विचार: मानवीय क्षमताएं बढ़ाता है योग
भौतिक दुनिया के हमारे ज्ञान और आविष्कार की बदौलत आज हमारा दृश्य जगत तीव्र गति से अत्यंत गतिशील और निरंतर बदलने वाला होता जा रहा है।
HighLights
आरोग्य के लिए योग उत्तम मूल आधार है।
योग तन-मन संतुलन व एकाग्रता बनाए रखने में सहायक।
अष्टांग योग स्वयं को व्यवस्थित करने की समग्र पद्धति।
गिरीश्वर मिश्र। शास्त्रों में उल्लेख है कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थ के लिए आरोग्य उत्तम मूल यानी मुख्य आधार है। इसका निहितार्थ यही है कि तन और मन में संतुलन बना रहे। आरोग्य यानी निरोगी रहना विकारों से मुक्त रहना है। यही हमारा स्वभाव है और उसे बनाए रखना हर प्राणी का कर्तव्य होता है। प्रकृति ने हमारी संरचना इसी प्रकार से तैयार की है, लेकिन आज के प्रतिस्पर्धी युग में उसके अनुरूप जीवन संचालन में समस्याएं आ रही हैं। विकार उत्पन्न हो रहे हैं। विकार बाधक होते हैं, जो आगे बढ़ने में रोड़ा तो अटकाते ही हैं, साथ ही हमारी शक्ति और ऊर्जा का अपव्यय भी करते हैं। इससे हमारा ध्यान अपने लक्ष्य से भटकता है। आज के तेजी से डिजिटल हो रहे युग में बच्चे-बूढ़े सभी आमतौर पर ध्यान के भटकाव की शिकायत करते मिलते हैं।
उनका चित्त स्थिर नहीं रह पाता है। इसके फलस्वरूप कोई काम ठीक से नहीं हो पाता और स्मृति भी कमजोर पड़ने लगती है। दूसरी ओर यह सबका अनुभव है कि ध्यानावस्थित या दत्तचित्त होकर ही कोई कार्य सिद्ध किया जा सकता है। ‘ध्यान देना’ और कुछ नहीं, अपनी चेतना के सतत प्रवाह को एक दिशा में ले जाना है। हम ध्यान को किसी वस्तु, व्यक्ति या घटना में केंद्रित या फोकस करते हैं। इसी क्रम में अंतर्जगत और बाह्य जगत के साथ तालमेल बैठाना यानी ठीक तरह और ठीक जगह जोड़ना-जुड़ना आज की सबसे बड़ी चुनौती हो रही है। आज पूरे विश्व में मनोरोगियों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हो रही है। ऐसे में योग-शास्त्र और उसकी साधना बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है।
योग का अर्थ है जुड़ना, परंतु हर तरह का जुड़ना आकस्मिक या जानबूझकर मिलने का संयोग हो सकता है। योग-शास्त्र के अनुसार योग एक विशेष प्रकार से सायास जुड़ने का नाम है। योग विद्या के आलोक में अंतर और बाह्य जगत के साथ हमारा रिश्ता नया ओजस्वी अर्थ प्राप्त कर लेता है। यम और नियम नैतिक जीवन जीने की प्रक्रिया बताते हैं तो आसन शरीर का रख-रखाव और उसकी क्षमता को संवर्धित करने का काम करते हैं। प्राणायाम हमारे श्वास और प्राणिक ऊर्जा को व्यवस्था करते हैं। प्रत्याहार बाह्य दुनिया के साथ विवेकपूर्ण संबंध को नियमित करता है। ध्यान, धारणा और समाधि अंतरंग योग हैं, जो चेतना के परिष्कार को संभव बनाते हैं। इसीलिए महर्षि अरविंद कहते हैं कि 'पूरा जीवन ही योग है।' वे योग को समग्र जीवन-दर्शन के रूप में प्रस्तुत करते हैं। सबसे जुड़कर ही अच्छी तरह से जीना संभव हो पाता है।
उसके लिए आवश्यक तैयारी भी अनेक स्तरों पर करनी होती है। योग के जिस स्वरूप को महर्षि पतंजलि ने ‘योग-सूत्र’ में प्रस्तुत किया था, वह इसी तैयारी का माडल या नक्शा है। उसे अष्टांग योग कहकर वे यही कहना चाहते थे कि जैसे सभी अंगों से मिलकर शरीर बनता है, उसी तरह योग भी अनेक पक्षों से मिलकर बना है। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा और समाधि सबको मिलाकर ही योग की रचना पूर्ण होती है। किसी एक अंग (जैसे-आसन या प्राणायाम) मात्र को ही योग कहना अतिव्याप्त करने वाली बात है। इसलिए वह समझ और तदनुसार आचरण असंगत और दिग्भ्रमित करने वाला होगा। खेद है कि आज इसी तरह का भ्रम फैला हुआ है।
योग वस्तुत: स्वयं को नियमित एवं व्यवस्थित करने की ऐसी पद्धति है, जो हमें अपना वास्तविक स्वरूप वापस दिलाती है। योग की यात्रा के साथ हम अपने दृश्य को दृश्य के रूप में और स्वयं को द्रष्टा के रूप में ग्रहण करना शुरू करते हैं। दृश्य के मजबूत बंधनों से छुटकारा पाना आसान नहीं है। हमारा चंचल मन तो सदैव दृश्य की ओर ही खिंचा रहता है। उसे दृश्य से वापस लेने या प्रत्याहार के लिए हमारे द्वारा सजग चेष्टा जरूरी होती है। गीता की मानें तो उसके लिए गहन अभ्यास और दृश्य विषय के प्रति आकर्षण कम करना होगा। उसके साथ बर्ताव तो करना होगा, परंतु आंखें मूंदकर नहीं, अपितु विवेक के साथ। उसके साथ हमें अनासक्त भाव से व्यवहार करना होगा। आंख, कान और नाक आदि स्वभाववश देखने, सुनने और सूंघने का काम तो करेंगे, पर क्या और कितना देखें, सुनें और सूंघें, यह इन ज्ञानेंद्रियों या बाहर उपस्थित विषयों पर नहीं छोड़ा जा सकता। यह यांत्रिक ढंग से नहीं चलना चाहिए। आज जिस तरह बाजार हमारी जरूरतों को बता रहा है और हमें निर्देशित कर रहा है, वह सबके अनुभव का विषय है।
भौतिक दुनिया के हमारे ज्ञान और आविष्कार की बदौलत आज हमारा दृश्य जगत तीव्र गति से अत्यंत गतिशील और निरंतर बदलने वाला होता जा रहा है। उसे देख और उससे जुड़ने के बाद जो रोमांच होता है, वह हमें अस्थायी दृश्य में सत्य के आभास देने के साथ उसे और दृढ़ता से बांधने वाला होता जा रहा है। भावी दृश्यों की शृंखला की कल्पना हमें उसकी अनित्यता, अस्थायित्व या मिथ्यापन को ढक लेती है। ऐसे दृश्य सतत अशांति को पैदा करते हैं, पर हमारी मजबूरी यह है कि दृश्य से बंधकर हम उनको क्लेश भी नहीं समझते, क्योंकि ऊपर से वे बड़े प्रिय लगते हैं। दृश्यों की विकराल विकट छाया हम पर इस तरह हावी होती जाती है कि हम उसी में खो जाते हैं। योग इस महारोग का उपचार है, जो हमें हमारी अपनी समझ वापस लौटाता है। वह हमें पुनः अपने स्वरूप में यानी द्रष्टा की भूमिका में स्थापित करता है।
(लेखक दर्शनशास्त्री हैं)












