संजय कुमार। भारत में छात्रों के परीक्षा तनाव को कम करने और सीखने की प्रक्रिया को आनंदमय बनाने के लिए शुरू हुई ‘परीक्षा पे चर्चा’ पहल आज एक बड़ी जन-भागीदारी बन चुकी है। 2018 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और छात्रों के बीच हुई एक बातचीत से आरंभ हुई यह पहल अब करोड़ों छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों का मार्ग प्रशस्त कर रही है। 2025 में इस कार्यक्रम ने गिनीज वर्ल्ड रिकार्ड बनाया, जब एक ही महीने में 3.53 करोड़ से अधिक लोगों ने इसमें भागीदारी के लिए पंजीकरण किया। इसकी कुल पहुंच 21 करोड़ से अधिक दर्शकों तक रही, जिसमें विदेश स्थित भारतीय स्कूल भी शामिल थे। यह कार्यक्रम छात्रों को यह संदेश देता है कि परीक्षाएं जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं हैं, बल्कि सीखने की यात्रा का सिर्फ एक प्रमुख चरण हैं।

प्रधानमंत्री बार-बार इस पर जोर देते हैं कि परीक्षा केवल किसी विशेष क्षण में आपकी तैयारी को मापती हैं, जबकि सीखना लगातार और आनंददायक होता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में ‘आजीवन सीखने’ की अवधारणा पर गहराई से जोर दिया गया है। इस कार्यक्रम का एक प्रमुख उद्देश्य यह है कि अंकों का प्रतिशत बच्चे के संपूर्ण व्यक्तित्व को परिभाषित नहीं कर सकता। बच्चों को पाठ्यपुस्तकों से आगे बढ़कर अलग-अलग कौशल सीखने, नई गतिविधियों को आजमाने और चुनौतियों को डर के बजाय अवसर के रूप में देखने के लिए प्रेरित किया जाना है।

इस पहल में मानसिक स्वास्थ्य को विशेष महत्व दिया गया है। विशेषज्ञ छात्रों को तनाव कम करने के आसान तरीकों से परिचित करा रहे हैं, जिनमें 5-4-3-2-1 ग्राउंडिंग तकनीक, पर्याप्त नींद, पानी, व्यायाम और ध्यान जैसी स्वस्थ दिनचर्या शामिल हैं। 5-4-3-2-1 इंद्रिय-आधारित ध्यान अभ्यास है, जिसे पांचों इंद्रियों का उपयोग करके विचारों की दौड़ को शांत करने और अंततः उन्हें एक इंद्रिय तक सीमित करने के लिए डिजाइन किया गया है। ऐसा करने से आपका ध्यान चिंता पैदा करने वाले विचारों से हटकर वर्तमान क्षण पर केंद्रित होता है। इस तकनीक को 18वीं शताब्दी में बेट्टी एलिस एरिक्सन ने विकसित किया था। खेल जगत की कई हस्तियों ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया था कि खेल पढ़ाई में बाधा नहीं, बल्कि तनाव कम करने और ध्यान केंद्रित रखने में मदद करते हैं।

डिजिटल मीडिया के बढ़ते प्रचलन से आशंका व्यक्त की जा रही है कि उससे संज्ञान का ह्रास हो रहा है तथा मानसिक स्वास्थ्य कुप्रभावित हो रहा है। विश्व में 5.66 अरब डिजिटल मीडिया प्रोफाइल हैं। लोग प्रतिदिन डिजिटल मीडिया प्लेटफार्म पर सामग्री देखने में 15 अरब घंटे व्यतीत करते हैं, जो मानव जीवन के 17 लाख वर्षों से अधिक के बराबर है। अत्यधिक उपयोग से ‘डिजिटल डिमेंशिया’ में बढ़ोतरी हो रही है, जिसके कारण मस्तिष्क के उन क्षेत्रों में ग्रे मैटर की कमी हो जाती है, जो भावनात्मक विनियमन और आवेग नियंत्रण के लिए जिम्मेदार होते हैं। हम डिजिटल मीडिया को नकारने की स्थिति में नहीं हैं, इसलिए हमें इसके उपयोग के लिए स्वस्थ सीमाएं निर्धारित करनी चाहिए।

तकनीकी विशेषज्ञों ने छात्रों को सलाह दी है कि वे मोबाइल और डिजिटल साधनों को नियंत्रित तरीके से इस्तेमाल करें, ताकि तकनीक मददगार बने, बोझ नहीं। परीक्षा पे चर्चा कार्यक्रम अभिभावकों को भी महत्वपूर्ण संदेश देता है कि वे बच्चों का ध्यान केवल अंकों पर न लगाएं, बल्कि सीखने की प्रक्रिया पर केंद्रित रखें। बच्चों की तुलना दूसरों से न करें और अपने घर में ऐसा माहौल बनाएं जहां बच्चे खुलकर अपने डर, चुनौतियों और उम्मीदें साझा कर सकें। अभिभावकों का सहयोगी व्यवहार बच्चों की परीक्षा तैयारी में सबसे ज्यादा मदद करता है।

भारतीय शिक्षा दर्शन में ज्ञान की प्राप्ति को एक एकाकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक साझा पथ माना गया है। परीक्षा पे चर्चा कार्यक्रम शिक्षकों से अपील करता है कि वे रटने की संस्कृति से आगे बढ़कर आलोचनात्मक सोच और रचनात्मकता को बढ़ावा दें। यह कार्यक्रम राष्ट्रीय शिक्षा नीति के दृष्टिकोण के अनुरूप है, जिसमें छात्र-केंद्रित, तनाव-मुक्त और अनुभवात्मक शिक्षा पर जोर दिया गया है। मूल्यांकन प्रणाली में बदलाव की जरूरत है ताकि परीक्षाएं केवल याद्दाश्त नहीं, बल्कि समझ, अनुप्रयोग और विकास को माप सकें। डिजिटल प्लेटफार्म का उपयोग भी शिक्षा को अधिक सुलभ बनाने के लिए महत्वपूर्ण माना गया है।

स्कूलों और जिला स्तर के शिक्षा अधिकारियों को इस पहल के सिद्धांतों को वास्तविकता में बदलने की भी जिम्मेदारी दी गई है। इसके लिए स्कूलों में वेलनेस कमेटियां बनाना, तनाव प्रबंधन और अध्ययन कौशल पर कार्यशालाएं आयोजित करना, अभिभावक-शिक्षक संवाद बढ़ाना और छात्रों की उपलब्धियों को केवल अंकों के बजाय विविध क्षेत्रों में पहचानना जरूरी बताया गया है। इसे सुनिश्चित करने के लिए प्रधानमंत्री द्वारा अभिलेखित एक्जाम वारियर्स जैसे संसाधनों को हर छात्र तक पहुंचाना भी महत्वपूर्ण है। अंततः परीक्षा पे चर्चा मात्र एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इसका संदेश स्पष्ट है-परीक्षाएं बोझ नहीं, बल्कि सीखने, बढ़ने और खुद को समझने का अवसर हैं।

(लेखक स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग के सचिव हैं)