संसद के विशेष सत्र में महिला आरक्षण संबंधी संविधान संशोधन विधेयक पारित न होने के बाद पक्ष-विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। यह लगभग तय है कि यह दौर हाल-फिलहाल थमने वाला नहीं है। कहना कठिन है कि आम जनता और विशेष रूप से महिलाओं को किसका नैरेटिव सही जान पड़ेगा, क्योंकि दोनों पक्षों की ओर से एक-दूसरे को कठघरे में खड़ा करने और महिला आरक्षण को लागू करने के तौर-तरीकों पर तकरार करने से किसी को और विशेष रूप से लोकसभा एवं विधानसभाओं में अपने लिए 33 प्रतिशत सीटों की प्रतीक्षा कर रही महिलाओं को तो कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है।

अब जबकि प्रधानमंत्री ने गत दिवस राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में कहा कि महिला आरक्षण को लागू कराने के अपने इरादे से वे डिगे नहीं हैं एवं उनके हौसले बुलंद हैं और विपक्ष भी यह कह रहा है कि उसका विरोध महिला आरक्षण से नहीं, बल्कि सभी राज्यों में लोकसभा की 50 प्रतिशत सीटें बढ़ाने के फार्मूले और परिसीमन से है, तब फिर उचित यह होगा कि इस जटिल प्रश्न का समाधान निकालने के लिए दोनों पक्ष सहमति कायम करने की दिशा में आगे बढ़ें। परिसीमन के प्रश्न को और अधिक समय तक नहीं टाला जा सकता।

संवैधानिक आवश्यकता यह कहती है कि प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन होना चाहिए। यह दुर्भाग्य की बात रही कि 1971 की जनगणना के बाद 1976 में परिसीमन की प्रक्रिया इस कारण फ्रीज कर दी गई, क्योंकि दक्षिण भारत के राज्यों का तर्क था कि वे अपनी आबादी कम करने में सफल रहे हैं और परिसीमन से उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम हो सकता है।

विडंबना यह रही कि 1976 में 25 वर्ष के लिए फ्रीज किए गए परिसीमन को 2001 में 25 और वर्षों के लिए फ्रीज कर दिया गया, लेकिन अब जबकि यह अवधि पूरी हो गई है, तब मौजूदा जनगणना के बाद परिसीमन तो कराना ही होगा, अन्यथा संविधान की इस मूल भावना का निरादर होगा कि लोकतंत्र में प्रत्येक व्यक्ति के वोट का मूल्य बराबर होना चाहिए।

विपक्षी दलों ने भले ही परिसीमन पर आपत्ति जताकर महिला आरक्षण की राह रोक दी हो, लेकिन यदि अगली जनगणना के बाद जनसंख्या के आधार पर परिसीमन होता है तो उससे दक्षिण के राज्यों को तो राजनीतिक रूप से अधिक नुकसान ही होगा।

ऐसे में उचित यही होगा कि सभी राज्यों में लोकसभा की 50 प्रतिशत सीटें बढ़ाकर परिसीमन किया जाए ताकि लोकसभा के सभी सदस्यों को लगभग समान संख्या में लोगों के प्रतिनिधित्व का अवसर मिल सके। यदि दक्षिण के राज्यों के जनसंख्या आधारित परिसीमन के विरोध को जरूरत से ज्यादा महत्व दिया जाएगा तो इससे उत्तर भारत के राज्यों के हितों की कहीं अधिक अनदेखी होगी और यह भी उचित नहीं होगा।