तृणमूल कांग्रेस के बाद शिवसेना-उद्धव गुट के नौ में से छह लोकसभा सदस्यों की ओर से शिवसेना-शिंदे में शामिल होने की तैयारी केवल यही नहीं बताती कि वे सत्तापक्ष के साथ जाने को आतुर हैं, बल्कि यह भी रेखांकित करती है कि भारतीय राजनीति में मौकापरस्ती बढ़ती जा रही है। शिवसेना में यह दूसरी टूट है।

इसके पहले भी उसके विधायक एवं सांसद टूट चुके हैं और पार्टी अपना चुनाव चिह्न भी गंवा चुकी है। उसके लिए इस एक और झटके से उबर पाना कठिन होगा। अब उसके सामने अपना अस्तित्व बचाने का संकट है। अपने इस संकट और बिखराव के लिए वही अधिक जिम्मेदार है। यदि उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बनने के लालच में धुर विरोधी कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से हाथ नहीं मिलाते तो शायद आज उनके दल की स्थिति कुछ और होती।

उद्धव ठाकरे ने सत्ता के लिए अपनी पुरानी साझीदार और वैचारिक रूप से करीबी भाजपा से केवल नाता ही नहीं तोड़ा, बल्कि इसी के साथ अपनी विचारधारा को भी ताख पर रख दिया। शिवसेना उन कुछ क्षेत्रीय दलों में से थी, जिसकी अपनी एक विचारधारा थी। वह मूलतः अपनी विचारधारा से भटकने के कारण ही बिखरी।

तृणमूल कांग्रेस की तो कोई विचारधारा ही नहीं थी। केवल सत्ता पाना और उसमें येन-केन-प्रकारेण बने रहना ही उसकी राजनीति का केंद्र बिंदु था। यह केंद्र बिंदु हटते यानी सत्ता जाते ही वह बिखर गई। क्षेत्रीय दलों की समस्या केवल यही नहीं कि उनमें से कुछ की ही विचारधारा है। एक समस्या यह भी है कि वे अलोकतांत्रिक तरीके और किसी निजी कंपनी की तरह चलते हैं। ऐसे दलों में पार्टी प्रमुख या परिवार विशेष ही सब कुछ होता है।

उसके आगे किसी की नहीं चलती। लोकतंत्र में अधिनायकवादी तरीके से चलने वाले दलों के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए, लेकिन अपने देश की राजनीति का दुर्भाग्य यह है कि अनेक दल इसी तरह चलते हैं। प्रायः यही उनके बिखराव का कारण बनता है। क्षेत्रीय दलों में बिखराव का संकट इसलिए और बढ़ गया है, क्योंकि उनके जनप्रतिनिधियों के लिए राजनीति का मतलब अवसरवाद हो गया है। वे कभी भी दल बदल लेते हैं। ज्यादातर मौकों पर पद या पैसे के लालच अथवा अन्य किसी राजनीतिक लाभ के लिए दलबदल किया जाता है।

किसी के दल बदलने में हर्ज नहीं, लेकिन ऐसा करने के पहले यह आवश्यक है कि वे विधायक या सांसद पद से त्यागपत्र दें। ऐसा न करना जनादेश का निरादर है। लगभग सभी राजनीतिक दल समय-समय पर दलबदल को बढ़ावा देते रहे हैं। दलबदल रोधी कानून के बावजूद विधायकों-सांसदों के टूट का सिलसिला कायम है। हालांकि इस कानून को कठोर बनाया जा चुका है, लेकिन वह भी प्रभावी सिद्ध नहीं हो रहा है, क्योंकि अब दलबदल को हेय दृष्टि से नहीं देखा जाता।