जागरण संपादकीय: विरोध करने की आदत, कांग्रेस को रास नहीं आया भारत-अमेरिका व्यापार समझौता
विडंबना यह है कि चुनाव दर चुनाव पराजय के बाद भी कांग्रेस यह समझने को तैयार नहीं कि विपक्ष का काम केवल खोखली आलोचना करना या फिर सनसनीखेज आरोप उछालना भर नहीं है। सरकार के हर फैसले का हर हाल में विरोध करने की कांग्रेस की आदत इतनी अधिक बढ़ गई है कि वह तर्कों और तथ्यों से भी परे रहने लगी है।
HighLights
कांग्रेस ने भारत-अमेरिका व्यापार समझौते का तुरंत विरोध किया।
राहुल गांधी ने किसानों की मेहनत बेचने का आरोप लगाया।
विपक्ष बिना तथ्यों के विरोध की आदत से ग्रस्त है।
जैसी आशंका थी, वैसा ही हुआ। कांग्रेस को अमेरिका के साथ होने वाला व्यापार समझौता भी रास नहीं आया। जैसे ही अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारतीय वस्तुओं पर टैरिफ 50 प्रतिशत से कम कर 18 प्रतिशत करने की घोषणा की, वैसे ही कांग्रेस ने आपत्तियां उठानी शुरू कर दीं। यह सही है कि व्यापार समझौते संबंधी ट्रंप की पोस्ट से कुछ सवाल उभर रहे थे, लेकिन इन सवालों का जवाब मांगने के स्थान पर कांग्रेस नेता इस नतीजे पर पहुंच गए कि प्रधानमंत्री मोदी मजबूरी के कारण इस समझौते पर सहमत हो गए।
राहुल गांधी ने तो यह कहने में भी संकोच नही किया कि प्रधानमंत्री ने किसानों की मेहनत को बेच दिया। कांग्रेस को इस समझौते को लेकर बनी सहमति पर आपत्ति उठाने की इतनी जल्दी थी कि उसने न तो यह देखा कि अमेरिकी राष्ट्रपति की पोस्ट पर भारतीय प्रधानमंत्री की पोस्ट क्या कह रही है और न ही वाणिज्य मंत्री के जवाब की प्रतीक्षा की।
जब वाणिज्य मंत्री ने यह स्पष्ट किया कि व्यापार समझौते में कृषि एवं डेरी क्षेत्र में भारत के हितों की सुरक्षा होगी और अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि ने भी इसकी पुष्टि कर दी तो कांग्रेस के पास कहने के लिए कुछ नहीं बचा, फिर भी उसने यह कहना शुरू कर दिया कि सरकार की ओर से इस बारे में संसद में जानकारी क्यों नहीं दी गई। हालांकि वाणिज्य मंत्री ने उन परिस्थितियों का उल्लेख किया, जिनके चलते वे संसद में चाहकर भी बयान नहीं दे सके, लेकिन कांग्रेस को संतोष नहीं।
कांग्रेस की ओर से अमेरिका के साथ होने जा रहे व्यापार समझौते पर सवाल उठाने का सिलसिला कायम है। उसके साथ-साथ कुछ अन्य विपक्षी दल भी ऐसा ही कर रहे हैं। सामान्य समझ यह कहती है कि किसी भी समझौते या सहमति पर सवाल उठाने से पहले उसका विवरण सामने आने की प्रतीक्षा की जाए, लेकिन आज की भारतीय राजनीति में इस समझ के लिए स्थान शून्य होता जा रहा है।
इसके स्थान पर विरोध के लिए विरोध का झंडा उठाने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। वैसे तो हर दल विपक्ष में रहते समय इसी प्रवृत्ति का परिचय देता है, लेकिन शायद कांग्रेस ने इसमें महारत हासिल कर ली है। इसी कारण उसकी आलोचना-निंदा चर्चा में तो आ जाती है, लेकिन वह न तो कोई प्रभाव छोड़ती है, न किसी सार्थक बहस को जन्म देती है और न ही सत्तापक्ष को अपने रुख-रवैये पर विचार को बाध्य करती है।
विडंबना यह है कि चुनाव दर चुनाव पराजय के बाद भी कांग्रेस यह समझने को तैयार नहीं कि विपक्ष का काम केवल खोखली आलोचना करना या फिर सनसनीखेज आरोप उछालना भर नहीं है। सरकार के हर फैसले का हर हाल में विरोध करने की कांग्रेस की आदत इतनी अधिक बढ़ गई है कि वह तर्कों और तथ्यों से भी परे रहने लगी है।













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