तृणमूल कांग्रेस के विधायकों में टूट के बाद उसके संसद सदस्यों में भी टूट की आशंका उभर आने पर आश्चर्य नहीं, क्योंकि जैसे पार्टी के अधिकांश विधायक ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी के कार्य-व्यवहार से खफा थे, वैसे ही कई सांसद भी हैं। कुछ की तो नाराजगी भी सामने आ चुकी है। इसकी भी अनदेखी न की जाए कि बागी विधायकों की ओर से विधानसभा में अपना नया नेता चुन लिए जाने पर तृणमूल कांग्रेस के अधिकतर सांसदों ने चुप्पी सी साध रखी है। तथ्य यह भी है कि बीते दिनों जब ममता भतीजे अभिषेक पर कथित गंभीर हमले के खिलाफ धरने पर बैठीं तो ज्यादातर विधायक और सांसद नदारद थे।

यदि ममता बनर्जी ने भतीजे अभिषेक को जरूरत से ज्यादा अहमियत नहीं दी होती तो शायद पार्टी उनके हाथ से जाने की नौबत नहीं आती। उन्हें परिवारवाद को प्रश्रय देने के साथ ही अपने नेताओं के बेलगाम भ्रष्टाचार की भी कीमत चुकानी पड़ रही है। तृणमूल कांग्रेस में टूट शिव सेना और एनसीपी में टूट की याद दिलाने वाली है। इन दोनों दलों में टूट का एक कारण यह भी रहा कि जहां एनसीपी प्रमुख शरद पवार बेटी को बढ़ावा दे रहे थे, वहीं शिव सेना सुप्रीमो उद्धव ठाकरे बेटे को। वैसे जहां शिवसेना और एनसीपी में टूट इसलिए हुई, क्योंकि बागी गुट सत्ता का साथ चाहता था, वहीं तृणमूल कांग्रेस में असंतुष्ट नेताओं के अलगाव का कारण सत्ता सुख पाना नहीं है। इस दृष्टि से तृणमूल कांग्रेस की टूट कुछ अलग भी है। साफ है कि असंतुष्ट नेताओं को पार्टी चलाने का ममता का तरीका और खासकर भतीजे को आगे बढ़ाना रास नहीं आया।

पुराने और अनुभवी नेताओं को कभी यह स्वीकार नहीं होता कि पार्टी प्रमुख अपने बेटे-बेटियों अथवा भाई-भतीजों को उन पर थोप दे। परिवारवादी दल कई बार अपने परिवार के ऐसे सदस्य को पार्टी पर थोप देते हैं, जो बिल्कुल अनुभवहीन होते हैं। उन राजनीतिक दलों में भी टूटन अधिक होती है, जिनकी कोई विचारधारा नहीं होती। तृणमूल कांग्रेस की विचारधारा जानना उसी तरह कठिन है, जैसे पिछले दिनों टूट का शिकार हुई आम आदमी पार्टी की।

लोक लुभावन नीतियों, जाति या समुदाय विशेष के तुष्टीकरण के सहारे किसी राजनीतिक दल को अधिक दिनों तक नहीं चलाया जा सकता। ऐसे दलों में सत्ता के लोभ में दूसरे दलों के नेता आ तो जाते हैं, लेकिन जैसे ही सत्ता जाती है, वे अपना अलग ठिकाना खोजने लगते हैं। तृणमूल कांग्रेस ने भले ही अपना एक कैडर बना लिया हो, लेकिन यह किसी से छिपा नहीं कि पार्टी के अधिकांश नेता दूसरे दलों से अपने स्वार्थों की पूर्ति करने के इरादे से आए थे। इनमें से अधिकतर वाम दलों से आए थे और शायद यही कारण रहा कि ममता ने वही तौर-तरीके अपना लिए, जो वामपंथियों ने अपना रखे थे।