहीं ज्यादा उनके विरोधियों को बेधते हैं। शब्द की पहुंच और सफलता को इन दोनों ही परिस्थितियों से समझा जा सकता है। दिल्ली के 2020 के विधानसभा चुनावों के दौरान उन्होंने पहली बार आंदोलनजीवी शब्द का प्रयोग किया। समर्थन और चुभन की यात्रा करते हुए यह शब्द लोकप्रिय हो गया। विगत पंद्रह अगस्त को लाल किले की प्राचीर से उन्होंने नया शब्द दिया-दिमागी नक्सल। यह शब्द भी आंदोलनजीवी की गति को जल्द ही प्राप्त हो गया। दो शब्दों का यह युगल जहां मोदी समर्थकों को बेहद पसंद आया, वहीं उनके विरोधियों को यह चुभ गया।

दिलचस्प यह है कि मोदी ने जिनके लिए इस शब्द का प्रयोग किया, उनकी बजाय देश की सबसे पुरानी पार्टी के कई नेताओं को बेध गया। जिन चिदंबरम के गृहमंत्री रहते दंतेवाड़ा में 76 जवानों को बारूदी सुरंग में माओवादियों ने उड़ा दिया था, वे इस शब्द के विरोध में खुलकर आ चुके हैं। उन्होंने कहा कि हां, वे दिमागी नक्सल हैं। जब चिदंबरम ही ऐसा बोल रहे हों तो पार्टी प्रवक्ता कैसे चुप रहते। जाहिर है कि वे अपने-अपने ढंग से इसकी प्रतिक्रिया देने में जुट गए। कुछ और दलों के नेता भी इसमें शामिल हो गए और खुद को दिमागी नक्सली बताने लगे।


दिमागी नक्सल को लेकर जारी विवाद इंटरनेट मीडिया पर चाहे जिस भी रूप में दिखे, लेकिन आम लोगों में इसे लेकर अलग तरह की प्रतिक्रिया है। इस शब्द पर विवाद उठाने वालों को सही जवाब उड़ीसा के ‘मलकानगिरी’ और बस्तर के 93 गांवों में आजादी के बाद पहली बार उत्साह से मनाए गए स्वाधीनता दिवस समारोह ने दे दिया। इस शब्द की अहमियत को बस्तर में पूर्व माओवादी लड़कियों द्वारा किए गए रैंप-वाक से भी समझा जा सकता है।

जिन हाथों में कभी बंदूकें होती थीं, जो कभी मरने और मारने के लिए उतारू रहते थे, जिन्हें कभी भारतीय संविधान से ज्यादा माओत्से तुंग के शब्दों पर ज्यादा आस्था थी, जिन्हें सत्ता वोट से नहीं, बारूद और बंदूक की नली से निकलती नजर आती थी, अब वे लोग या तो पुलिस में शामिल होकर भारतीय संविधान के तहत लोगों की रखवाली कर रहे हैं या फिर रैंप-वाक कर रहे हैं या फिर नई जिंदगी के सपने बुन रहे हैं।ॉ

कभी देश के एक तिहाई हिस्से में माओवादियों की समानांतर सरकार चलती थी। इसे लाल गलियारे के रूप में परिभाषित किया जाता था, लेकिन गृहमंत्री अमित शाह ने 31 मार्च, 2026 तक माओवाद मुक्त करने का लक्ष्य रखा। यह लक्ष्य अब पूरा हो चुका है। माओवादी इलाकों में बढ़ती रेल लाइनें और नई बनती सड़कें इसका प्रतीक हैं। परिवर्तन की इन कहानियों को स्वीकार न करने और इसे छद्म मानने वालों का एक बड़ा तबका अब भी बौद्धिक तंत्र में बहुतायत में है। ऐसा सोच रखने वालों का एक तबका तंत्र में भी है।

जो तंत्र की खूबियों और खामियों का फायदा भी उठा रहा है और अपने नक्सली दिमाग के जरिये व्यवस्था को अंदर से चुनौती दे रहा है। प्रधानमंत्री का इशारा इन्हीं लोगों की ओर है। दिलचस्प यह है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी खुद के सत्ता में रहते वक्त इन लोगों की पहचान करके उन्हें अलग-थलग करना चाहती थी। 6 अप्रैल, 2010 को दंतेवाड़ा में 76 जवानों को बारूदी सुरंग के जरिये उड़ाने के बाद तत्कालीन मनमोहन सरकार सैनिक कार्रवाई तक की सोचने लगी थी, लेकिन सत्ता से दूरी के बाद अब वह भी उसके साथ खड़ी होती नजर आ रही है। दिमागी नक्सल के शब्द की प्रतिक्रिया का स्तर इसी का प्रतीक कहा जा सकता है।

इन दिनों कांग्रेस में जो घट रहा है, उससे लगता है कि सबसे पुरानी पार्टी कई तरह की मन:स्थितियों से गुजर रही है। शिक्षा मंत्रालय से धर्मेंद्र प्रधान की विदाई के बाद उसका उत्साह बढ़ना स्वाभाविक है, लेकिन वह इस कामयाबी को पचाती हुई नजर नहीं आ रही है। वह हताशा में आकर बौखलाहट का प्रदर्शन कर रह है। स्वाधीनता दिवस पर जिस तरह वंदे मातरम् के संपूर्ण पाठ के गायन से सोनिया गांधी सार्वजनिक तौर पर नाराज होती दिखीं, उससे कांग्रेस की मनोदशा का पता चलता है।

संसद ने वंदे मातरम् के पूरे पाठ का गायन अनिवार्य करने वाला कानून बना दिया है, लेकिन कांग्रेस पुराने ढर्रे पर ही आगे बढ़ना चाहती है। कांग्रेस की अगुआई वाली केरल सरकार पहले ही कह चुकी है कि राज्य में पहले की तरह वंदे मातरम् के शुरुआती दो ही पदों का गायन होगा। कांग्रेस कानून न मानने का जोखिम उठा सकती है, लेकिन कांग्रेस मुख्यालय में वंदे मातरम् का कितना गायन होगा, इसका फैसला वह पहले से ले सकती थी। वंदे मातरम् के गायन को बीच में ही रोकने की सार्वजनिक कोशिश से बचा जा सकता था। इस पर कांग्रेस की सफाई लोगों के गले नहीं उतर पा रही है।

नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी और चंद्रशेखर समकालीन राजनेता रहे। तीनों की विचारधाराएं अलग रहीं, पर राव और चंद्रशेखर-दोनों अटल जी को गुरु कहा करते थे। ऐसा नहीं कि तीनों असहमति नहीं रखते थे, पर ऐसी असहमतियां पार्टी लाइन पर होती थीं, निजी नहीं। आज ऐसी उम्मीदें बेमानी हैं। कांग्रेस जिस तरह भाषा की मर्यादा का उल्लंघन बार-बार कर रही है, उससे उसकी खीझ का ही पता चलता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं)