संपादकीय: जी-7 की बैठक
फ्रांस में जी-7 की बैठक में अमेरिकी दबदबे और आंतरिक मतभेदों के कारण संगठन की प्रभावशीलता पर सवाल उठाए गए हैं, जिससे वैश्विक समस्याओं का समाधान मुश्किल हो रहा है।
HighLights
जी-7 बैठक में अमेरिकी दबदबे से प्रभावशीलता पर सवाल।
ट्रंप के मनमाने व्यवहार से सदस्य देशों में बढ़े मतभेद।
भारत विकासशील देशों की आकांक्षाओं को करेगा रेखांकित।
फ्रांस में जी-7 की बैठक के चलते विश्व का ध्यान उन्नत अर्थव्यवस्थाओं और लोकतंत्र वाले देशों के इस संगठन की ओर जाना स्वाभाविक है। वैसे तो इस संगठन के सदस्य देशों में अमेरिका के अतिरिक्त ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, कनाडा और जापान भी शामिल हैं, लेकिन कुल मिलाकर इस पर अमेरिका का ही दबदबा रहता है।
प्रति वर्ष जब भी जी-7 देशों की बैठक होती है तो यह संगठन चर्चा में तो आता है, लेकिन अभी तक का अनुभव यही बताता है कि वह कोई विशेष प्रभाव नहीं छोड़ पाता। इस बार भी ऐसा ही हो तो हैरत नहीं, क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप सदस्य देशों को सहयोगी कम, अपना अनुयायी अधिक समझते हैं। राष्ट्रपति के रूप में अपने इस दूसरे कार्यकाल में उन्होंने करीब-करीब सभी सदस्य देशों के साथ टैरिफ और अन्य मामलों में मनमाना व्यवहार किया है।
कुछ सदस्य देशों के साथ तो उन्होंने बहुत ही बुरा बर्ताव किया है। उनके अपनी ही चलाने वाले रवैये के कारण अमेरिका के अन्य देशों के साथ मतभेद बढ़े हैं। इसे देखते हुए इसके आसार कम ही हैं कि यह संगठन टैरिफ, जलवायु परिवर्तन, एआइ के उचित उपयोग आदि के मामले में किसी सहमति पर पहुंच कर ऐसे कोई निर्णय ले पाएगा, जो विश्व की समस्याओं के समाधान में सहायक बनेंगे।
यह एक तथ्य है कि आपसी मतभेदों के कारण ही जी-7 संगठन न तो रूस-यूक्रेन युद्ध को थाम पाया और न ही पश्चिम एशिया संकट समेत अन्य वैश्विक समस्याओं को समय रहते सुलझा सका। इस बार बैठक का एक प्रमुख एजेंडा व्यापारिक असंतुलन दूर करना भी है, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि इस असंतुलन का एक बड़ा कारण तो खुद अमेरिका है।
ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका ने सदस्य देशों के साथ ही अन्य कई देशों पर जैसी धौंस जमाने की कोशिश की है, उसकी मिसाल मिलना कठिन है। चूंकि पिछले वर्षों की तरह इस बार भी भारतीय प्रधानमंत्री को मेहमान के रूप में इस संगठन में आमंत्रित किया गया है, इसलिए भारत के साथ विकासशील एवं निर्धन देशों का ध्यान भी इस बैठक की ओर जाएगा, क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी ने इन देशों की आकांक्षाओं को रेखांकित करने की बात कही है।
वे पहले भी ऐसा करते रहे हैं। जी-7 बैठक के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री की अमेरिकी राष्ट्रपति से अलग से मुलाकात होने के चलते यह भी विशेष रूप से देखना होगा कि दोनों देशों के संबंधों में व्यापक सुधार का रास्ता साफ होता है या नहीं? यदि अमेरिका इस संगठन को प्रभावी बनाना चाहता है तो उसे सदस्य देशों के साथ समानता का व्यवहार करना होगा।
निःसंदेह ऐसी ही अपेक्षा भारत और अन्य मेहमान देशों की भी रहेगी। अमेरिकी राष्ट्रपति को यह आभास होना चाहिए कि अब अमेरिका पहले जितना सक्षम नहीं रहा।












