जागरण संपादकीय: बिना फुटपाथ की सड़कें
सुप्रीम कोर्ट ने फुटपाथों पर पैदल चलने वालों के अधिकार को मौलिक बताया है। कोर्ट ने सरकारों को अतिक्रमण रोकने और फुटपाथों के रखरखाव की जिम्मेदारी याद दिलाई।
HighLights
सुप्रीम कोर्ट ने पैदल यात्रियों के अधिकार को मौलिक बताया।
फुटपाथों पर अतिक्रमण गंभीर समस्या, दुर्घटनाओं का कारण।
सरकारों को फुटपाथों के रखरखाव की जिम्मेदारी निभाने के निर्देश।
सुप्रीम कोर्ट का यह कहना सराहनीय और स्वागतयोग्य है कि फुटपाथ पर पैदल चलने वालों का पहला अधिकार है। उसने इस अधिकार को मौलिक अधिकार बताते हुए यह भी स्पष्ट किया कि सड़कों पर वाहनों की आवाजाही से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है कि पैदल यात्री फुटपाथ पर बिना किसी बाधा के चल सकें। यह अच्छा हुआ कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में सरकारों को यह भी याद दिलाया कि यह एक ऐसा अधिकार है, जिसे लागू किया जा सकता है।
आखिर फुटपाथ होते ही इसलिए हैं कि लोग उन पर चल सकें, लेकिन अन्य देशों और विशेष रूप से विकसित एवं साथ ही कई विकासशील देशों की तुलना में हमारे यहां फुटपाथ बड़े पैमाने पर अतिक्रमण का शिकार हैं। कहीं-कहीं तो वे अतिक्रमण के चलते गायब ही हो गए हैं।
अपने देश में फुटपाथों पर पैदल चलना इसलिए दूभर है, क्योंकि वे सही तरह सीमांकित नहीं हैं और यदि कहीं हैं भी तो कोई उसकी परवाह नहीं करता। कहीं रेहड़ी-पटरी वालों ने उन पर कब्जा कर लिया है तो कहीं दुकानदारों ने। यदि कहीं वे अतिक्रमण से मुक्त हैं तो भी उनमें वाहन खड़े नजर आते हैं या फिर दुकानों के साइनबोर्ड दिखते हैं।
वास्तव में अपने यहां फुटपाथों पर पैदल चलने की सुविधा के अलावा वह सब होता है, जो नहीं होना चाहिए। इसका ही नतीजा है कि आम तौर पर लोग सड़क किनारे चलने के लिए विवश होते हैं और दुर्घटनाओं की चपेट में आते हैं। इन दुर्घटनाओं में प्रतिवर्ष हजारों लोगों की मौत होती है। सुप्रीम कोर्ट का उक्त फैसला एक मोटर दुर्घटना मुआवजे के मामले से जुड़ा है, जिसमें एक पांच वर्षीय बच्चे की मौत इसलिए हो गई थी, क्योंकि वह जिस सड़क से जा रहा था, उस पर कोई फुटपाथ नहीं था।
इससे बड़ी विडंबना और कोई नहीं हो सकती कि सुप्रीम कोर्ट को शासन-प्रशासन को छोटी-छोटी बातें याद दिलाने के साथ इसके लिए निर्देश भी देने पड़ते हैं कि उसे अपने बुनियादी काम करने चाहिए। कायदे से तो सुप्रीम कोर्ट को यह कहने कि आवश्यकता ही नहीं पड़नी चाहिए थी कि फुटपाथ लोगों के चलने के लिए हैं और इसमें कोई बाधा नहीं आनी चाहिए, लेकिन उसे यह काम भी करना पड़ा।
इसके प्रति तो उन्हें बिना किसी के कहे सचेत रहना चाहिए था, जिन पर फुटपाथों के रखरखाव और यह देखने की जिम्मेदारी है कि उन पर किसी तरह का अतिक्रमण न होने पाए। समस्या यह है कि ऐसे लोग अपनी जिम्मेदारी के प्रति तनिक भी सजग नहीं-चाहे वे नगर निकायों के अधिकारी-कर्मचारी हों या फिर यातायात पुलिस।
इसके साथ ही हमारे नेतागण भी कभी इसकी चिंता नहीं करते कि उनके इलाकों में फुटपाथों पर चलना कठिन है। शायद इसलिए कि उन्हें फुटपाथ पर चलने की आवश्यकता नहीं पड़ती। फुटपाथों पर अतिक्रमण सबको दिखता है, लेकिन चेतता कोई नहीं।












