अमेरिका और ईरान के बीच फिर से युद्ध छिड़ने के कारण न केवल पश्चिम एशिया का संकट और गहरा गया है, बल्कि विश्व अर्थव्यवस्था के लिए भी समस्याएं बढ़ गई हैं। अमेरिकी हमलों के जवाब में ईरान ने जिस तरह होर्मुज समुद्री जल मार्ग को फिर से बंद करने का फैसला किया, उसके बाद अमेरिका और उसके बीच तनाव तो बढ़ेगा ही, खाड़ी के देशों से होने वाली तेल और गैस की आपूर्ति के भी बिल्कुल ठप होने का अंदेशा है।

इसके चलते पहले से ही चढ़े तेल एवं गैस के मूल्य और बढ़ सकते हैं। इससे भारत समेत अन्य देशों और विशेष रूप से एशियाई देशों का संकट और बढ़ेगा। इससे खराब बात और कोई नहीं कि अमेरिका और ईरान के बीच समझौते की जो थोड़ी-बहुत गुंजाइश बन रही थी, वह भी समाप्त होती दिख रही है। इसके लिए दोनों ही पक्षों का अड़ियल रवैया जिम्मेदार है।

जहां अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप यह चाहते हैं कि ईरान उनके मन मुताबिक समझौता करे, वहीं ईरानी नेतृत्व न तो परमाणु हथियार बनाने के अपने इरादे का परित्याग करने को तैयार है और न ही होर्मुज पर अपना दावा छोड़ने के लिए। वह इजरायल के लिए खतरा बने हिजबुल्ला को समर्थन देने से पीछे हटने के लिए भी तैयार नहीं। वह यह तो चाहता है कि इजरायल लेबनान में हिजबुल्ला के ठिकानों पर हमला करने से बाज आए, लेकिन वह इस संगठन को इजरायल को निशाना बनाने से रोकने के लिए तैयार नहीं।

समस्या केवल यह नहीं कि ईरान होर्मुज पर अवैध कब्जा करना चाहता है, बल्कि यह भी है कि अमेरिकी सेना उसके बंदरगाहों की नाकेबंदी के चलते इस समुद्री जल मार्ग से इस बहाने जहाजों को नहीं निकलने दे रहा है कि वे या तो ईरान जा रहे थे या फिर वहां से आ रहे थे। इसी को आधार पर बनाकर उसने पिछले चार दिनों में तीन जहाजों पर हमले किए।

इनमें से दो पलाऊ और एक गिनी-बिसाऊ का था, लेकिन इन तीनों में भारतीय नाविक सवार थे। इनमें से एक जहाज पर अमेरिकी हमला घातक साबित हुआ। इस हमले में तीन भारतीय नाविक मारे गए। साफ है कि अमेरिकी सेना निहायत ही गैर जिम्मेदारी का परिचय दे रही है। वह जहाजों को रोकने, जब्त करने के बजाय जिस तरह उन्हें ध्वस्त करने का काम कर रही है, वह अस्वीकार्य और अक्षम्य है।

यह सर्वथा उचित है कि भारत ने अपने तीन भारतीय नाविकों के मारे जाने की घटना पर अमेरिकी राजनयिक को तलब कर अपना विरोध दर्ज कराया, लेकिन केवल इतना ही पर्याप्त नहीं। उसे विश्व के अन्य देशों के साथ मिलकर अमेरिका और ईरान पर इसके लिए दबाव बनाना होगा कि वे कारोबारी जहाजों को निशाना बनाने से बाज आएं। भारत को ऐसा इसलिए करना होगा, क्योंकि खाड़ी क्षेत्र में 18 हजार से अधिक भारतीय नाविक देसी-विदेशी जहाजों पर कार्यरत हैं।