जगदीप सिंह। भारत को विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की प्रतिष्ठा प्राप्त है, जहां जनादेश पर ही पूरा राजनीतिक ढांचा टिका है, लेकिन हालिया घटनाएं इस ढांचे को आघात पहुंचा रही हैं। हाल में तृणमूल कांग्रेस के करीब 20 लोकसभा सदस्यों का एक अनजान से छोटे क्षेत्रीय दल में विलय कर राजग के प्रति समर्थन जताना और शिवसेना (यूबीटी) के सांसदों के शिंदे गुट की ओर रुझान ने दलबदल की समस्या को फिर से राष्ट्रीय बहस में ला दिया है।

स्वतंत्रता के बाद से यह संस्कृति राजनीति का अभिन्न हिस्सा बनी हुई है। वर्ष 1951 से 1967 के बीच 16 महीनों में 542 विधायकों ने दल बदला, जबकि 1967-68 के महज 12 महीनों में ही ऐसे 438 मामले दर्ज हुए। इस राजनीतिक अराजकता ने कई सरकारें गिराईं और 1985 में 52वें संविधान संशोधन के जरिये 10वीं अनुसूची लाई गई, मगर आंकड़े बताते हैं कि यह कानून भी पूरी तरह असफल रहा है।

दलबदल न केवल दल विशेष में अस्थिरता पैदा करता है, बल्कि मतदाताओं के विश्वास को हिला देता है। 1967-70 के बीच राज्यों में 1240 से ज्यादा दलबदल हुए, जिनमें से अधिकांश मंत्रिपद या आर्थिक लाभ के लालच से प्रेरित थे। कानून लागू होने के बाद 1985-95 के दशक में यह संख्या घटकर करीब 120 रह गई, जो शुरू में 70 प्रतिशत की कमी दर्शाती है, लेकिन 2000 के बाद इसमें फिर उछाल आया।

2000-2023 के बीच विभिन्न दलों से सैकड़ों मामले सामने आए, जिसमें भाजपा और कांग्रेस दोनों शामिल रहे। महाराष्ट्र में 2022 का संकट इसका जीवंत उदाहरण है, जहां एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना के 40 विधायकों के विद्रोह ने उद्धव ठाकरे सरकार गिरा दी। इसी तरह मध्य प्रदेश (2020), कर्नाटक (2019) और अरुणाचल प्रदेश (2016) में भी बड़े पैमाने पर दलबदल ने लोकतांत्रिक जनादेश को पलट दिया। इन घटनाओं ने साबित कर दिया कि 10वीं अनुसूची की खामियां दलबदल को वैधता दे रही हैं।

इस समस्या का सबसे गहरा प्रभाव राजनीतिक स्थिरता पर पड़ता है। गठबंधन युग में जहां केंद्र और राज्यों में बहुमत अक्सर नाजुक होता है, वहां एक छोटे गुट का दलबदल सरकार को अस्थिर कर सकता है। इससे नीतिगत निरंतरता भंग होती है, विकास योजनाएं रुकती हैं और जनहित के मुद्दे सत्ता संघर्ष में दब जाते हैं। एक अध्ययन में पाया गया कि दलबदलू विधायक सामान्य विधायकों की तुलना में दो से तीन गुना अधिक मंत्रिपद पाने की संभावना रखते हैं, जो भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता है। मतदाता, जिन्होंने उम्मीदवार को दल के एजेंडे पर चुना होता है, खुद को ठगा महसूस करते हैं।

मौजूदा दलबदल रोधी कानून की सबसे बड़ी कमजोरी स्पीकर की भूमिका है, जो अक्सर सत्ताधारी दल के प्रभाव में रहती है। फैसले लंबे समय तक लंबित रहते हैं, जिससे नेता बिना सजा के अपनी सीट पर काबिज रहते हैं। 2003 के 91वें संशोधन ने एक-तिहाई की जगह दो-तिहाई सदस्यों के विलय की छूट दी, लेकिन तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसदों ने इसी छूट का फायदा उठाकर एक छोटे दल में विलय कर लिया। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पीकर के फैसले पर न्यायिक समीक्षा की गुंजाइश दी, मगर व्यावहारिक रूप से देरी बनी रही।

परिणामस्वरूप कानून का उद्देश्य विफल हो गया। तमाम विश्लेषण बताते हैं कि यह कानून दलबदल रोकने में सफल नहीं रहा।

दलबदल की संस्कृति भ्रष्टाचार को संस्थागत रूप देती है। दलबदल अब खुलेआम होता है, जहां सांसदों-विधायकों को मंत्रिपद, टिकट या अन्य लाभ देकर अपने पाले में किया जाता है। छोटे दलों के टूटने से संघीय ढांचा भी प्रभावित होता है। 2000-2015 के बीच दर्जनों ऐसे मामले सामने आए जहां दलों से बड़े पैमाने पर स्विचिंग हुई। इस बीमारी को रोकने के लिए सशक्त कानून अपरिहार्य है। स्पीकर की जगह एक स्वतंत्र ट्रिब्यूनल या चुनाव आयोग को अयोग्यता का अधिकार सौंपा जाए, ताकि पक्षपात समाप्त हो।

विलय की छूट को पूरी तरह खत्म किया जाए या न्यूनतम सीमा बढ़ाई जाए। दलबदल करने वाले को न केवल तत्काल अयोग्य ठहराया जाए, बल्कि अगले पांच वर्ष तक चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाया जाए। आंतरिक पार्टी लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए चुनाव आयोग दलों के आंतरिक चुनावों की निगरानी करे। मतदाता जागरूकता अभियान चलाकर जनता को ऐसे नेताओं से सावधान किया जाए।

कुछ लोग दलबदल को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मानते हैं, लेकिन वास्तविकता में यह सिद्धांतों से ज्यादा सत्ता लिप्सा से प्रेरित होता है। जर्मनी और न्यूजीलैंड जैसे देशों में दलबदल रोकने के सख्त प्रविधान सफल रहे हैं, जहां व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामूहिक जनादेश का संतुलन बना है। भारत में संसद को संयुक्त समिति गठित कर कानून की समीक्षा करनी चाहिए। यदि हम इस समस्या को नजरअंदाज करते रहे, तो लोकतंत्र सिर्फ चुनावी औपचारिकता बनकर रह जाएगा।

दलबदल भारतीय राजनीति की पुरानी बीमारी है। सशक्त कानून, पारदर्शिता और आंतरिक सुधारों से ही इसे रोका जा सकता है। तभी जनादेश की गरिमा बनी रहेगी और लोकतंत्र सच्चे अर्थों में मजबूत होगा। चुने गए प्रतिनिधि जनता के प्रति जवाबदेह रहें, यही इस व्यवस्था की सच्ची परीक्षा है।

(लेखक राजनीति शास्त्र के सहायक प्रोफेसर हैं)