विष्णु देव साय। भारतीय इतिहास में 31 मार्च, 2026 का दिन सशस्त्र माओवाद के खात्मे के रूप में दर्ज हो चुका है। इस दिन देश ने माओवादी आतंक के विरुद्ध निर्णायक सफलता हासिल की। यह लोकतंत्र, सुशासन और विकास के उस व्यापक सोच की विजय है, जिसने वर्षों से हिंसा से जूझ रहे बस्तर को एक नई दशा और दिशा दी है। इस ऐतिहासिक उपलब्धि के लिए एक स्पष्ट नीति और दृढ़ नेतृत्व को श्रेय जाता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने माओवाद के प्रति “शून्य सहनशीलता” और “विकास आधारित समाधान” की नीति अपनाई। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने न केवल रणनीतिक स्तर पर इस अभियान का मार्गदर्शन किया, बल्कि कई बार नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में जाकर जवानों और स्थानीय लोगों का मनोबल भी बढ़ाया। इस पूरे अभियान में हमारे सुरक्षा बलों के अदम्य साहस और बस्तर की जनता के सहयोग ने इस लड़ाई में निर्णायक भूमिका निभाई।

सरकार की रणनीति का महत्वपूर्ण पहलू संवाद और पुनर्वास रहा है। यह संदेश दिया गया कि जो लोग हिंसा छोड़कर मुख्यधारा में आना चाहते हैं, उनके लिए सरकार के द्वार खुले हैं। इसका सकारात्मक प्रभाव यह रहा कि बड़ी संख्या में माओवादियों ने आत्मसमर्पण कर सामान्य जीवन अपनाया। ऐसे लोग जो केवल हिंसा की भाषा समझते थे, उनके विरुद्ध सुरक्षा बलों ने सख्त कार्रवाई भी की। सुधाकर, बसवराजू जैसे शीर्ष माओवादी नेतृत्व को न्यूट्रलाइज करने से माओवादी आतंक की कमर टूट गई। वर्ष 2015 में प्रधानमंत्री जी द्वारा कार्ययोजना बनाकर माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं का व्यापक विस्तार किया गया। सड़क, बिजली, दूरसंचार, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी सुविधाएं उन क्षेत्रों तक पहुंचीं, जहां कभी शासन की उपस्थिति नहीं थी। पिछले ढाई साल में डबल इंजन की सरकार ने जनकल्याणकारी योजनाओं को माओवाद प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचाकर इस दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। सुरक्षा कैंपों के 10 किलोमीटर के दायरे में आने वाले 525 गांवों में “नियद नेल्ला नार” योजना के अंतर्गत 17 विभागों के माध्यम से 25 हितग्राही मूलक और 18 सामुदायिक योजनाओं का लाभ तेजी से पहुंचाया जा रहा है।

आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों के पुनर्वास के लिए बनी प्रभावी नीति ने उन्हें समाज की मुख्यधारा में सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अवसर दिया है। जो लोग बंदूक छोड़कर मुख्यधारा में लौटे हैं, उन्हें आर्थिक सहायता, आवास, भूमि, कौशल प्रशिक्षण, रोजगार और सम्मानजनक जीवन का अवसर दिया जा रहा है। आत्मसमर्पित माओवादियों और माओवाद प्रभावित परिवारों के लिए 15 हजार प्रधानमंत्री आवास की स्वीकृति माओवाद विरोधी अभियान के मानवीय पक्ष का बेहतरीन उदाहरण है। आज बस्तर में सांस्कृतिक पुनर्जागरण को दुनिया देख रही है। बस्तर ओलिंपिक और बस्तर पंडुम ने बस्तर अंचल को एक नई पहचान दी है। इसमें लाखों की संख्या में लोगों की भागीदारी ने जनजातीय संस्कृति को एकसूत्र में पिरोया है।

माओवादी हिंसा की वजह से सड़क नेटवर्क के विस्तार को सबसे ज्यादा क्षति पहुंची थी। अब हम सर्वोच्च प्राथमिकता से सड़क नेटवर्क की बेहतरी पर काम करेंगे। रायपुर-विशाखापट्टनम एक्सप्रेसवे, जगदलपुर-रावघाट रेलमार्ग और हवाई सेवाओं के विस्तार से बस्तर देश की मुख्यधारा से जुड़ेगा। यह कनेक्टिविटी न केवल पर्यटन को बढ़ावा देगी, बल्कि रोजगार और निवेश के नए अवसर भी पैदा करेगी। स्वास्थ्य, शिक्षा और कौशल विकास के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण पहल की गई है। अबूझमाड़ और जगरगुंडा में एजुकेशन सिटी और गीदम में मेडिकल कालेज जैसे प्रोजेक्ट इस क्षेत्र के समग्र विकास की दिशा में मील का पत्थर साबित होंगे। नए बजट में सिंचाई परियोजनाओं के माध्यम से कृषि क्षेत्र को भी सशक्त किया जा रहा है, जिससे किसानों की आय में वृद्धि होगी। बस्तर अंचल के युवाओं और आत्मसमर्पित माओवादियों को रोजगार-व्यवसाय का प्रशिक्षण देने के लिए सभी विकासखंडों में कौशल प्रशिक्षण केंद्र संचालित कर रहे हैं, जहां एक लाख से अधिक युवाओं को रोजगार-व्यवसाय के विभिन्न ट्रेड का प्रशिक्षण दिया जा चुका है। बस्तर में कृषि, वनोपज और इसके प्रसंस्करण की बड़ी संभावनाएं हैं।

बस्तर में एग्रो एवं एग्रो फारेस्ट प्रोसेसिंग क्षेत्र में निवेशकों को विशेष अनुदान दिया जाएगा। इससे वनोत्पाद के मूल्य संवर्धन से रोजगार के अवसर पैदा होंगे। अब हमारा पूरा फोकस माओवाद मुक्त हो चुके क्षेत्रों के समग्र विकास पर है। इसके लिए नियद नेल्ला नार 2.0 पर हम काम करेंगे। पहले की योजना में केवल सात माओवाद प्रभावित जिले शामिल थे, अब इसमें 10 जिले शामिल होंगे। हमने बस्तर मुन्ने नाम से एक नई पहल की है, जिसका गोंडी भाषा में अर्थ होता है अग्रणी गांव। इसमें हम बस्तर के हर ग्राम पंचायत में शिविर लगाकर लोगों को जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ देंगे। अभी बस्तर के 85 प्रतिशत परिवारों की आय 15 हजार रुपये प्रतिमाह से कम है। हम केंद्र की मदद से इसे अगले तीन वर्षों में 30 हजार रुपये प्रति माह तक पहुंचाने की योजना पर काम करेंगे। इसमें एनआरएलएम, सहकारी समितियां, कृषक उत्पादक संगठन, वनधन विकास केंद्र एवं कौशल विकास पहल की अहम भूमिका होगी। माओवाद की समाप्ति के साथ बस्तर प्रदेश और देश की तरक्की का केंद्र बनने जा रहा है।

(लेखक छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री हैं)