विचार: एक नाजुक समझौता
समझौते के तहत अमेरिका ने ईरान पर जो तमाम प्रतिबंध लगा रखे थे, उन्हें हटा लिया है। इसके चलते अब भारत भी उससे तेल खरीदने में समर्थ हो जाएगा।
HighLights
संजय गुप्त। आखिरकार अमेरिकी राष्ट्रपति को इजरायल के साथ मिलकर ईरान के खिलाफ छेड़े गए एक अनावश्यक युद्ध के उपरांत उसके साथ अंतरिम समझौता करना ही पड़ा। फिलहाल यह समझौता नाजुक लगता है। लेबनान के समझौते का हिस्सा होने के बाद भी इजरायल ने गत दिवस जिस तरह उस पर हमला किया, उससे यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या अमेरिका और ईरान अगले 60 दिन आपसी बातचीत के जरिये अनसुलझे मुद्दों को सुलझा सकेंगे? इजरायल और अमेरिका के लिए यह चिंता की बात है कि ईरान हमास, हिजबुल्ला और हाउती जैसे उन संगठनों की मदद करता है, जो इजरायल के लिए खतरा बने हुए हैं। हालांकि ट्रंप लेबनान को लेकर इजरायल को संयमित रहने के लिए चेता रहे हैं, लेकिन क्या ईरान हिजबुल्ला पर लगाम लगाने की गारंटी लेने को तैयार है? यदि ईरान हिजबुल्ला पर लगाम नहीं लगाता तो इजरायल के लिए यह संभव नहीं होगा कि वह लेबनान में उसे निशाना न बनाए।
अमेरिका-ईरान युद्ध में जो अबूझ पहेली है, वह यह कि आखिर ट्रंप को ईरान के विरुद्ध युद्ध छेड़ने की जरूरत ही क्या थी? ईरान पिछले कई वर्षों से यूरेनियम का संर्वधन कर रहा था और माना जाता है कि वह परमाणु हथियार बनाने की कोशिश कर रहा था। इससे इजरायल के साथ खाड़ी के देश भी चिंतित थे। ईरान के परमाणु हथियार बनाने के इरादे को देखते हुए अमेरिका ने उस पर प्रतिबंध लगा रखे थे। इसके चलते ईरान के लिए अन्य देशों से व्यापार करना कठिन हो गया था। चूंकि अमेरिका सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति है, इसलिए कोई देश उसके प्रतिबंधों की अनदेखी कर ईरान से व्यापार करने का साहस नहीं जुटा पाता था। ईरान चीन के अलावा उन देशों को ही तेल बेच पा रहा था, जो अमेरिकी प्रतिबंधों की परवाह नहीं करते। वह अपना कुछ तेल चोरी-छिपे भी बेच रहा था। हालांकि उसकी अर्थव्यवस्था लगातार कमजोर हो रही थी, लेकिन वह परमाणु हथियार बनाने के अपने इरादे को छोड़ने के लिए तैयार नहीं दिख था।
आम धारणा है कि अमेरिका ने इजरायल के कहने पर ईरान पर हमला किया। ट्रंप इससे भी नाराज थे कि ईरान भारी दबाव के बाद भी परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाने में जुटा है। अमेरिका-इजरायल की ओर से ईरान को निशाना बनाते ही उसने होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों का निकलना बंद कर दिया। इसके अलावा उसने खाड़ी देशों के अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाना शुरू कर दिया। खाड़ी के देश अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भर हैं। ईरान ने उनके यहां हमला कर यह संदेश दिया कि वे अमेरिकी सैन्य संरक्षण में सुरक्षित नहीं। ईरान के पास मिसाइलों के साथ सस्ते, किंतु घातक क्षमता वाले ड्रोन का जखीरा था। इसी कारण वह अमेरिका के हमलों का जवाब देता रहा। अरबों डालर खर्च कर ईरान पर हमले करने के बावजूद अमेरिका उसकी सैन्य क्षमता को कुंद नहीं कर सका। अमेरिकी राष्ट्रपति के सामने एक समस्या यह भी आ गई थी कि ईरान के खिलाफ लंबे समय तक युद्ध जारी रखने के लिए उन्हें संसद से अनुमति लेनी पड़ती और वह उन्हें मिलनी बहुत कठिन थी। शायद इसी कारण वे समझौता करने के लिए बाध्य हुए। हालांकि इस समझौते को वे अपनी जीत बता रहे हैं, लेकिन ऐसा ही दावा ईरान भी कर रहा है। यह ठीक है कि ईरान ने परमाणु हथियार न बनाने का वादा किया है, लेकिन क्या इजरायल इस पर भरोसा कर सकता है? यह देखना होगा कि अमेरिका और ईरान के बीच जो अंतरिम समझौता हुआ, वह अंतिम समझौते में तब्दील हो पाता है या नहीं?
अमेरिका इससे तो चिंतित है कि ईरान चोरी-छुपे परमाणु हथियार बनाना चाहता है, लेकिन सब जानते हैं कि पाकिस्तान ने भी चोरी-छुपे परमाणु हथियार बनाए और अमेरिका ने उस पर कभी प्रतिबंध नहीं लगाए। उसने पाकिस्तान को इसके लिए भी दंडित नहीं किया कि वह तमाम आतंकी समूहों को पाल रहा है। चूंकि अमेरिका दोहरे रवैया का परिचय देने में माहिर है, इसलिए विश्व में उसकी छवि और प्रतिष्ठा गिरती चली जा रही है। एक समय अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने जिस पाकिस्तान को धोखेबाज करार दिया था, उससे ही वे दोस्ती बढ़ाने में लगे हुए हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने उसे यह अवसर प्रदान किया कि वह अमेरिका और ईरान के बीच समझौता कराने की भूमिका निभाए। हालांकि इस समझौते में कुछ अन्य देशों की भी भूमिका है, लेकिन अमेरिका ने ईरान से समझौता करने के लिए जिस तरह पाकिस्तान का साथ लिया, उससे उसे अपने को शांति का समर्थक बताने का मौका मिल गया है, जबकि सब जानते हैं कि वह एक गैर-जिम्मेदार राष्ट्र है और उसकी ऐसी हैसियत भी नहीं कि वह अमेरिका और ईरान के बीच समझौता करा सके। हैरानी नहीं कि उसे महज संदेशों का आदान-प्रदान करने वाले देश के रूप में देखा गया।
अमेरिका और ईरान के बीच समझौते के बाद होर्मुज समुद्री मार्ग खुल गया है और जहाजों की आवाजाही शुरू हो गई है। इसके चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम नरम पड़े हैं। इसका सीधा लाभ भारत के साथ विश्व के तमाम देशों को मिलेगा। आशा की जाती है कि बीते लगभग सौ दिनों में तेल, गैस और उर्वरकों के दाम बढ़ने के कारण विश्व अर्थव्यवस्था को जिन कठिनाइयों से गुजरना पड़ा, उनका धीरे-धीरे समाधान होगा। यदि अमेरिका-ईरान के बीच समझौता कारगर साबित होता है तो इससे पश्चिम एशिया में शांति बनाए रखने के साथ विश्व अर्थव्यवस्था को भी राहत मिलेगी, क्योंकि होर्मुज से विश्व के पांचवें हिस्से की ऊर्जा का निर्यात होता है।
समझौते के तहत अमेरिका ने ईरान पर जो तमाम प्रतिबंध लगा रखे थे, उन्हें हटा लिया है। इसके चलते अब भारत भी उससे तेल खरीदने में समर्थ हो जाएगा। वह ईरान स्थित चाबहार बंदरगाह का विकास भी कर सकता है। ईरान से तेल आयात इसलिए लाभकारी है, क्योंकि वह रूस, अमेरिका और वेनेजुएला की तुलना में कुछ सस्ता पड़ेगा। समझौते के तहत अमेरिका इसके लिए भी तैयार हुआ कि वह ईरान के विकास के लिए 300 अरब डालर के एक कोष की स्थापना में मदद करेगा। इसकी अमेरिका में आलोचना हो रही है। यह स्वाभाविक भी है, लेकिन कुल मिलाकर यह समझौता विश्व के लिए राहतकारी है।
(लेखक दैनिक जागरण के प्रधान संपादक हैं)












