यह अच्छा नहीं हुआ कि विपक्ष के हंगामे के कारण प्रधानमंत्री लोकसभा में दूसरे दिन भी राष्ट्रपति के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर हुई चर्चा का जवाब नहीं दे सके और उसे उनके संबोधन के बिना ही पारित करना पड़ा। ऐसा कम ही होता है कि प्रधानमंत्री लोकसभा में अपनी बात न कह सकें और वह भी राष्ट्रपति के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर।

यह एक परंपरा रही है कि धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा का जवाब आमतौर पर प्रधानमंत्री ही देते हैं। इसकी अपेक्षा भी की जाती है और प्रतीक्षा भी। दशकों बाद यह परंपरा टूटी। जब भी संसद की स्थापित परंपराएं टूटती हैं, तब संसद की गरिमा गिरने के साथ राजनीतिक कटुता तो बढ़ती ही है, लोकतंत्र के प्रति जनता की आस्था भी डिगती है। लोकसभा स्पीकर ने जिस तरह यह कहा कि उन्होंने अनहोनी की आशंका के चलते प्रधानमंत्री को सदन में आने से रोका था, क्योंकि विपक्षी सांसदों के व्यवहार के चलते कोई अप्रत्याशित घटना घट सकती थी, वह बहुत ही गंभीर है।

क्या इससे बड़ी विडंबना और कोई हो सकती है कि विपक्ष के आक्रामक रवैये के कारण प्रधानमंत्री लोकसभा में बोल ही न सकें? इसकी भी अनदेखी न की जाए कि राज्यसभा में भी प्रधानमंत्री की ओर से जब राष्ट्रपति के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा का जवाब दिया जा रहा था तो विपक्षी सांसदों ने हंगामा किया और अंततः सदन से बाहर निकल गए। आखिर इससे क्या हासिल हुआ?

संसद के बजट सत्र के शुरुआती चरण में संसद के दोनों सदनों और उसके परिसर में जैसे दृश्य देखने को मिले हैं, वे संसदीय मर्यादाओं का उपहास उड़ाने वाले हैं। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने एक अप्रकाशित पुस्तक के कथित अंश के जरिये चीन के मामले में प्रधानमंत्री पर आक्षेप लगाने और उन्हें कमजोर शासक साबित करने की चेष्टा की। पता नहीं क्यों वे यह भूल गए कि इसके जवाब में उन्हें प्रकाशित पुस्तकों के माध्यम से अप्रिय बातें सुनने को मिल सकती हैं और उनके साथ-साथ उनके दल को भी असहज होना पड़ सकता है।

बीते दिनों संसद परिसर में भी ऐसा कुछ हुआ, जो नहीं होना चाहिए था। केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू से सामना होते ही राहुल गांधी ने उन्हें न केवल गद्दार दोस्त कहा, बल्कि यह कटाक्ष भी किया कि उन्हें कांग्रेस की ही शरण में आना होगा। क्या राहुल कांग्रेस से दूसरे दलों में गए सभी नेताओं को भी इसी नजर से देखते हैं? प्रश्न यह भी है कि दूसरे दलों से जो नेता कांग्रेस में आए हैं, उनके प्रति उनका क्या दृष्टिकोण है? अच्छा हो कि पक्ष-विपक्ष यह समझें कि संसद हंगामे के लिए नहीं है।