प्रधानमंत्री ने अपनी आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्यों के साथ बैठक कर मौजूदा आर्थिक समस्याओं से निपटने पर जो मंथन किया, वह समय की मांग था। विश्व स्तर पर जारी उथल-पुथल और विशेष रूप से पश्चिम एशिया संकट ने अन्य देशों के साथ-साथ भारत की अर्थव्यवस्था के सामने भी चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।

सबसे बड़ी चुनौती खाड़ी के देशों से तेल एवं गैस की आपूर्ति में बाधा के कारण खड़ी हुई है। अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम के बावजूद हालात सामान्य होने के कोई आसार नहीं दिखते। हालात तब तक सामान्य होने वाले नहीं हैं, जब तक होर्मुज समुद्री मार्ग बाधित रहता है। अमेरिका तमाम प्रयत्नों के बावजूद ईरान पर ऐसा दबाव नहीं डाल पा रहा है, जिससे यह जलमार्ग जहाजों के सुरक्षित आवागमन के लिए खुल सके।

चूंकि युद्धविराम के बाद भी अमेरिका और ईरान एक-दूसरे के ठिकानों को निशाना बनाते रहते हैं, इसलिए तेल एवं गैस के दाम कम होने का नाम नहीं ले रहे हैं। यह ठीक है कि पश्चिम एशिया संकट ने अर्थव्यवस्था के समक्ष जो कठिनाइयां पैदा की हैं, उन्हें दूर करने के लिए अनेक उपाय किए गए हैं, लेकिन अभी उन्हें पर्याप्त नहीं कहा जा सकता। ऊर्जा संसाधनों की बचत और मितव्ययिता बरतने के सुझावों पर कितना भी अमल हो, वह एक हद तक ही प्रभावी हो सकता है।

इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होने से भारत का आयात बिल बढ़ रहा है और उधर अमेरिका के साथ होने वाले व्यापार समझौते के संपन्न होने की कोई सूरत नहीं दिख रही है। अच्छी बात यह है कि देश के विशालकाय मध्य वर्ग की क्रय क्षमता के चलते वैसा कोई गंभीर आर्थिक संकट खड़ा होता नहीं दिख रहा है, जैसा कुछ विपक्षी नेता बता रहे हैं, लेकिन यदि पश्चिम एशिया संकट लंबा खिंचा तो समस्याएं और अधिक बढ़ सकती हैं। इससे कारोबार जगत के साथ आम लोग भी प्रभावित होंगे।

इन स्थितियों में यह आवश्यक है कि सभी वांछित आर्थिक सुधारों की दिशा में तेजी के साथ आगे बढ़ा जाए। यह समझा जाए कि कारोबारी सुगमता को वास्तव में और बेहतर बनाने की आवश्यकता है, क्योंकि हमारे प्रमुख उद्योगपति देश में उतना निवेश नहीं कर रहे हैं, जितना उन्हें करना चाहिए। इसी के साथ सरकार को यह भी देखना होगा कि विदेशी निवेशक पर्याप्त मात्रा में पूंजी का निवेश क्यों नहीं कर रहे हैं?

बीते दिनों उन्हें आकर्षित करने के लिए कुछ कदम अवश्य उठाए गए हैं, लेकिन यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि उनके सकारात्मक परिणाम भी सामने आएं। भारत को इस पर विशेष ध्यान देना होगा कि आवश्यक वस्तुओं के आयात पर निर्भरता कम हो और निर्यात बढ़े। निःसंदेह यह तभी संभव होगा, जब सरकार और उद्योग जगत चुनौतियों का सामना मिलकर करेंगे।