जागरण संपादकीय: अविश्वास का प्रस्ताव
लोकसभा में सत्तापक्ष-विपक्ष का गतिरोध टूटा, पर कांग्रेस ने स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाकर रिश्ते और कड़वे कर दिए। यह प्रस्ताव राहुल गांधी को सदन में बोलने न देने पर आधारित है, जो चीन मुद्दे पर जनरल नरवणे की अप्रकाशित किताब का हवाला दे रहे थे। संपादकीय के अनुसार, यह प्रस्ताव पिछली बार की तरह असफल रहेगा, क्योंकि राहुल पुराने मुद्दों को बेवजह तूल दे रहे हैं और उनका एजेंडा राजनीतिक कलह बढ़ाना है।
HighLights
विपक्ष ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया।
राहुल गांधी को सदन में बोलने न देने पर आधारित है यह प्रस्ताव।
जनरल नरवणे की अप्रकाशित किताब पर चीन मुद्दा उठाना विवादित।
लोकसभा में सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच का गतिरोध तो टूट गया और बजट पर चर्चा भी शुरू हो गई, लेकिन कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी दलों ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ जिस तरह अविश्वास प्रस्ताव लाने की पहल की, उससे यह स्पष्ट है कि दोनों पक्षों के रिश्ते और अधिक कटु होने वाले हैं। इसका असर संसद की कार्यवाही पर भी पड़ सकता है। फिलहाल कहना कठिन है कि इस अविश्वास प्रस्ताव का क्या हश्र होगा, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि कुछ समय पहले विपक्ष ने राज्यसभा के तत्कालीन सभापति जगदीप धनखड़ के खिलाफ भी अविश्वास प्रस्ताव लाने की पहल की थी। आसार यही हैं कि जैसे वह अविश्वास प्रस्ताव कहीं नहीं पहुंच सका था, उसी तरह इस अविश्वास प्रस्ताव का भी कोई भविष्य नहीं।
लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव इसलिए लाया जा रहा है कि उन्होंने राहुल गांधी को सदन में बोलने का अवसर नहीं दिया। साफ है कि राहुल गांधी और उनके सहयोगी यह सिद्ध करना चाह रहे हैं कि नेता प्रतिपक्ष चीन के मामले में पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल एमएम नरवणे की पुस्तक के एक पत्रिका में छपे कथित अंशों के माध्यम से जो कुछ कहना चाह रहे हैं, वह इतना विस्फोटक और सनसनीखेज है कि मोदी सरकार संकट में पड़ जाएगी। यह एक तरह का दिवास्वप्न ही है, क्योंकि सब जानते हैं कि पिछले छह वर्षों में राहुल गांधी के ऐसे बयानों का कहीं कई असर नहीं हुआ। सच तो यह है कि उनके वे बयान भी असरहीन रहे, जिन्हें उन्होंने एटम बम वगैरह की संज्ञा दी थी।
चीन के मामले में राहुल गांधी एक तरह से गड़े मुर्दे उखाड़ने का काम कर रहे हैं। वे 2020 में गलवन में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच की झड़प के बाद की घटना पर जनरल नरवणे की जिस पुस्तक के बहाने यह बताना चाहते हैं कि प्रधानमंत्री चीनी सेना की आक्रामकता से डर गए थे, वह अब तक अप्रकाशित है। इसे प्रकाशक ने भी स्पष्ट कर दिया है और खुद जनरल नरवणे ने भी।
आखिर ऐसे में राहुल गांधी उनकी कौन सी पुस्तक दिखाते फिर रहे हैं? वे अपने पक्ष को कमजोर ही नहीं कर रहे हैं, बल्कि यह भी रेखांकित कर रहे हैं कि एक पुराने मामले को बेवजह तूल दे रहे हैं। राहुल कुछ भी कहने की कोशिश करें, यह किसी से छिपा नहीं कि खुद जनरल नरवणे कई बार यह कह चुके हैं कि भारतीय सेना ने चीनी सेना को सबक सिखाया था। यह भी सब जानते हैं कि भारतीय सेना की मुंहतोड़ जवाबी कार्रवाई के कारण ही चीन वार्ता की मेज पर आया था और सीमा पर कई क्षेत्रों में यथास्थिति कायम हुई। यह साफ है कि राहुल गांधी को इससे कोई मतलब नहीं। उनका एक सूत्रीय एजेंडा राजनीतिक कलह बढ़ाना है। लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव इसी का परिचायक है।
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