उमेश चतुर्वेदी। बंगाल में सत्ता से दूर होते ही ममता बनर्जी का साथ छोड़ने की उनके सहयोगियों में होड़ लग गई है। चार मई को बंगाल विधानसभा चुनाव नतीजे आने से पहले अजेय समझी जाती रहीं ममता बनर्जी की पार्टी के लगभग 20 लोकसभा सदस्य बगावत करने के लिए तैयार हैं। उनके राज्यसभा सदस्य भी एक-एक कर पार्टी छोड़ रहे हैं। उनके 58 विधायक पहले ही बागी हो चुके हैं। चुनावी हार के बाद यह बिखराव कोई पहला नहीं है। तमिलनाडु के विधानसभा चुनावों के बाद अन्नाद्रमुक को भी बिखराव का सामना करना पड़ रहा है।

हालांकि पार्टी नेता पलानीस्वामी हालात पर नियंत्रण पाने में कामयाब होते दिख रहे हैं। पार्टी ह्विप का उल्लंघन करके विधानसभा में मुख्यमंत्री विजय का साथ दे चुके 25 में से उनके 21 विधायक नेतृत्व के प्रति आस्था जता चुके हैं। इसके ठीक पहले अरविंद केजरीवाल के सबसे नजदीकी सहयोगी माने जाते रहे राघव चड्ढा की अगुआई में आम आदमी पार्टी के दस में से सात राज्यसभा सदस्यों ने अलग गुट बना लिया। महाराष्ट्र की दो प्रमुख पार्टियां शिवसेना और राकांपा भी ऐसे ही हालात से दो-चार हो चुकी हैं। दोनों ही पार्टियों के बागी अब असली पार्टी बन चुके हैं और पार्टी का अधिकृत चुनाव निशान भी उन्हीं के पास है। शिवसेना संस्थापक बाला साहब ठाकरे के बेटे उद्धव और राकांपा के संस्थापक शरद पवार के पास अपने-अपने दलों की सिर्फ बी टीमें रह गई हैं।

बिखराव वाले दलों में एक समानता है। सभी दल एक तरह से पारिवारिक पार्टी हैं। जब तक इन पार्टियों के साथ जनसमर्थन और सत्ता रही, इनके पारिवारिक मुखिया की हर बात स्वीकार्य रही, लेकिन सत्ता हाथ से जाते ही जिस तरह बिखराव बढ़ा है, उससे साफ है कि बागी दिल से दलीय अनुशासन या नेतृत्व के प्रति निष्ठा से नहीं बंधे थे। ममता बनर्जी के दल में जारी बड़ी बगावत के पीछे भाजपा का हाथ बताया जा रहा है, लेकिन इस आरोप के शोर में ममता के कार्यों और उनकी पार्टी चलाने की शैली को नहीं भुलाया जा सकता। पार्टी नेता मानते हैं कि ममता अधिनायकवादी ढंग से पार्टी चलाती रहीं। इसके खिलाफ उनकी पार्टी में असंतोष पहले से ही था। एक तरह से अंदर ही अंदर तूफान चल रहा था। अगर पार्टी सत्ता में लौट आई होती तो सरकारी ताकत की गोंद और नेताओं की कुछ पा लेने की उम्मीद के चलते यह तूफान थम जाता, लेकिन पार्टी चौथी बार सत्ता में नहीं लौट पाई। लिहाजा अंदर पनप रहा विद्रोह सतह पर आ गया।

इस आग में चुनावी हार के बाद हुई पहली बैठक में अभिषेक बनर्जी की मनमानी ने घी का काम किया। पार्टी के जीत की स्थिति में अभिषेक की बात मानने का फरमान स्वीकार हो जाता, लेकिन तृणमूल कार्यकर्ता अपनी हार के लिए अभिषेक की कार्यशैली को ही जिम्मेदार मानते हैं। लिहाजा उन्हें अभिषेक की सरपरस्ती मंजूर नहीं हुई। कार्यकर्ताओं को यह मलाल रहा कि तृणमूल बनाने वाले पिछड़ते गए और ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी ताकतवर होते गए। कुछ ऐसे ही हालात राकांपा में भी रहे। शरद पवार ने पार्टी की स्थापना की, उसमें उनका साथ उनके भतीजे अजीत पवार ने दिया। अजीत शरद पवार के स्वाभाविक उत्तराधिकारी माने जाते थे, लेकिन सुप्रिया सुले के आने के बाद उन्हें लगा कि जिस पार्टी को उन्होंने सींचा है, उसकी कमान उनके हाथ आने से रही तो उन्हें भी बगावत की राह सूझी। शिवसेना की स्थिति थोड़ी अलग रही।

शिवसेना की पूरी राजनीति कट्टर हिंदुत्व के इर्द-गिर्द रहते हुए कांग्रेस विरोध पर टिकी थी, लेकिन उद्धव ठाकरे ने जिद में भाजपा को नीचा दिखाने के लिए कांग्रेस का हाथ थाम लिया। शिवसेना के कार्यकर्ताओं के सामने वैचारिक संकट खड़ा हो गया। जैसे ही सत्ता शिवसेना के हाथ से फिसली, पार्टी दोफाड़ हो गई। रही बात आम आदमी पार्टी की तो आंदोलन से निकली इस पार्टी ने पहले वैचारिकता प्रतिबद्धता का आदर्शवादी माडल प्रस्तुत करने का दावा किया, लेकिन बाद में वहां एकाधिकारवाद बढ़ता गया। अन्नाद्रमुक में विद्रोह की बड़ी वजह सत्ता से बढ़ती दूरी से उपजी निराशा रही।

विपक्षी दलों में बिखराव का भाजपा को फायदा होगा, लेकिन इस तथ्य को भुलाया नहीं जा सकता कि लोकतांत्रिक राजनीति की बुनियाद में वैचारिक निष्ठा बेहद अहम है। दलों के अपने सिद्धांत इसी बुनियाद पर आधारित होते हैं और वे इसी आधार पर वोट मांगते हैं। हालांकि विचारधारा की राजनीति में गिरावट लंबे अर्से से दिख रही है, लेकिन अब यह चरम पर है। सत्ता जाते ही अपने दल से पीछा छुड़ाने और सत्ताधारी दल में शामिल होने की हिचक अब नहीं दिखती। हैरत की बात है कि उन्हें शामिल कराने वाला दल भी उनके पहले के अपशब्दों और निजी आक्षेपों को भुला देता है। निष्ठाएं बदलने के पीछे एक वजह चुनावी राजनीति का लगातार महंगा होता जाना भी है। अकूत संपत्ति के बिना आज के दौर में अपने दम पर चुनाव लड़ पाना आसान नहीं है। सामान्य पृष्ठभूमि के वही उम्मीदवार चुनावी मैदान में गंभीर चुनौती देने में कामयाब होते हैं, जिनका दल मजबूत होता है या फिर उनका राजनीतिक नेतृत्व उनका साथ देता है। चूंकि सत्ता की ही सवारी के जरिये ताकत और संपत्ति कमाई जा सकती है, इसलिए वैचारिक निष्ठाएं त्यागने में देर नहीं लगती।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं)