प्रधानमंत्री ने कोलकाता के श्यामा प्रसाद मुखर्जी बंदरगाह पर जिन तीन नौसैनिक जहाजों आइएनएस दूनागिरि, आइएनएस संशोधक और आइएनएस अग्रय का शुभारंभ किया, उनकी विशेषता यह है कि वे स्वदेशी रूप से डिजाइन और निर्मित हैं। नि:संदेह यह एक उपलब्धि है और इस बात को रेखांकित करती है कि भारत को रक्षा क्षेत्र में अब केवल खरीदार बनकर नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसे अपनी आवश्यकता की अधिकाधिक रक्षा सामग्री का उत्पादन देश में ही करना होगा। यह इसलिए आवश्यक है कि वर्तमान में किसी भी देश की सैन्य शक्ति का आकलन केवल इससे नहीं किया जाता कि उसके पास कैसे और कितने हथियार हैं, बल्कि इससे अधिक किया जाता है कि वह अपने स्तर पर रक्षा सामग्री का कितना अधिक निर्माण करता है?

यदि भारत को आत्मनिर्भर बनना है तो उसके दायरे में रक्षा सामग्री अनिवार्य रूप से आनी चाहिए। यह ठीक नहीं कि भारत अभी भी रक्षा सामग्री के एक प्रमुख आयातक देश के रूप में जाना जाता है। अच्छी बात यह है कि धीरे-धीरे इस स्थिति में परिवर्तन हो रहा है। यह महत्वपूर्ण है कि पिछले कुछ वर्षों में 40 से अधिक स्वदेश निर्मित युद्धपोत और पनडुब्बियां भारतीय नौसेना में शामिल की गई हैं। एक समय ऐसा था जब भारत अपनी हर छोटी-बड़ी रक्षा सामग्री का आयात करता था। इससे रणनीतिक और सुरक्षा संबंधी चुनौतियां उत्पन्न होती थीं।

यह उल्लेखनीय है कि पिछले लगभग एक दशक में रक्षा सामग्री के स्वदेश में निर्माण को बल मिला है। इसके चलते देश में रक्षा उत्पादन में भी वृद्धि हुई है। जहां 2014 में भारत का कुल रक्षा उत्पादन 40 हजार करोड़ रुपये था, वहीं अब यह बढ़कर 1.8 लाख करोड़ रुपये हो गया है। यह रक्षा सामग्री के मामले में आत्मनिर्भरता को रेखांकित तो करता है, लेकिन अभी बहुत कुछ हासिल करना शेष है। कुछ समय पहले तक भारत में ज्यादातर रक्षा सामग्री का उत्पादन सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में होता था। इसके चलते रक्षा सामग्री के उत्पादन की गति धीमी थी और उन्नत रक्षा सामग्री का निर्माण भी नहीं हो पाता था।

यह अच्छा हुआ कि रक्षा सामग्री के निर्माण में निजी क्षेत्र का भी योगदान लेना शुरू किया गया। इसका परिणाम यह है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत का रक्षा निर्यात भी बढ़ा है और वर्तमान में यह 38 हजार करोड़ तक पहुंच गया है। अब भारतीय रक्षा उत्पाद विश्व के करीब 80 देशों में निर्यात किए जाते हैं। यह ठीक है कि 2029 तक रक्षा निर्यात को 50 हजार करोड़ रुपये तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है, लेकिन यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि देश में रक्षा सामग्री के उत्पादन की कई परियोजनाएं लंबित चल रही हैं। इनके कारणों की पहचान कर उनका प्राथमिकता के आधार निवारण किया जाना चाहिए।