अमेरिका और ईरान के बीच स्विट्जरलैंड के बजाय फ्रांस में समय से पहले अंतरिम शांति समझौते पर हस्ताक्षर होने से उसके लागू होने का रास्ता तो साफ हो गया, लेकिन यह भविष्य ही बताएगा कि यह समझौता पश्चिम एशिया में स्थायी शांति का मार्ग वास्तव में प्रशस्त कर पाएगा या नहीं? यह प्रश्न इसलिए, क्योंकि इजरायल इस समझौते से खुश नहीं। यह कहना भी कठिन है कि इजरायल के साथ ईरान भी समझौते के अनुरूप आचरण करेगा।

यदि ईरान हिजबुल्ला और हाउती जैसे संगठनों को इजरायल को निशाना बनाने के लिए उकसाता है तो इस समझौते का टूटना तय है। यह अमेरिका की कमजोरी का ही प्रमाण है कि वह ईरान पर इसके लिए दबाव नहीं बना पाया कि वह इजरायल के लिए खतरा बने हिजबुल्ला और हाउती जैसे संगठनों की मदद करना बंद करे। ये दोनों संगठन एक तरह से ईरान की छद्म सेनाएं ही हैं।

अंतरिम समझौते पर हस्ताक्षर के बाद अमेरिका और ईरान की ओर से अपनी-अपनी जीत का दावा करना स्वाभाविक है, क्योंकि दोनों पक्षों को अपनी जनता को भी संतुष्ट करना है, लेकिन फिलहाल ईरान अधिक लाभ में दिख रहा है। अमेरिका और इजरायल ने जिन उद्देश्यों के लिए बीती 28 फरवरी को ईरान पर हमला किया, वे उन्हें हासिल होते नहीं दिख रहे हैं। ईरान में न तो सत्ता परिर्वतन हो सका और न ही उसकी घातक मिसाइल क्षमता नष्ट हो पाई। उलटे उसने खाड़ी के देशों में अमेरिकी ठिकानों पर हमले कर इन देशों के मन में अपनी सुरक्षा के लिए डर पैदा करने का काम किया।

इन हमलों से ईरान ने यही संदेश दिया कि खाड़ी के देश अमेरिकी सैन्य छतरी तले सुरक्षित नहीं। यदि अमेरिका और इजरायल के लिए संतोष की कोई बात है तो केवल यही कि ईरान ने परमाणु हथियार न बनाने का वादा किया है, लेकिन इसमें संदेह है कि वह अपने इस इरादे का सदैव के लिए परित्याग करेगा। 14 बिंदुओं वाले अंतरिम समझौते के तहत यह भी तय हुआ है कि ईरान 60 दिनों के लिए होर्मुज समुद्री मार्ग खोल देगा, लेकिन यह प्रश्न अनुत्तरित है कि इसके बाद क्या होगा? यदि वह 60 दिनों बाद इस समुद्री मार्ग से निकलने वाले जहाजों से टैक्स वसूलने लगता है तो इससे अमेरिका की हेठी ही होगी।

अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच युद्ध के पहले यह समुद्री मार्ग सबके लिए खुला था, लेकिन अब ईरान उस पर आधिपत्य चाहता है। यदि वह इसमें सफल हो जाता है तो खाड़ी देशों के साथ अमेरिका को तो झटका लगेगा ही, विश्व अर्थव्यवस्था को भी नुकसान होगा, क्योंकि तेल और गैस के दाम बढ़ सकते हैं। ईरान को यह लाभ मिलता भी दिख रहा है कि अब वह अपना तेल बेचने के लिए स्वतंत्र होगा। साफ है कि अमेरिका के लिए दुनिया को यह बताना कठिन होगा कि उसे ईरान पर हमले से हासिल क्या हुआ?