जागरण संपादकीय: भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर विपक्ष की अनावश्यक आपत्ति
अमेरिकी दस्तावेज में बदलाव के बाद भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते को लेकर विपक्ष, खासकर कांग्रेस, अनावश्यक आपत्ति उठा रहा है। अमेरिका ने दालों को सूची से हटाया और भारत के $500 अरब सामान खरीदने के 'इरादे' को स्पष्ट किया। राहुल गांधी ने सरकार पर 'भारत माता बेचने' का आरोप लगाया, जबकि लेख इसे अतिरंजित बताता है। मार्च में समझौते पर हस्ताक्षर होने का इंतजार करना चाहिए, क्योंकि द्विपक्षीय समझौते आपसी हितों पर आधारित होते हैं।
HighLights
अमेरिकी दस्तावेज में दालों को सूची से हटाया गया।
भारत का $500 अरब सामान खरीदने का 'इरादा' स्पष्ट।
राहुल गांधी ने सरकार पर 'भारत माता बेचने' का आरोप लगाया।
अमेरिका ने भारत के साथ होने वाले अंतरिम व्यापार समझौते को लेकर जारी अपने दस्तावेज में जिस तरह दो बड़े बदलाव किए, उससे भारत के इस पक्ष को ही मजबूती मिली कि इस समझौते के मामले में साझा बयान की बातों को ही महत्व दिया जाए। अमेरिकी दस्तावेज में एक बदलाव यह है कि अमेरिका ने खाद्य एवं कृषि उत्पादों की सूची से दालों को हटा दिया। इसके अलावा यह भी स्पष्ट किया कि भारत अमेरिका से 500 अरब डालर का सामान खरीदने का इरादा रखता है।
पहले इस दस्तावेज में कहा गया था कि भारत अमेरिका से 500 अरब डालर का सामान खरीदने का वादा कर रहा है। स्पष्ट है कि वादे और इरादे में अंतर होता है। इसके बाद भी इसमें संदेह है कि अमेरिका के साथ व्यापार समझौते पर बनी सहमति का अकारण और अतिरंजित विरोध करने वाले शांत बैठेंगे। कुछ किसान संगठन और विपक्षी राजनीतिक दलों ने विरोध का झंडा उठा भी लिया है।
इसमें हमेशा की तरह कांग्रेस सबसे आगे है। गत दिवस लोकसभा में राहुल गांधी ने व्यापार समझौते को लेकर सरकार पर हमला बोलते हुए यह कहा कि उसने भारत माता को बेच दिया और अमेरिका के सामने पूरी तौर पर समर्पण कर दिया। उन्होंने किसान हितों से लेकर देश की ऊर्जा सुरक्षा से समझौता करने के भी आरोप लगाए, जबकि किसान हित सुरक्षित हैं और अभी यह स्पष्ट नहीं कि भारत रूस से तेल खरीद पूरी तरह बंद करने जा रहा है।
अमेरिकी दस्तावेज में बदलाव के बाद यह और आवश्यक हो जाता है कि अगले माह यानी मार्च में होने वाले अंतरिम व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर होने की प्रतीक्षा की जाए, क्योंकि उसमें ही तस्वीर पूरी तरह साफ हो सकेगी, लेकिन यह स्पष्ट ही है कि राहुल गांधी जैसे विरोध के लिए विरोध करने वाले नेता चैन से बैठने वाले नहीं। वे यही प्रचारित करते रहेंगे कि भारत ने अमेरिका के सामने हथियार डाल दिए।
गत दिवस उन्होंने यही किया। वे सरकार पर आरोप लगाकर सदन से चलते बने। उन्होंने अपने आरोपों के संदर्भ में सरकार का बयान सुनने की आवश्यकता नहीं समझी। इसका मतलब है कि उनका यही सोचना है कि वे किसी भी मामले में जो कुछ कहें, उसे ही अंतिम सत्य मान लिया जाए।
निःसंदेह अमेरिका से होने वाले व्यापार समझौते को लेकर जारी साझा बयान के कुछ बिंदु ऐसे हैं, जिन पर स्पष्टीकरण मांगा जा सकता है और उन पर बहस भी हो सकती है, लेकिन यदि कोई इस नतीजे पर पहुंच रहा है कि किसी भी देश के साथ होने वाला व्यापार समझौता पूरी तौर पर भारत के पक्ष में झुका हो तो यह संभव नहीं। द्विपक्षीय समझौते आपसी लेन-देन पर ही आधारित होते हैं। संबंधित देशों को एक-दूसरे के हितों की चिंता करते हुए अपने हितों की रक्षा करनी होती है। भारत ने यही किया है।
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