शिवकांत शर्मा। सोने और चांदी के चढ़ते-उतरते भाव इन दिनों सुर्खियों में बने हुए हैं। विश्व स्वर्ण परिषद के अनुसार पिछले वर्ष दुनिया में 3,670 टन सोने का रिकार्ड उत्पादन हुआ था। वैश्विक उत्पादन के लगभग 40 प्रतिशत सोने की खपत अकेले चीन और भारत में होती है। हालांकि आसमान छूती कीमतों के कारण वहां भी सोने की मांग में उछाल की जगह लगभग 10-11 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। ऐसी स्थिति में सवाल उठता है कि ऐसी खपत में हालिया 10 प्रतिशत की गिरावट के बावजूद सोने के दाम में यह उछाल क्यों आया है? इसकी सबसे बड़ी वजह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हैं।

डॉलर और उसमें भुगतान के लिए जारी किए जाने वाले अमेरिकी ऋणपत्र या बांड अपनी साख की वजह से लगभग सौ वर्षों से अंतरराष्ट्रीय लेनदेन और राजकोषों के रिजर्व का प्रमुख माध्यम बने हुए थे। अमेरिका ने इन्हें हथियार बनाकर रूस को यूक्रेन से खदेड़ने की कोशिश की। रूस और उसके समर्थकों को डॉलर में होने वाले लेनदेन की अंतरराष्ट्रीय प्रणाली से बाहर कर दिया और यूरोपीय बैंकों में अमेरिकी बांड एवं डॉलर के रूप में जमा रूसी संपत्ति को फ्रीज कर दिया। ट्रंप ने सत्ता संभालते ही उनका और खुल्लम-खुल्ला प्रयोग करना और व्यापार को हथियार बनाना शुरू कर दिया। इसकी वजह से दुनिया को अमेरिका की नीयत पर संदेह होने लगा और उसकी मुद्रा और बांड की साख गिरने लगी। ट्रंप की लिबरेशन डे टैरिफ की घोषणा के समय भी अमेरिकी बांड और डॉलर की कीमतें गिरी थीं और सोने की कीमतों में उछाल आया था।

क्रेडिट संकट के समय सोने ने हमेशा लेनदेन के सर्वग्राह्य और भरोसेमंद माध्यम की भूमिका निभाई है। उसकी सीमित मात्रा और सर्वग्राह्यता के कारण उसके दाम भी संकटकाल को छोड़कर औसतन स्थिर ही रहे हैं। इसलिए इन दिनों विश्व भर के केंद्रीय बैंक और बहुराष्ट्रीय निवेश कंपनियों ने अपने-अपने कोषों में अमेरिकी बांड और डॉलरों को घटाकर उनकी जगह सोने को रखना शुरू किया है। पिछले पांच वर्षों में चीन ने अपना स्वर्ण भंडार बढ़ाने के लिए 351 टन, भारत ने 218 टन और जापान ने 81 टन सोना खरीदा है। भारत ने 51 अरब डॉलर के अमेरिकी बांड बेचकर उनके भंडार में 21 प्रतिशत की कटौती की है और उनकी जगह सोने का भंडार बढ़ाकर 880 टन कर लिया है जो उसके विदेशी मुद्रा भंडार का 16 प्रतिशत है। सोने की कीमतों में निरंतर उछाल का प्रमुख कारण यही है। कुछ बाजार विशेषज्ञों का तो कहना है कि सोने के दाम अगले दो-तीन साल में 30,000 रुपये प्रति ग्राम पर भी पहुंच सकते हैं।

अमेरिकी बांड की साख लंबे राजकोषीय अनुशासन, राजनीतिक स्थिरता के साथ मिलने वाली निश्चित आय से बनी है। वह कर्ज की राशि डॉलरों में अदा करने के साथ-साथ ब्याज भी चुकाता है, जिसकी दरें बांड की अवधि पर और तत्कालीन ब्याज दरों के रुझान पर निर्भर करती हैं। आम तौर पर अमेरिकी बांड पर मिलने वाले ब्याज की दरें महंगाई की दर से अधिक ही रहती हैं। इसलिए अपने कोष में अमेरिकी बांड रखने वाले देश या कंपनी को कोष की क्रयशक्ति की सुरक्षा के साथ-साथ ब्याज के रूप में कुछ लाभ भी मिलता रहता है। यह लाभ डॉलर या सोना रखने से नहीं मिल सकता। यही कारण है कि विदेशी मुद्रा भंडारों में अमेरिकी बांड का अनुपात नकद डॉलर और सोने से अधिक रहता है। जो देश अमेरिका के साथ व्यापार में साल-दर-साल लाभ कमाते रहे हैं उनके पास अमेरिकी डॉलर जमा हो जाते हैं। ये देश डॉलरों से अमेरिकी बांड खरीद लेते हैं। व्यापार के इस चक्र की वजह से अमेरिका का राष्ट्रीय कर्ज बढ़कर उसकी जीडीपी का 126 प्रतिशत यानी सवा गुना हो चुका है, जिसका 25 प्रतिशत दूसरे देशों के पास है जिनमें यूरोप, जापान, चीन और भारत प्रमुख हैं।

जब तक अमेरिका के डॉलर और बांड की साख बरकरार है, तब तक अमेरिका को कर्ज के बढ़ते पहाड़ की खास चिंता नहीं है, क्योंकि 2000 के डाट-काम और 2008 के वित्तीय संकट के बाद पहले से कम हो जाने के बावजूद दुनिया भर के विदेशी मुद्रा भंडारों का 57 प्रतिशत आज भी अमेरिकी बांड और डॉलरों में है। हालांकि भारत इस साल ब्रिक्स देशों के आपसी व्यापार के लिए केंद्रीय बैंकों की डिजिटल मुद्राओं के विनिमय लिंक की स्थापना का प्रस्ताव रखने वाला है, परंतु विश्व व्यापार में ब्रिक्स देशों की हिस्सेदारी 25 प्रतिशत ही है और उसका श्रेय भी चीन को अधिक जाता है।

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की हालिया रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका और यूरोप को छोड़कर आधे से अधिक व्यापार आज भी डॉलर में होता है। भले रूस, चीन, भारत और दक्षिण अमेरिकी देश आपसी व्यापार अपनी मुद्राओं में करने लगें, लेकिन छोटी मुद्राओं का आपसी विनिमय और तेल, गैस एवं सोने जैसी महत्वपूर्ण चीजों का मूल्य निर्धारण डॉलर में ही होता है। दूसरी मुद्राओं में लेनदेन के बाद भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों और देशों को बाजार के उतार-चढ़ाव से बचने के लिए स्वैप या हेजिंग डॉलर में ही करनी पड़ती है। इतना अवश्य है कि ट्रंप की व्यापार अस्त्रीकरण की नीतियों के कारण दुनिया अमेरिकी बांड और डॉलर पर बनी निर्भरता के प्रति सचेत हो उठी है।

उससे बचने के लिए व्यापार और राजकोषीय संग्रह में अमेरिकी बांड और डॉलर के साथ-साथ सोने-चांदी जैसी बहुमूल्य धातुओं और दूसरी मुद्राओं को शामिल करने के सक्रिय प्रयास हो रहे हैं। अमेरिका की मनमानी पर लगाम लगाने के लिए अमेरिकी बांड की सुनियोजित बिकवाली का विकल्प भी है। ऐसी बिकवाली से अमेरिका को मिलने वाले कर्ज की दरों में उछाल आ सकता है, जिससे मनमानी करने वाली सरकार को पीछे हटना पड़ सकता है।

ग्रीनलैंड विवाद में डेनमार्क की पेंशन कंपनी एकेडेमीकर ने अपने सारे अमेरिकी बांड बेचकर यही संकेत दिया, जिसने ट्रंप को नरम पड़ने के लिए विवश किया। यूरोप के जिस ब्रह्मास्त्र की बात हो रही थी उसमें यह विकल्प भी शामिल था, क्योंकि अमेरिकी कर्ज का करीब 20 प्रतिशत यूरोप और उसकी कंपनियों के पास ही है। कुल मिलाकर, सोना या कोई और मुद्रा डॉलर का स्थान लेने की स्थिति में तो नहीं दिखती, पर बचाव की ढाल जरूर बन सकती है।

(लेखक बीबीसी हिंदी के पूर्व संपादक हैं)