विचार: फ्रांस में नई करवट लेंगे भारत-अमेरिका संबंध
भारत की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा के बीच पीएम मोदी फ्रांस में जी-7 शिखर सम्मेलन में भाग लेंगे। इस दौरान अमेरिका-ईरान समझौते, नाविकों की मौत और व्यापारिक मुद्दों पर भारत-अमेरिका संबंधों की नई दिशा तय होगी।
HighLights
जी-7 में भारत की भागीदारी वैश्विक प्रतिष्ठा का प्रमाण।
होर्मुज जलमार्ग खुलने से भारत को बड़ी राहत मिलेगी।
नाविकों की मौत, व्यापार समझौते पर मोदी-ट्रंप चर्चा।
डॉ. मनिष दाभाडे। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों द्वारा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को जी-7 में साझेदार देश के रूप में बुलाना भारत की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा का प्रमाण है। जब मोदी फ्रांस के एवियां-ले-बैंस में जी-7 शिखर सम्मेलन में पहुंचेंगे, उससे ठीक पहले दुनिया एक बड़े कूटनीतिक उलटफेर की गवाह बनी है।
अमेरिका और ईरान के बीच 14 जून को एक युद्धविराम समझौते पर सहमति बनी है, जिस पर 19 जून को हस्ताक्षर किए जाएंगे। इस समझौते के तहत होर्मुज जलमार्ग निर्बाध रूप से खुलेगा, अमेरिकी नाकेबंदी हटेगी और परमाणु वार्ता के लिए साठ दिन का ढांचा तैयार होगा। इस समझौते ने मोदी-ट्रंप की संभावित मुलाकात का पूरा संदर्भ ही बदल दिया है और संभव है कि इसमें भारत के तीखे सवाल गौण होकर रह जाएं।
ऐसा ही एक सवाल तीन नाविकों की मौत से जुड़ा है। ये अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी में मारे गए। विदेश मंत्रालय ने इस मामले में अमेरिकी राजनयिक को तलब किया। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अमेरिकी विदेश मंत्री रूबियो से कहा कि यह हमला 'न्यायसंगत नहीं था।' यह विरोध सही था, लेकिन यहां एक अलग ही उलटबांसी है। वह यह कि जिस सैन्य अभियान में ये जानें गईं, उसे अमेरिका ने खुद कूटनीति से वापस खींच लिया।
ये मौतें अमेरिका के उस दांव के कारण हुईं, जिसे बाद में पलट दिया गया। एवियां में मोदी को बिना किसी राजनयिक लाग-लपेगट के इन मौतों पर जवाबदेही की मांग करनी होगी।
अगर अमेरिका-ईरान समझौते पर दृष्टि डालें तो यह भारत के लिए बहुत बड़ी राहत है। होर्मुज जलमार्ग का भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बहुत महत्व है। भारत के कच्चे तेल आयात का लगभग चालीस प्रतिशत इसी रास्ते से आता है। गैस की आपूर्ति भी एक बड़ी हद तक इसी मार्ग के जरिये होती है। नाकेबंदी के कारण न केवल आपूर्ति बाधित थी, बल्कि ढुलाई लागत भी बढ़ गई थी।
आपूर्ति शृंखला में गतिरोध से महंगाई का दबाव बढ़ने लगा। स्वाभाविक है कि इस जलमार्ग का खुलना भारत के लिए अच्छी खबर है। हालांकि इस खुशखबरी के बीच नाविकों की मौत के मुद्दे को अनदेखा नहीं किया जा सकता। एक परिपक्व विदेश नीति यही करती है कि समझौते के स्वागत के साथ ही नाविकों के मुद्दे पर जवाबदेही की मांग करो। ये दोनों बातें एक-दूसरे की विरोधी नहीं हैं।
एवियां में मोदी-ट्रंप संभावित मुलाकात की बात करें तो यह पिछले वर्ष व्हाइट हाउस में मुलाकात के बाद दोनों की पहली द्विपक्षीय भेंट होगी। मोदी का वह अमेरिकी दौरा ठोस नतीजों का निमित्त बना था। उसमें सैन्य साझेदारी, तकनीकी हस्तांतरण और वाणिज्य के स्तर पर संयुक्त पहल शुरू हुई।
सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस-एआइ, क्वांटम कंप्यूटिंग और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में सहयोग का ढांचा बना, 500 अरब डालर के द्विपक्षीय व्यापार का लक्ष्य तय हुआ और मुंबई हमले के आरोपी तहव्वुर राणा का प्रत्यर्पण हुआ। इसके बावजूद व्यापार के मोर्चे पर तस्वीर जटिल बनी हुई है। फरवरी में अंतरिम समझौते की रूपरेखा तो बनी और टैरिफ 25 से 18 प्रतिशत हुआ, लेकिन आखिरी मंजिल अभी दूर है।
नए श्रम-उल्लंघन शुल्क की सुनवाई जुलाई में होगी। भारतीय टेक्नोलाजी पेशेवरों के लिए एच-1बी वीजा का संकट जारी है। इसकी वजह से आठ लाख भारतीय पेशेवर प्रभावित हैं। यही पेशेवर अमेरिकी टेक इकोनमी की रीढ़ भी हैं। अच्छी बात है कि जयशंकर ने यह मुद्दा सीधे उठाया है और उठाते रहना भी चाहिए।
व्यापक संबंधों की दशा-दिशा को देखें तो मई में नई दिल्ली में हुई क्वाड बैठक में हिंद-प्रशांत समुद्री निगरानी का नया ढांचा बना, महत्वपूर्ण खनिजों पर द्विपक्षीय समझौता हुआ और बीस अरब डालर की सप्लाई चेन मजबूत करने की प्रतिबद्धता जताई गई, जो चीन के दुर्लभ खनिजों पर वर्चस्व का जवाब है। रक्षा सहयोग अब खरीदार-विक्रेता के पुराने ढांचे से निकलकर सह-विकास और सह-उत्पादन की दिशा में बढ़ रहा है।
ईरान समझौते के बाद खाड़ी क्षेत्र में स्थिरता आने से अमेरिकी रणनीतिक ध्यान हिंद-प्रशांत की ओर और मुड़ेगा और वहां भारत की केंद्रीयता बढ़ेगी ही। चीन की आक्रामकता हिमालय से लेकर दक्षिण चीन सागर तक कम नहीं हुई है और यही वह मूल कारण है, जो इस साझेदारी को अपरिहार्य बनाता है। इसके साथ ही हमें एक कड़वी सच्चाई पर भी गौर करना होगा और वह यह कि वर्ष 2047 तक तक विकसित भारत का संकल्प रणनीतिक एकाकीपन से पूरा नहीं हो पाएगा।
दुनिया का सबसे बड़ा वेंचर कैपिटल बाजार, सबसे उन्नत टेक इकोसिस्टम, सबसे गहन रक्षा प्रौद्योगिक आधार और भारतीय वस्तुओं के लिए सबसे विशाल बाजार, ये सब अमेरिका में ही हैं। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने लोकसभा में कहा भी कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौता विकसित भारत की यात्रा को गति देगा। यही इस रिश्ते की असली धुरी है।
ट्रंप का दूसरा कार्यकाल अब तक भारी अनिश्चितताओं से भरा रहा है, जिसमें मोदी की नीति-संयम, स्पष्टता और टकराव से परहेज वाली रही है। यह दूरदृष्टि का ही परिचायक है। जब भारत पर टैरिफ लगे, तो जवाबी कारवाई नहीं हुई। जब दूसरे देशों ने अमेरिका-विरोधी गठबंधन का प्रलोभन दिया तो भी भारत ने जल्दबाजी नहीं दिखाई।
इस संदर्भ में जयशंकर का यह कथन उल्लेखनीय रहा, 'रिश्तों में मुद्दे और मतभेद हमेशा रहेंगे, जहां मायने यह रखता है कि उनसे निपटकर आगे बढ़ने की क्षमता हो।' ईरान समझौता खुद इसी सबक की पुष्टि करता है कि उग्र से उग्र टकराव भी धैर्यपूर्ण कूटनीति से सुलझाए जा सकते हैं।
एवियां में मोदी को तीन काम एक साथ करने हैं। नाविकों की मौत पर ठोस जवाबदेही और भविष्य में व्यावसायिक जहाजों की सुरक्षा को लेकर प्रतिबद्धता लेनी है, खासकर तब जब होर्मुज अमेरिका की सहमति से खुल रहा है।
व्यापार समझौते के अटके अंतिम हिस्से को पूरा कराने के लिए दबाव बनाना है और दोनों देशों के बीच बनी रणनीतिक संरचना को उस नींव के रूप में पुष्ट करना है, जो किसी भी राजनीतिक तूफान से परे है। भारत-अमेरिका संबंध आज जितने गहरे हैं और जितने जरूरी हैं, इतिहास में पहले कभी नहीं थे। एवियां में संबंधों को सही दिशा में आगे बढ़ाना होगा।
(लेखक जेएनयू में एसोसिएट प्रोफेसर और ‘द इंडियन फ्यूचर्स’ के संस्थापक हैं)












