डॉ. आनंद कुमार। अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते पर सहमति बनने की घोषणा के बाद पूरी दुनिया ने राहत की सांस ली है। वित्तीय बाजारों में उत्साह दिखा तो कच्चे तेल की कीमतें नरम पड़ीं। हालांकि उम्मीद की इस किरण के पीछे कुछ आशंका भी है।

ऐसा इसलिए, क्योंकि यह कोई अंतिम शांति संधि नहीं है, बल्कि भविष्य की वार्ताओं के लिए एक रूपरेखा मात्र है। यह समझौता तत्काल संघर्ष को रोकने और अमेरिका तथा ईरान के संबंधों को नई दिशा देने का अवसर अवश्य प्रदान करता है, किंतु यह अभी भी नाजुक, विवादास्पद और अनिश्चितताओं से घिरा हुआ है। वैसे भी कागज पर हुई शांति हमेशा धरातल पर साकार रूप नहीं ले पाती।

पिछले कुछ महीनों में हिंसक संघर्ष ने पूरे क्षेत्र को एक व्यापक युद्ध की आशंका से भर दिया था। ईरान, इजरायल और इस क्षेत्र के अनेक गैर-राज्यीय समूह आमने-सामने खड़े दिखाई दे रहे थे। इस संघर्ष का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र होर्मुज जलमार्ग बन गया था, जहां से विश्व के लगभग पांचवें हिस्से का तेल गुजरता है।

इस जलमार्ग के अवरुद्ध होने से वैश्विक ऊर्जा बाजारों में भारी उथल-पुथल मच गई थी और दुनिया भर में महंगाई बढ़ने की आशंका पैदा हो गई थी। इस जलमार्ग का फिर से खुलना और अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी के हटने से न केवल सैन्य टकराव का खतरा घटा है, बल्कि वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के सामान्य होने की उम्मीद भी जगी है।

हालांकि प्रमुख शिपिंग कंपनियों ने संकेत दे दिया है कि होर्मुज से सामान्य आवाजाही बहाल होने में महीनों लग सकते हैं। समुद्री बीमा की लागत अब भी ऊंची है, बंदरगाहों और अन्य बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा है और सबसे महत्वपूर्ण यह है कि इस समझौते की स्थिरता को लेकर अभी भी भरोसा नहीं बन पाया है। बाजार सकारात्मक खबरों पर तुरंत प्रतिक्रिया दे सकते हैं, लेकिन व्यापार जगत केवल घोषणाओं पर नहीं, बल्कि स्थायी स्थिरता पर भरोसा करता है।

इस समझौते की सबसे बड़ी चुनौती ईरान के परमाणु कार्यक्रम का मुद्दा है, जिसने दोनों देशों के संबंधों को दशकों से उलझाए रखा है। अमेरिकी प्रशासन का दावा है कि ईरान ने कभी परमाणु हथियार न बनाने पर सहमति व्यक्त की है। जबकि ईरान का कहना है कि वर्तमान समझौता केवल प्रारंभिक ढांचा है और परमाणु मुद्दे पर वास्तविक बात बाद में होगी, जब दूसरे पक्ष अपने शुरुआती दायित्वों को पूरा करेंगे।

दोनों पक्षों की यह विरोधाभासी व्याख्या किसी तकनीकी अंतर का प्रश्न नहीं है, बल्कि यही इस समझौते की कमजोरी का मूल कारण भी है। ईरान पर प्रतिबंधों का मुद्दा भी उतना ही विवादास्पद है। कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि ईरान को उसकी जब्त संपत्तियों तक पहुंच मिल सकती है और तेल निर्यात पर लगे प्रतिबंधों में ढील दी जा सकती है।

अमेरिकी प्रशासन इन बातों से इन्कार करते हुए कहता है कि आर्थिक लाभ तभी मिलेंगे, जब ईरान अपने दायित्वों का पालन करेगा। यह अस्पष्टता फिलहाल दोनों सरकारों के लिए राजनीतिक रूप से उपयोगी हो सकती है, क्योंकि वे घरेलू स्तर पर इसे अपनी जीत के रूप में पेश कर सकती हैं, लेकिन भविष्य में यही अस्पष्टता गंभीर विवाद का कारण भी बन सकती है।

अमेरिका और ईरान दोनों की घरेलू राजनीति इस समझौते के भविष्य को प्रभावित करेगी। अमेरिका में रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों दलों के सांसदों ने समझौते के बारे में अधिक जानकारी मांगी है। कई सांसद इससे असंतुष्ट हैं कि कांग्रेस को भरोसे में नहीं लिया गया। ट्रंप प्रशासन ने फिलहाल भले ही एक कूटनीतिक गुंजाइश बनाई हो, लेकिन इसे स्थायी समझौते में बदलने के लिए उसे गहरे राजनीतिक विभाजन से जूझना पड़ेगा।

ट्रंप के लिए यह समझौता राजनीतिक दृष्टि से लाभकारी कहा जा सकता है। मध्यावधि चुनावों से पहले जारी युद्ध, तेल की ऊंची कीमतें और अनिश्चित परिणाम उनकी राजनीतिक संभावनाओं को नुकसान पहुंचा सकते थे। इसके विपरीत यह समझौता उन्हें एक निर्णायक और शांति स्थापित करने वाले नेता के रूप में प्रस्तुत करने का अवसर देता है। उनके समर्थक इसे सैन्य दबाव के परिणाम के रूप में देख सकते हैं, जबकि आलोचक यह सवाल उठाते रहेंगे कि क्या यह युद्ध कभी आवश्यक था भी या नहीं।

ईरान का दावा है कि महीनों के संघर्ष के बावजूद उसकी सरकार कायम रही, उसके क्षेत्रीय सहयोगी सुरक्षित रहे और पश्चिम एशिया में उसका प्रभाव कम नहीं हुआ। ईरानी नेतृत्व का मानना है कि अमेरिका और इजरायल अपने व्यापक राजनीतिक उद्देश्यों को हासिल करने में असफल रहे। कोई भी पक्ष कमजोर दिखाई नहीं देना चाहता और यही कारण है कि आगे की वार्ताएं और कठिन हो सकती हैं।

इजरायल की स्थिति इस समझौते को और अधिक जटिल बनाती है, क्योंकि उसके प्रधानमंत्री नेतन्याहू इस समझौते को लेकर उत्साहित नहीं दिखते। वे पहले ही संकेत दे चुके हैं कि इजरायली सैनिक दक्षिणी लेबनान में बने रहेंगे और यदि उन्हें किसी खतरे की आशंका होगी तो वे सैन्य कार्रवाई से हिचकेंगे नहीं।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय यही चाहेगा कि यह समझौता टिकाऊ बने, क्योंकि संघर्ष छिड़ने से व्यापक आर्थिक समीकरण फिर से गड़बड़ाएंगे। यह समझौता कोई गंतव्य न होकर उसकी दिशा में प्रस्थान ही है। यह कठिन प्रश्नों का समाधान नहीं करता, बल्कि उन्हें भविष्य के लिए टाल देता है। ईरान का परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों का भविष्य, क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था और इजरायल की चिंताएं अभी भी अनसुलझी हैं।

यह भी सच है कि कूटनीति अक्सर ऐसे ही नाजुक समझौतों से शुरू होती है। शांति की प्रक्रिया कभी एक झटके में पूरी न होकर छोटे-छोटे समझौतों, असफलताओं और नए प्रयासों के माध्यम से आगे बढ़ती है। यह समझौता शायद एक अस्थायी विराम हो, लेकिन यह भी संभव है कि यही पश्चिम एशिया की राजनीति को नई दिशा देने वाली एक स्थायी व्यवस्था की नींव बने। यह इस पर निर्भर करेगा कि वाशिंगटन, तेहरान और उनके क्षेत्रीय साझेदार कितनी दूरदर्शिता, संयम और राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिचय देते हैं। इस लिहाज से आने वाले दिनों में होने वाली वार्ताएं बहुत निर्णायक साबित होंगी।

(लेखक मनोहर पर्रिकर रक्षा अध्ययन एवं विश्लेषण संस्थान में फेलो हैं)