संपादकीय: समझौता कितना टिकाऊ
ईरान और अमेरिका के बीच संभावित शांति समझौता दुनिया के लिए राहतकारी है, लेकिन होर्मुज जलडमरूमध्य पर मतभेद और इजरायल की आपत्तियों के कारण इसकी स्थिरता पर सवाल उठ रहे हैं।
HighLights
अमेरिका-ईरान शांति समझौता दुनिया के लिए राहत, पर स्थिरता संदिग्ध।
होर्मुज जलडमरूमध्य पर मतभेद, इजरायल की सुरक्षा बड़ी चुनौती।
ईरान की संपत्ति वापसी, प्रतिबंध मुक्ति वार्ता की मुख्य शर्त।
अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते को लेकर सहमति बनना पश्चिम एशिया के साथ-साथ पूरी दुनिया के लिए राहतकारी तो है, लेकिन जब तक इस समझौते पर हस्ताक्षर नहीं हो जाते और यह स्पष्ट नहीं हो जाता कि दोनों पक्षों में वस्तुतः किन-किन बिंदुओं पर सहमति बनी है, तब तक स्थायी शांति की आशा नहीं की जा सकती।
समझौते के बिंदुओं को लेकर ईरानी मीडिया जो दावे कर रहा है, वे अमेरिकी राष्ट्रपति के दावों से मेल नहीं खाते। ट्रंप कह रहे हैं कि होर्मुज समुद्री मार्ग जल्द खुल जाएगा और ईरान को वहां से निकलने वाले जहाजों से टैक्स वसूलने का अधिकार नहीं होगा, लेकिन ईरान कह रहा है कि यह समुद्री मार्ग उसकी व्यवस्थाओं के तहत खुलेगा।
एक तो इसका आशय स्पष्ट होना आवश्यक है और दूसरे, करीब सौ दिन पहले अमेरिका के साथ मिलकर ईरान पर हमले करने वाले इजरायल का संतुष्ट होना भी। यह ध्यान रहे कि इजरायल कह रहा है कि वह लेबनान के उन क्षेत्रों से पीछे नहीं हटेगा, जो उसने अपने अधिकार में ले लिए हैं। उसने यह भी चेतावनी दी है कि यदि लेबनान की धरती से उस पर हमला हुआ तो ईरान समर्थित हिजबुल्ला को वह हर हाल में निशाना बनाएगा।
ईरान की ओर से भी यह रेखांकित किया जा रहा है कि अंतिम वार्ता तब तक शुरू नहीं होगी, जब तक उसकी फ्रीज संपत्तियों का कम से कम आधा हिस्सा जारी नहीं कर दिया जाता और उसके तेल पर लगे प्रतिबंध निलंबित नहीं कर दिए जाते। ऐसे में आगामी शुक्रवार तक प्रतीक्षा करनी होगी, जब जेनेवा में इस समझौते पर हस्ताक्षर होंगे।
इस समझौते पर हस्ताक्षर के बाद अगले 60 दिन तक ईरान के साथ उसके परमाणु कार्यक्रमों और अन्य विषयों पर वार्ता होगी। स्पष्ट है कि यह भी देखना होगा कि इस वार्ता का नतीजा क्या रहता है? यदि ईरान इजरायल के लिए खतरा बने हिजबुल्ला, हमास और हूती जैसे संगठनों को उसके खिलाफ उकसाता रहता है तो पश्चिम एशिया कभी भी सुलग सकता है।
ईरान के साथ समझौते को लेकर ट्रंप यह प्रकट कर रहे हैं कि उनके मन-मुताबिक समझौता हुआ, लेकिन सच तो यह है कि फिलहाल ईरान का पलड़ा भारी दिख रहा है और इसके लिए वही अधिक जिम्मेदार हैं। जो भी हो, होर्मुज समुद्री मार्ग के पहले की तरह खुलने एवं वहां से नौवहन में कोई बाधा न खड़ी होने से ही दुनिया की चिंताएं खत्म होंगी और तमाम देशों की अर्थव्यवस्थाओं के समक्ष जो गंभीर संकट पैदा हुआ, वह दूर होगा।
इसमें भी समय लगेगा, क्योंकि होर्मुज से बारूदी सुरंगों को हटाने का काम करना होगा। एक तथ्य यह भी है कि ईरान ने खाड़ी के देशों में तेल और गैस संयंत्रों पर जो हमले किए, उनके चलते वे क्षतिग्रस्त हो गए हैं और उनका उत्पादन प्रभावित हुआ है।












