पुनीत डालमिया। भारत की लोकतांत्रिक एवं आर्थिक यात्रा में 10 जून, 2026 की तिथि एक मील के पत्थर के रूप में अंकित होगी। इसी दिन नरेन्द्र मोदी ने एक कीर्तिमान स्थापित किया, जब निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल सबसे लंबा हो गया। उद्योग जगत के लिए यह और महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें नेतृत्व की निरंतरता, नीतिगत स्थिरता और अर्थव्यवस्था की दिशा के प्रति विश्वास जैसे भाव समाहित हैं।

यही वे आधार हैं जिन पर निवेश एवं उद्यम की नींव टिकी होती है। उद्योग जगत के लिए ये 12 वर्ष स्वतंत्र भारत के सबसे अहम वर्षों में रहे। इस दौरान मोदी सरकार ने न केवल महत्वाकांक्षी बुनियादी ढांचे के विकास को साकार रूप दिया है, बल्कि नीतियों को इस प्रकार से आकार दिया, जिससे भारत एक अधिक एकीकृत, अधिक डिजिटल और अधिक प्रतिस्पर्धी आर्थिकी बन गया है।

इन 12 वर्षों की यात्रा में एक महत्वपूर्ण मोड़ जीएसटी के माध्यम से एकीकृत राष्ट्रीय बाजार के निर्माण का रहा। राज्य स्तर पर विभिन्न अवरोधों को दूर करते हुए जीएसटी ने कंपनियों को लाजिस्टिक्स को सुव्यवस्थित करने और बाजार में तेजी से पहुंचने में सक्षम बनाया। जीएसटी के साथ दिवालियापन एवं ऋण शोधन संहिता ने क्रेडिट बाजारों में अपेक्षित अनुशासन का संचार किया। इसने उधारी के तंत्र को मजबूत किया, वसूली की प्रक्रिया में सुधार किया और आश्वस्त किया कि भारत फंसी हुई परिसंपत्तियों के परिदृश्य को सुव्यवस्थित नियमों के माध्यम से सुलझाने के प्रति गंभीर है।

बुनियादी ढांचा इस कार्यकाल का दूसरा प्रमुख स्तंभ रहा है। पिछले 12 वर्षों में भारत ने सड़कों, रेलवे, बंदरगाहों, बिजली और डिजिटल कनेक्टिविटी में असाधारण प्रगति की है। राजमार्गों का विस्तार द्रुत गति से हुआ है। रेल लाइनों का व्यापक विद्युतीकरण किया गया है। माल ढुलाई गलियारों का विस्तार हुआ। हवाई अड्डों की संख्या बढ़ी है और नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में महत्वपूर्ण वृद्धि हुई है।

कम लाजिस्टिक्स लागत, तेजी से माल ढुलाई, छोटे शहरों से बेहतर कनेक्टिविटी और बिजली की निर्बाध एवं भरोसेमंद आपूर्ति जैसे पहलू व्यवसायों को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाते हैं। ये पहलू स्थायी विकल्पों की बाट जोह रही वैश्विक आपूर्ति शृंखला में भारत को एक आकर्षक विकल्प के रूप में उभारने में मददगार बनते हैं। बुनियादी ढांचे पर यह जोर विनिर्माण आकांक्षाओं को भी परवान चढ़ाता है।

उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजनाओं और संबंधित नीतिगत पहलों के माध्यम से भारत ने इलेक्ट्रानिक्स, सेमीकंडक्टर्स, फार्मास्यूटिकल्स, आटोमोबाइल, नवीकरणीय ऊर्जा और रक्षा विनिर्माण जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया है। उद्योग जगत ने भी इस पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है। घरेलू और विदेशी निवेश ने उन क्षेत्रों में भी गति पकड़ी है, जिनमें पहले भारत पर बहुत दांव नहीं लगाया जाता था।

इलेक्ट्रानिक्स विनिर्माण में वृद्धि, भारत के एक प्रमुख स्मार्टफोन उत्पादक के रूप में उभरना और प्रमुख सेमीकंडक्टर परियोजनाओं का आगे बढ़ना इस बड़े बदलाव का ही प्रतीक है। इसके चलते अब भारत को विनिर्माण और नवाचार के एक उदीयमान गढ़ के रूप में देखा जा रहा है। आज कंपनियां अपनी आपूर्ति शृंखलाओं पर पुनर्विचार कर रही हैं। सोर्सिंग रणनीतियों में विविधता ला रही हैं और स्थायित्व से परिपूर्ण ऐसे क्षेत्राधिकारों की राह तलाश रही हैं, जहां वे दीर्घकालिक निवेश कर सकें।

ऐसे माहौल में भारत का विशाल आकार, प्रतिभाओं की भरमार, लोकतांत्रिक संस्थाओं के स्वरूप और सुधारों की गति उसे एक विशिष्ट स्थिति प्रदान करते हैं, लेकिन केवल सही स्थिति में होना ही पर्याप्त नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल में सबसे महत्वपूर्ण स्पष्ट संकेत रहा कि सरकार दृढ़ता से निर्णय लेने, समय के साथ सुधारों की निरंतरता बनाए रखने और अपनी नीतिगत मंशा को धरातल पर उतारने के लिए पूरी तरह तैयार है। उद्योग जगत के लिए यह विश्वसनीयता बेहद मूल्यवान है। यह अनिश्चितता को कम करती है और दीर्घकालिक पूंजी निवेश की संभावनाओं को और सुदृढ़ बनाती है।

औद्योगिक विकास पर सामाजिक और आर्थिक समावेशन का व्यापक प्रभाव भी प्रत्यक्ष है। वित्तीय समावेशन, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण प्रणाली, आवास, स्वच्छता और स्वास्थ्य देखभाल पहलों ने औपचारिक अर्थव्यवस्था को विस्तार देने के साथ घरेलू स्थिरता में सुधार किया है। जब अधिक नागरिक बैंकिंग, डिजिटल भुगतान, कल्याणकारी योजनाओं और बुनियादी सेवाओं से जुड़ते हैं तो अर्थव्यवस्था की कुशलता बढ़ने के साथ ही वह निवेश योग्य भी बनती जाती है। यह व्यापक समावेशन मजबूत मांग का सृजन करता है, उपभोक्ता बाजार को गहराई प्रदान करता है और उद्योग जगत को अधिक आत्मविश्वास के साथ अपना दायरा बढ़ाने के लिए योजनाएं बनाने के लिए उन्मुख करता है।

इन वर्षों में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन राष्ट्रीय सुरक्षा कवच की मजबूती से जुड़ा है, जो देश की आर्थिक वृद्धि का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन गया है। सुरक्षित एवं स्थायित्वपूर्ण परिदृश्य आर्थिक प्रगति के लिए अनिवार्य है, जो निवेशकों एवं उद्योग जगत के भरोसे को बढ़ाता है। इसी क्रम में नीतिगत निरंतरता भी व्यावसायिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण होती है। उद्योग तभी फलते-फूलते हैं, जब नियमों में स्थिरता एवं उनकी दिशा स्पष्ट होती है। लंबे और निरंतर नेतृत्व का एक लाभ यह भी है कि इसमें सुधारों को परिपक्व होने का समय मिलता है। इससे उद्योग केवल तिमाहियों के बजाय वर्षों और दशकों के संदर्भ में सोचने में सक्षम बनाते हैं।

तमाम सुधारों के बावजूद देश को अभी भी शोध एवं विकास (आरएंडडी), डिजाइन क्षमताओं, उन्नत कौशल और नवाचार आधारित उत्पादन पर अधिक जोर देने की आवश्यकता है। विकास के अगले चरण के लिए असेंबलिंग से आगे बढ़कर उच्च-मूल्य वाले विनिर्माण की ओर बढ़ना होगा, क्रमिक सुधारों से आगे निकलकर कारोबारी सुगमता की दृष्टि से गहन संरचनात्मक सुधार करने होंगे और स्थानीय दायरे से बाहर निकलकर वैश्विक पटल पर कदम बढ़ाने होंगे। हमने आधार तो तैयार कर लिया है और अब उसे विस्तार देकर संभावनाओं को साकार करना होगा।

(लेखक फिक्की के उपाध्यक्ष और डालमिया भारत समूह के प्रबंध निदेशक हैं)