डॉ. आशीष त्रिपाठी। बीते दिनों अमेरिका की प्रतिनिधि सभा में हिंदुओं के प्रति घृणा अपराध से जुड़ा एक प्रस्ताव पेश किया गया। यह प्रस्ताव मिशिगन से डेमोक्रेट सांसद श्री थानेदार ने पेश किया था। इस प्रस्ताव का रो खन्ना, राजा कृष्णमूर्ति और सुहास सुब्रमण्यम सहित 32 सांसद समर्थन कर चुके हैं। इससे पूर्व अमेरिका के मिनेसोटा प्रांत की सीनेट ने भी हिंदूफोबिया के खिलाफ एक प्रस्ताव पेश किया था।

इस प्रस्ताव को यहां के 400 से अधिक कानून निर्माताओं ने अपने समर्थन से प्रस्तुत किया। इस कार्य के पीछे ‘कोलिशन आफ हिंदूज आफ नार्थ अमेरिकन’ (कोहना) नाम की एक संस्था का सफल प्रयास रहा।

इस प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य अमेरिका में रहने वाले हिंदू अमेरिकी और हिंदू धर्म, रीति-रिवाज और संस्कृति के खिलाफ चलाए जा रहे सुनियोजित कट्टर अभियानों को रोकना और हिंदू समुदाय के साथ होने वाले भेदभावों को ध्यान में रखकर ऐसा कृत्य करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करना है। यह प्रस्ताव हिंदू समुदाय के खिलाफ बढ़ती कट्टरता और हिंदू पूजा स्थलों को क्षति पहुंचाने की घटनाओं के कारण लाया गया था।

अमेरिका में इस प्रकार का प्रस्ताव पहली बार नहीं लाया गया है। इससे पहले अमेरिका के जार्जिया प्रांत में भी अप्रैल 2023 में यहां की असेंबली ने एक प्रस्ताव पास किया था, जो हिंदुओं के खिलाफ बढ़ती कट्टरता, घृणा और अत्याचार को रोकने के लिए एक औपचारिक मान्यता प्रदान करता है।

पिछले कई वर्षों में अमेरिका और यूरोप सहित पश्चिम के अनेक देशों में रहने वाले हिंदू समुदाय के प्रति कट्टरता और हिंसा में बढ़ोतरी हुई है। वहां के हिंदू समुदाय के लोगों के साथ कार्यस्थलों पर भेदभाव की घटनाएं सामने आती हैं। सूचना क्रांति के इस युग में भिन्न-भिन्न प्लेटफार्म्स पर हिंदू परंपराओं और मान्यताओं के खिलाफ सुनियोजित ढंग से एक प्रोपेगंडा फैलाया जा रहा है। इसका उद्देश्य हिंदू समुदाय को नीचा दिखाना तथा उनके प्रति नकारात्मक और अपमानजनक दृष्टिकोण रखकर उन्हें हतोत्साहित करना है।

‘हिंदूफोबिया’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1866 में सर एडवर्ड सुल्लीवन ने किया। उन्होंने हिंदूफोबिया की चर्चा करते हुए हिंदुओं के प्रति होने वाले पूर्वाग्रहों और उनके प्रति अपमानजनक दृष्टिकोण को पेश किया था। प्रसिद्ध लेखक राजीव मल्होत्रा ने भी अपनी बहुचर्चित पुस्तक ‘स्नेक्स इन द गंगा: ब्रेकिंग इंडिया 2.0' में वैश्विक स्तर पर एक विशेष विचारधारा के लोगों द्वारा भारत की सनातन संस्कृति और विरासत के खिलाफ चलाए जा रहे वैचारिक षड्यंत्र की ओर ध्यान आकर्षित कराया।

हाल के वर्षों में कई पश्चिमी देशों में हिंदू धर्म के अनेक अनुयायियों को निशाना बनाया गया है। इसलिए कई देशों की संसद में इस विषय से जुड़ी चिंताओं को प्रकट किया है। पिछले वर्ष स्काटलैंड की संसद में ‘हिंदूफोबिया इन स्काटलैंड’ नामक एक रिपोर्ट को प्रस्तुत किया गया था। इस रिपोर्ट को गांधीयन पीस कमेटी द्वारा तैयार किया गया था। यह रिपोर्ट बताती है कि स्काटलैंड में रहने वाले हिंदुओं के खिलाफ हिंसा और भेदभाव के मामले 2019 के बाद कई गुना बढ़ गए हैं। इस कारण यहां हिंदू समुदाय के लोग अपने परंपरागत परिधान पहनने से और अपनी पहचान सार्वजनिक करने से बचते हैं।

हिंदू धर्म और संस्कृति के प्रति घृणा को मुख्यधारा के अकादमिक जगत में भी व्यापक रूप से देखा जाता है, जिसमें कई विश्वविद्यालयों में हिंदू धर्म और हिंदू समुदाय के लोगों को अपमानित किया जाता है। इस संदर्भ में ब्रिटेन स्थित आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में पढ़ने वाली छात्रा रश्मि सामंत का कटु अनुभव उल्लेखनीय है।

उन्होंने अपनी पुस्तक ‘ए हिंदू इन आक्सफोर्ड’ में लिखा कि इस विश्वविद्यालय में हिंदूफोबिया के कारण ही उन्हें छात्र संघ के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा था। वह यह पद हासिल करने वाली पहली महिला भारतीय थीं। भारत का हिंदू दर्शन और चिंतन विश्व को एक परिवार के रूप में देखता है। यह हिंदू जीवन पद्धति ही है, जो संसार के सभी प्राणियों में एक ही चैतन्य के अस्तित्व का अनुभव करती है। हिंदू चिंतन सर्वसमावेशी होकर सभी के कल्याण और उत्थान की कामना करता है।

उन्नीसवीं सदी के महानतम लेखकों में से एक रूस के लियो टाल्स्टाय ने हिंदू धर्म और विचार की बड़ी प्रशंसा की। सुप्रसिद्ध नाटककार नोबेल पुरस्कार विजेता जार्ज बनार्ड शा ने हिंदू धर्म को विश्व के सबसे लचीले, सहिष्णु और समावेशी धर्म के रूप में देखा है। जर्मन मूल की प्रसिद्ध लेखिका मारिया विर्थ अपनी पुस्तक ‘थैंक यू इंडिया: ए जर्मन वूमेंस जर्नी टू विजडम आफ योग’ में भारत और इसकी सनातन संस्कृति का गुणगान करती हैं।

विश्व के कई देशों में हिंदू समुदाय के असंख्य लोग शांतिप्रिय ढंग से रह रहे हैं और अपने ज्ञान, मेधा तथा मेहनत से उस देश की उन्नति में अपना मूल्यवान योगदान सुनिश्चित कर रहे हैं। वे चिकित्सा, शिक्षा, तकनीक और राजनीति जैसे क्षेत्रों में भी अपनी अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं। हिंदू चिंतन सार्वभौमिकता, मानवीयता और तर्कशीलता के गुणों के आधार पर समूचे विश्व के कल्याण की भावना के साथ विश्वबंधुत्व का संदेश देता है। विश्व को भी हमारी चिर पुरातन और नित-नूतन हिंदू परंपरा का सम्मान करना चाहिए।

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर हैं)