आनंद कुमार। पश्चिम और दक्षिण एशिया की सुरक्षा संरचना इस समय एक गहरे, लेकिन अपेक्षाकृत शांत परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। इसके मूल में विचारधारा से अधिक भू-राजनीतिक यथार्थ, आर्थिक गणनाएं और क्षेत्रीय शक्तियों की बढ़ती आत्मनिर्भरता है। अमेरिका की घटती सुरक्षा भूमिका, यूरोप की आंतरिक विभाजित स्थिति और वैश्विक शक्ति संतुलन में हो रहे बदलावों ने क्षेत्रीय देशों को अपनी सुरक्षा जिम्मेदारी स्वयं संभालने के लिए प्रेरित किया है।

लंबे समय तक पश्चिम एशिया की सुरक्षा व्यवस्था अमेरिकी नेतृत्व और गारंटी पर आधारित रही, किंतु ट्रंप के कार्यकाल के बाद से अमेरिका की नीति अधिक लेन-देन आधारित और अनिश्चित होती गई है। इससे पारंपरिक सहयोगी देशों को यह महसूस होने लगा कि संकट के समय अमेरिकी हस्तक्षेप स्वतःस्फूर्त नहीं रहेगा। यूरोप भी यूक्रेन युद्ध, ऊर्जा संकट के कारण इस क्षेत्र में प्रभावी सुरक्षा भूमिका निभाने की स्थिति में नहीं है। ऐसे में क्षेत्रीय शक्तियां वैकल्पिक सुरक्षा व्यवस्थाओं की तलाश में हैं। इस बदलते परिदृश्य में एक धारा पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के बीच उभरती निकटता के रूप में दिखाई देती है, जिसे ‘इस्लामिक नाटो’ भी कहा जा रहा है।

पाकिस्तान लंबे समय से सऊदी अरब के साथ रक्षा सहयोग रखता आया है, किंतु हालिया वर्षों में इस संबंध को व्यापक रणनीतिक ढांचे में बदलने का प्रयास तेज हुआ है। उसकी कोशिश है कि सऊदी संसाधनों और तुर्किये की रक्षा तकनीक के साथ मिलकर एक ऐसा सुरक्षा समूह बनाया जाए, जो अमेरिका पर निर्भरता कम कर सके। हालांकि इस प्रस्तावित धुरी की मजबूती उतनी नहीं है, जितनी उसकी राजनीतिक बयानबाजी से प्रतीत होती है। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में है और उसकी क्षेत्रीय विश्वसनीयता सीमित होती जा रही है। भारत के साथ उसका संघर्ष केवल भू-क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैचारिक भी है, जिसे उसकी सैन्य स्थापना अब भी ‘दो-राष्ट्र सिद्धांत’ के रूप में जीवित रखे हुए है।

इसी वैचारिक ढांचे के माध्यम से पाकिस्तान मुस्लिम दुनिया में समर्थन जुटाने की कोशिश करता रहा है, किंतु व्यावहारिक स्तर पर उसे बार-बार यह एहसास हुआ है कि मजहबी एकजुटता अपने आप में स्थायी रणनीतिक समर्थन की गारंटी नहीं देती। सऊदी अरब अपनी सुरक्षा आवश्यकताओं को विविधीकृत कर रहा है। उसके अमेरिका, चीन, भारत और क्षेत्रीय शक्तियों के साथ समानांतर संबंध हैं। भारत में उसके बड़े आर्थिक हित हैं। तुर्किये भी नाटो का सदस्य रहते हुए स्वतंत्र क्षेत्रीय भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है, जिससे इस प्रस्तावित धुरी में अंतर्विरोध पैदा होते हैं। सऊदी और तुर्किये दोनों ही मुस्लिम दुनिया में नेतृत्व की आकांक्षा रखते हैं, जो उन्हें सहयोगी से अधिक प्रतिस्पर्धी बनाती है। शायद इसीलिए उसने सऊदी और पाकिस्तान के सैन्य गठजोड़ में शामिल होने से इन्कार कर दिया।

सऊदी अरब और पाकिस्तान के समानांतर एक दूसरी रणनीतिक साझेदारी भारत, संयुक्त अरब अमीरात और इजरायल के बीच उभर रही है। यह साझेदारी साझा सुरक्षा चिंताओं, तकनीकी क्षमताओं पर आधारित है। रक्षा, खुफिया, समुद्री सुरक्षा, साइबर और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में यह सहयोग धीरे-धीरे गहराता जा रहा है। यूएई का दृष्टिकोण वैचारिक नेतृत्व के बजाय स्थिरता, प्रतिरोधक क्षमता और आर्थिक विकास पर केंद्रित है। यमन से लेकर अफ्रीका के हार्न क्षेत्र तक यूएई ने यह दिखाया है कि वह अपने सुरक्षा हितों को स्वतंत्र रूप से परिभाषित करने के लिए तैयार है, भले ही इसके लिए उसे पारंपरिक सहयोगियों से अलग रास्ता क्यों न अपनाना पड़े। इजरायल के साथ सामान्यीकरण ने यूएई को क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे में एक नई स्थिति प्रदान की है। भारत के लिए यह साझेदारी रणनीतिक और मनोवैज्ञानिक दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण है। जहां नई दिल्ली पाकिस्तान द्वारा इस्लामिक जगत में अपनी स्थिति मजबूत करने के प्रयासों को लेकर सतर्क है, वहीं वह इजरायल के साथ दशकों से चले आ रहे संबंधों को यूएई जैसे आर्थिक और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण देश के साथ जुड़ने का भी अवसर देख रही है।

हाल में भारत और यूएई के बीच रक्षा सहयोग पर आशय पत्र इसी दिशा में एक संकेत है। इस समीकरण का विस्तार पूर्वी भूमध्यसागर तक दिखाई देता है, जहां भारत, इजरायल, ग्रीस और साइप्रस के बीच बढ़ता संवाद तुर्किये की समुद्री आक्रामकता और व्यापार मार्गों की सुरक्षा से जुड़ा है। भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे जैसे प्रयास इस रणनीतिक नेटवर्क को आर्थिक आधार भी प्रदान करते हैं। एक ओर ऐसा ढांचा है जो वैचारिक अपील और प्रतीकात्मक शक्ति पर निर्भर करता है, दूसरी ओर एक ऐसा समीकरण है, जो आर्थिक मजबूती, तकनीकी सहयोग और साझा सुरक्षा पर आधारित है।

पश्चिम और दक्षिण एशिया की सुरक्षा व्यवस्था एक बहुध्रुवीय, आत्मनिर्भर और क्षेत्रीय रूप से संचालित ढांचे की ओर अग्रसर है। जो देश आर्थिक रूप से मजबूत, तकनीकी रूप से सक्षम और रणनीतिक रूप से सुसंगत हैं, वे इस नए परिदृश्य में बेहतर स्थिति में होंगे। जो केवल वैचारिक नारों और प्रतीकात्मक गठबंधनों पर निर्भर हैं, वे शायद ध्यान आकर्षित कर लें, लेकिन स्थायी शक्ति हासिल नहीं कर पाएंगे। फिर भी भारत को सतर्क रहना होगा।

(लेखक मनोहर पर्रिकर रक्षा अध्ययन एवं विश्लेषण संस्थान में एसोसिएट फेलो हैं)