जागरण संपादकीय: विपक्षी मोर्चे में खींचतान
आखिर केवल समस्याएं गिनाने से क्या होगा? यह गठबंधन कुल मिलाकर विरोध के लिए विरोध की राजनीति पर केंद्रित है। इसकी सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह कोई वैकल्पिक एजेंडा नहीं प्रस्तुत कर पा रहा है।
HighLights
आईएनडीआईए बैठक से पहले आंतरिक खींचतान और असंतोष।
कांग्रेस और अन्य सहयोगी दलों के बीच बढ़ती दूरी स्पष्ट।
गठबंधन का एकमात्र एजेंडा भाजपा का विरोध करना।
विपक्षी दलों के मोर्चे आईएनडीआईए की बैठक एक ऐसे समय होने जा रही है, जब कांग्रेस और उसके अन्य घटकों के बीच खींचतान दिख रही है। यह कहना कठिन है कि इस बैठक में कांग्रेस और अन्य सहयोगी दलों के बीच बढ़ती दूरी खत्म हो पाएगी या नहीं, लेकिन यह स्पष्ट है कि वर्तमान में यह गठबंधन पहले जितना एकजुट और मजबूत नहीं दिख रहा है। द्रमुक इस गठबंधन से बाहर होने की घोषणा कर चुकी है और आम आदमी पार्टी के बारे में यह कहना कठिन है कि उसके नेता इस बैठक में शामिल होंगे या नहीं?
वाम दलों के नेता इस बैठक में शामिल तो हो रहे हैं, लेकिन इसके पहले माकपा ने कांग्रेस के उस रवैये पर आपत्ति जता दी है, जो उसने केरल विधानसभा चुनाव के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री पी. विजयन के प्रति दिखाया था। माकपा की मानें तो कांग्रेस का रवैया विपक्षी गठबंधन की एकजुटता को कमजोर करने वाला है।
कांग्रेस से नाखुश दलों में झारखंड मुक्ति मोर्चा भी है और यह भी किसी से छिपा नहीं कि महाराष्ट्र में कांग्रेस और उद्धव ठाकरे की शिवसेना के बीच खटपट जारी रहती है। नि:संदेह तृणमूल कांग्रेस के नेता इस बैठक में शामिल होने को लेकर उत्साहित हैं, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि कुछ समय पहले तक ममता बनर्जी इस गठबंधन को कोई मूल्य-महत्व देने के लिए तैयार नहीं थीं।
विपक्षी गठबंधन की बैठक का एजेंडा जिस तरह एकजुटता कायम रखने और मिलकर भाजपा का सामना करने का बताया जा रहा है, उससे यही स्पष्ट होता है कि अभी तक यह गठबंधन अपनी दशा और दिशा नहीं तय कर पाया है। यह भी स्पष्ट ही है कि अभी तक इसके पास न तो कोई न्यूनतम साझा कार्यक्रम है और न ही कोई ठोस संयुक्त रणनीति।
इस गठबंधन का एकसूत्रीय एजेंडा भाजपा का विरोध करना और मोदी सरकार को हटाना है, लेकिन वह कोई नैरेटिव नहीं स्थापित कर पा रहा है। निश्चित रूप से आईएनडीआईए की बैठक में उन समस्याओं को लेकर सरकार को घेरा जाएगा, जो इस समय देश के समक्ष उपस्थित हैं। इसमें कोई हर्ज नहीं कि विपक्षी दल उन समस्याओं को रेखांकित करें जो इस समय सतह पर हैं और आम लोगों की चिंता का कारण बनी हुई हैं, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या इस गठबंधन के पास इन समस्याओं के समाधान की कोई रूपरेखा है।
आखिर केवल समस्याएं गिनाने से क्या होगा? यह गठबंधन कुल मिलाकर विरोध के लिए विरोध की राजनीति पर केंद्रित है। इसकी सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह कोई वैकल्पिक एजेंडा नहीं प्रस्तुत कर पा रहा है। इसी तरह एक अन्य समस्या तब उभर आती है जब विधानसभाओं के चुनाव होते हैं। यह निराशाजनक है कि अभी तक यह गठबंधन आवश्यक आपसी समन्वय भी विकसित नहीं कर सका है।












