विचार: राजनीतिक कटुता की बंधक संसद, कार्यवाही को बाधित करना कभी स्वीकार्य नहीं
तेजी से बदलती विश्व व्यवस्था में तमाम चुनौतियों से देश को पार ले जाने की जिम्मेदारी सामूहिक है। इसलिए प्रधानमंत्री और नेता प्रतिपक्ष को सीधे संवाद और संपर्क से महत्वपूर्ण मुद्दों पर सहमति और समन्वय की राह निकालनी चाहिए, पर उसके लिए परस्पर सम्मान भाव पहली अनिवार्य शर्त है।
HighLights
संसद के बजट सत्र में जारी हंगामा चिंताजनक।
राजनीतिक कटुता के कारण कार्यवाही बाधित हो रही।
सत्तापक्ष-विपक्ष को समन्वय से काम करना चाहिए।
राज कुमार सिंह। नेताओं का तो पता नहीं, मगर संसद के बजट सत्र में जारी हंगामा विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र को शर्मसार करने वाला है। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव को लेकर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी नहीं बोल पाए तो विपक्ष के जवाबी हंगामे के चलते प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी चर्चा का जवाब नहीं दे सके। हंगामे के दौरान आसन पर कागज फाड़ कर फेंकने के आरोप में विपक्षी दलों के आठ सांसदों को शेष सत्र के लिए निलंबित कर दिया गया, जो संसद परिसर में धरने पर बैठ गए। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने आंकड़े दिए हैं कि 28 जनवरी को राष्ट्रपति के अभिभाषण से शुरू संसद के बजट सत्र में अभी तक हंगामे के चलते 19 घंटे, 13 मिनट का समय बर्बाद हो चुका है।
जाहिर है कि इस सबके लिए कोई अपनी जिम्मेदारी नहीं स्वीकारेगा। किसी एक पक्ष को जिम्मेदार ठहराने से बात बनेगी भी नहीं। दरअसल इसके मूल में सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच की राजनीतिक कटुता ही है। बढ़ती कटुता के लिए दोनों पक्षों के पास अपने-अपने कारण हो सकते हैं, लेकिन संसद ही उसकी बंधक बनती नजर आए तो कुछ ठोस कदम उठाने की जरूरत है। लोकसभा में धन्यवाद प्रस्ताव प्रधानमंत्री के जवाब के बिना ही ध्वनिमत से पारित होने की नौबत सामान्य घटना नहीं है। बेशक 2004 में भी ऐसा ही हुआ था, मगर गलतियां दोहराने के लिए नहीं, बल्कि सबक सीखने के लिए भी होती हैं। दोनों ही परिस्थितियां गलत हैं, जिनसे बचने का रास्ता निकालने की जिम्मेदारी लोकसभा अध्यक्ष की भी बनती है। आखिर वे सदन के संरक्षक हैं।
इस टकराव की शुरुआत नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की अप्रकाशित पुस्तक का संदर्भ प्रस्तुत करने से हुई। इसके जरिये राहुल गांधी ने यही दावा किया कि गलवन में चीनी सैनिकों की घुसपैठ के समय सेनाध्यक्ष को यह कहकर कि ‘जो उचित समझो, वह करो।’ सरकार के शीर्ष नेतृत्व ने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया। राहुल गांधी कांग्रेस के नेता ही नहीं, बल्कि नेता प्रतिपक्ष के संवैधानिक पद पर भी आसीन हैं। एक बार नाकाम कोशिश से अपनी मंशा का संदेश देने के बाद वे अभिभाषण के अन्य बिंदुओं पर अपना भाषण केंद्रित करने की समझदारी दिखाते हुए जनरल नरवणे की पुस्तक से संबंधित विवाद से जुड़ी बात को सदन के बाहर भी कर सकते थे।
यह सवाल भी अनुत्तरित है कि क्या ऐसा मध्यमार्ग निकालने की पहल लोकसभा अध्यक्ष या सत्तापक्ष की ओर से की गई? अतीत का अनुभव बताता है कि संवेदनशील और तल्ख मुद्दों पर दोनों पक्षों द्वारा लचीला रुख अपना कर ही सदन सुचारु रूप से चलाया जा सकता है। लोकसभा में राहुल गांधी को पुस्तक के अंश पढ़ने से रोकने के लिए तर्क दिया गया कि जो पुस्तक अभी तक प्रकाशित ही नहीं हुई, उसका हवाला संसदीय चर्चा में नहीं दिया जा सकता। अगले दिन धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा का प्रधानमंत्री द्वारा शाम पांच बजे के लिए तय जवाब बिना ही हंगामे के बीच सदन स्थगित हो गया। इस दौरान भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने कुछ पुस्तकों के हवाले से जिस तरह देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का चरित्र हनन करते हुए नेहरू परिवार पर प्रहार किए, उससे भी सत्तापक्ष और विपक्ष में तल्खी बढ़ी।
लोकसभा अध्यक्ष का यह रहस्योद्घाटन तो और भी गंभीर है कि उनकी सलाह पर ही प्रधानमंत्री सदन में नहीं आए, क्योंकि उनके साथ कुछ अनहोनी हो सकती थी। यह सवाल भी अनुत्तरित है कि राज्यसभा के सभापति को आगाह करने समेत अनहोनी की साजिश रचने वाले सांसदों के विरुद्ध लोकसभा अध्यक्ष ने इस मामले में क्या कार्रवाई की? ध्यान रहे कि प्रधानमंत्री ने राज्यसभा में धन्यवाद प्रस्ताव पर हुई चर्चा का अगले ही दिन जवाब दिया। ओम बिरला लोकसभा में जिस साजिश की बात कह रहे हैं, वह राज्यसभा में भी तो रची जा सकती थी? प्रधानमंत्री के जवाब का फोकस अभिभाषण के बिंदुओं तथा विपक्ष द्वारा उठाए गए मुद्दों से ज्यादा कांग्रेस और नेहरू परिवार की आलोचना पर केंद्रित रहना भी सवाल खड़े करता है।
राजनीति में हिसाब बराबर करने की प्रवृत्ति पुरानी है, लेकिन आरोप-प्रत्यारोप का खेल संसद के बाहर खेला जाना चाहिए, उसके लिए संसदीय कार्यवाही को बाधित करना कतई स्वीकार्य नहीं हो सकता। सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच बढ़ती कटुता के मूल में भी एक-दूसरे के प्रति सम्मान और सहकार के बजाय अपमानजनक उपेक्षा भाव की मानसिकता ही जिम्मेदार है। सत्ता पर स्वयं की स्वाभाविक दावेदारी की मानसिकता से ग्रस्त कांग्रेस इस सच से मुंह मोड़े रहना चाहती है कि नरेन्द्र मोदी लगातार तीसरी बार बहुमत प्राप्त सरकार के प्रधानमंत्री हैं, जबकि उसे नेता-प्रतिपक्ष का दर्जा प्राप्त करने के लिए भी दस साल इंतजार करना पड़ा। बेशक भाजपा भी ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ बनाने के अपने सोच से बाहर नहीं निकल पा रही, जबकि सच यह है कि 2014 में मात्र 44 लोकसभा सीटों पर सिमट गई कांग्रेस 2024 में 99 सीटों तक पहुंच चुकी है और तीन राज्यों में उसकी सरकार भी है।
राजग को शासक तो आइएनडीआइए को विपक्ष की भूमिका जनता ने ही सौंपी है, जिसे लोकतंत्र में जनार्दन कहा जाता है। बेशक ये भूमिकाएं स्थायी नहीं हैं। इसलिए जिस लोकतंत्र की दुहाई देते हुए दोनों पक्ष एक-दूसरे को कोसते हैं, उसका भी तकाजा है कि वे अपनी राजनीतिक कटुता में संसद को बंधक बनाने के बजाय परस्पर संवाद के जरिये देश हित में समन्वय से काम करने का सोच और कार्यशैली विकसित करें। दोनों ही पक्ष अगर राजनीतिक कटुता से मुक्त नहीं हो सकते, तो कम से कम उसे संसद के बाहर चुनावी मोर्चों पर ही जताने की परिपक्वता उन्हें दिखानी चाहिए। देश किसी भी दल या नेता से बड़ा है। तेजी से बदलती विश्व व्यवस्था में तमाम चुनौतियों से देश को पार ले जाने की जिम्मेदारी सामूहिक है। इसलिए प्रधानमंत्री और नेता प्रतिपक्ष को सीधे संवाद और संपर्क से महत्वपूर्ण मुद्दों पर सहमति और समन्वय की राह निकालनी चाहिए, पर उसके लिए परस्पर सम्मान भाव पहली अनिवार्य शर्त है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)
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