जागरण संपादकीय: टीएमसी के कितने टुकड़े
यह समय ही बताएगा कि टीएमसी का क्या होगा, लेकिन पार्टी में बिखराव के लिए ममता बनर्जी अपने अलावा और किसी को दोष नहीं दे सकतीं।
HighLights
19 टीएमसी सांसदों ने खुद को असली पार्टी बताया।
ममता और अभिषेक के नेतृत्व पर पार्टी में कलह।
परिवारवाद और आंतरिक लोकतंत्र की कमी से बिखराव।
तृणमूल कांग्रेस के 19 सांसदों ने लोकसभा स्पीकर को पत्र भेजकर जिस तरह यह दावा किया कि असली टीएमसी हम ही हैं, उससे इस पर एक तरह से मुहर ही लगी कि इस दल के विधायकों की तरह लोकसभा सदस्यों में भी टूट की औपचारिकता मात्र शेष है। टीएमसी के राज्यसभा सदस्य भी छिटक रहे हैं। अब तक उसके तीन राज्यसभा सदस्य त्यागपत्र दे चुके हैं। आने वाले दिनों में उनकी संख्या और बढ़े तो हैरानी नहीं।
चुनावों में हार के बाद आम तौर पर राजनीतिक दलों की मुश्किलें बढ़ती ही हैं, लेकिन यह पहली बार हो रहा है कि पराजय के उपरांत किसी दल का अस्तित्व ही खत्म होता दिख रहा है। इसमें संदेह है कि ममता बनर्जी अपनी पार्टी बचा सकेंगी, क्योंकि उनके पास बहुत कम विधायक और सांसद बचे हैं। इनमें से चंद ही खुलकर यह कह रहे हैं कि वे ममता के साथ हैं।
इनमें भी कुछ ऐसे हैं, जो यह कह रहे हैं कि उन्हें ममता का नेतृत्व तो स्वीकार है, लेकिन उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी का नहीं। ममता के प्रबल समर्थक के रूप में सामने आए लोकसभा सदस्य कल्याण बनर्जी ने यह कहकर एक तरह से अल्टीमेटम ही दिया कि उन्हें पार्टी और अभिषेक में से किसी एक का चयन करना होगा।
टीएमसी केवल दो टुकड़ों में ही बंटती नहीं दिख रही है। उसके कई टुकड़े हो सकते हैं, क्योंकि लोकसभा में बगावत का नेतृत्व करने वाली टीएमसी सांसद काकोली घोष कह रही हैं कि उन्हें बागी विधायकों के नेता ऋतब्रत बनर्जी से कोई लेना-देना नहीं। जहां ऋतब्रत विधानसभा में विपक्ष की भूमिका निभाने को कह रहे हैं, वहीं काकोली मोदी सरकार का साथ देने की घोषणा कर रही हैं।
यह समय ही बताएगा कि टीएमसी का क्या होगा, लेकिन पार्टी में बिखराव के लिए ममता बनर्जी अपने अलावा और किसी को दोष नहीं दे सकतीं। उनका दोष केवल इतना ही नहीं कि वे मनमाने तरीके से सरकार चला रही थीं, बल्कि यह भी है कि उन्होंने पार्टी पर भतीजे अभिषेक पर थोप दिया था। वे किसी रियासत के अहंकारी युवराज की तरह पार्टी चला रहे थे। टीएमसी पहली पार्टी नहीं, जिसमें भाई-भतीजावाद हावी हो गया हो। अधिकतर क्षेत्रीय दल ऐसे ही हैं। वे परिवार विशेष से संचालित होते हैं और उसके आगे किसी की नहीं चलती।
ऐसे दलों में न तो आंतरिक लोकतंत्र होता है और न ही असहमति के लिए कोई स्थान। इन दलों में वही होता है, जो परिवार चाहता है। टीएमसी में भी वही हो रहा था, जो ममता और अभिषेक चाह रहे थे। विचारधाराविहीन यह दल तभी तक अपने नेताओं को अपने साथ जोड़े रखने में समर्थ रहा, जब तक उसके पास सत्ता रही। सत्ता मिलने की आस, सत्ता और उससे मिलने वाले लाभ ही पार्टी को एकजुट रखने वाले मूल तत्व थे। इनके हटते ही पार्टी में भगदड़ मच गई।












